बुधवार, 25 अप्रैल 2018

महाभियोग पर किरकिरी

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश  के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव पर कांग्रेस ने अपनी ही किरकिरी करवाई है। कांग्रेस समेत सात विपक्षी दलों ने पिछले सप्ताह राज्यसभा के सभापति को  देश  के मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव देकर अभूतपूर्व  कदम उठाया था। न्यायविद इसे  न्यायपालिका के इतिहास का काला दिन बता रहे हैं। राज्यसभा के सभापति एवं उप-राष्ट्र्पति  वैंकेया नायडू ने सोमवार को इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है। देष के  उप-राश्ट्रपति ही राज्यसभा के सभापति भी हैं। अधिकतर न्यायविदों को लगता है कि कांग्रेस ने जल्दबाजी में प्रस्ताव पेष कर इस मुद्दे पर खामख्वाह अपनी भद पिटवाई है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीष सरीखे उच्चस्थ संवैधानिक पद पर आसीन जज  को हटाने के लिए अत्याधिक ठोस वजह होनी चाहिए। सुनी-सुनाई बातों अथवा प्रैस कॉन्फ्रेस में लगाए गए आरोपों पर  सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को नहीं हटाया जा सकता। न्यायाधीश   किसी पार्टी अथवा विचारधारा से सम्बंद्ध नहीं होते हैं और न ही उन्हें इस नजरिए से देखा जाना चाहिए। अब यह बात भी सामने आई है कि महाभियोग प्रस्ताव पर सात पूर्व सांसदों के भी दस्तख्त थे। इससे यही लग रहा है कि प्रस्ताव काफी पहले तैयार कर लिया गया था। इससे भाजपा के इन आरोपों की पुष्टि  होती  है कि  महाभियोग प्रस्ताव पेश  करने से पहले कांग्रेस जज लोया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रही थी और जैसे ही  फैसला पक्ष में नहीं आया, कांग्रेस ने राज्यसभा सभापति को महाभियोग प्रस्ताव सौंप दिया। इससे  कांग्रेस पर इस बात का संदेह होना स्वभाविक है कि पार्टी ने “बदले की भावना“ से काम किया है। महाभियोग प्रस्ताव के लिए हालांकि कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के चार जजों के आरोपों को भी आधार बनाया है मगर न्यायविद मानते हैं कि जस्टिस चेमलेशवर, जस्टिस रंजन गोगई, कुरियन जोसेफ और जस्टिस मदन लोकुर का विरोध एकदम अलग था और उनकी भावनाओं को महाभियोग का मुद्दा नहीं बनाया जा सकता। महाभियोग प्रस्ताव के लिए पुख्ता सबूतों की जरुरत होती है। सुप्रीम कोर्ट  के मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ महाभियोग अत्याधिक गंभीर मुद्दा है और इसे बगैर फूलप्रूफ  सबूतं के पेष करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण  है। सुप्रीम कोर्ट  अथवा हाई कोर्ट के जज को महाभियोग प्रस्ताव से ही हटाया जा सकता है मगर इस तरह के प्रस्ताव को पारित करवाने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की दरकार होती है। विपक्ष दो-तिहाई बहुमत जुटा पाएगा, यह लगभग नामुमकिन है। इतना प्रचंड बहुमत केवल सत्तारूढ दल के पास ही होता है। इस स्थिति में जाहिर है सत्तारूढ दल  के समर्थन के बगैर महाभियोग का प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता। कांग्रेस और महाभियोग पर उसका समर्थन करने वाला राजनीतिक दल यह बात बखूबी जानते हैं। फिर महाभियोग प्रस्ताव लाने का क्या औचित्य? वैसे भी चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा इस साल दो अक्टूबर को रिटायर होमे जा रहे हैं और अगर क्षण भर के लिए  मान भी लिया जाए कि महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार हो जाता, तो भी पूरी प्रकिया पूरी होने तक जस्टिस मिश्रा रिटायर हो जाते।  महाभियोग एक लंबी प्रकिया है। लोकसभा अथवा राज्यसभा में प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है और यह समिति महाभियोग के लिए पेष सबूतों की जांच करती है। इसमें समय लगता है। समिति की रिपोर्ट पर संसद में महाभियोग का प्रस्ताव पारित होता है और इसके बाद ही राश्ट्रपति से दोशी जज को हटाने की सिफारिष की जाती है। आज तक किसी भी जज को महाभियोग से नहीं हटाया गया है।  इससे साफ होता है कि कांग्रेस और विपक्ष न्यायपालिका पर दबाव डालना चाहते हैं। न्यायापालिका की स्वायतता और निश्पक्षता के लिए इस तरह का प्रयास बेहद खतरनाक है। यही अब एकमात्र ऐसी संस्था है जिस पर लोगों को भरोसा है। न्यायपालिका की विष्वसनीयता हर हाल में राजनीति से ऊपर रखी जानी चाहिए।