उत्तर प्रदेश के उन्नाव में नाबालिग युवती और आतंकी हिंसा से जूझ रहे जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में आठ साल की बालिका से बलात्कार जैसे जघन्य अमानवीय अपराध ने एक फिर भारत की “राश्ट्रीय अस्मिता“ को तार-तार कर दिया है। उन्नाव में सत्तारूढ दल भाजपा के विधायक पर नाबालिग लडकी से बलात्कार का आरोप है। जनता के भारी दबाव पर पुलिस ने विधायक के खिलाफ पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसिस एक्ट) के तहत मामला दर्ज तो कर लिया है मगर उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया। बाद में अदालत के आदेश पर उन्हें गिरफ्तार किया गया । नियमानुसार, भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 363 (अपहरण), 366 ( अवैध संभोग), 376 (बलात्कार) और 506 (आपराधिक धमकी-ह्त्या) के तहत तुरंत गिरफ्तारी होनी चाहिए। आरोपी सत्तारूढ विधायक है, इसलिए पुलिस गिरफ्तारी से पल्ला झाड रही है जबकि यही पुलिस आम आदमी को इस तरह के जघन्य अपराध में फौरन गिरफ्तार कर लेती है। पुलिस का कथन है कि आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं जबकि सबूतों के बगैर पॉक्सो एक्ट के तहत मामला बनता ही नहीं है। यही पुलिस बलात्कार के आरोप पर पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति को गिरफ्तार कर चुकी है। उन्नाव बलात्कार पीडिता के पिता की पुलिस कस्टडी में मौत भी हो चुकी है। राज्य के प्रमुख गृह सचिव और डीजीपी पुलिस का आरोपी विधायक को “माननीय“ कहकर संबोधित करना साफ बता रहा है कि आरोपी को बचाया जा रहा है। बहरहाल “सरकारी तोतों“ की इस कार्यशैली पर किसी को हैरानी नहीं है। भारत में पुलिस का काम बस वीवीआईपी की सुरक्षा और रक्षा करना है। आम जनता के लिए उसके पास न तो समय है और न ही फोर्स । पुलिस की इसी कार्यशैली के कारण अपराधी अक्सर सजा से बच जाते हैं। बहरहाल, उन्नाव से कहीं ज्यादा संगीन जम्मू-कष्मीर के कठुआ जिले की आठ साल की बालिका की बलात्कार के बाद जघन्य हत्या का मामला है। राष्ट्रीय मीडिया उन्नाव बलात्कार मामले को खूब उछाल रहा है मगर कठुआ जिले में रसाना गांव की बालिका की हत्या और बलात्कार मामले को जम्मू के अखबारों ने भी नहीं उछाला। आठ साल की इस बालिका की इस साल जनवरी में बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। बालिका घुमंतु गुज्जर समुदाय से ताल्लुक रखती थी। 10 जनवरी को दोपहर बाद आसिफा अपने पषुओं को लाने पास के जंगल गई और एक सप्ताह बाद 17 जनवरी को उसकी लाष ही मिली। बालिका की अस्मिता को नोंच-नोच कर लूटा गया था।उसके लापता होने के दो दिन बाद परिजन जब उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने कठुआ थाने गए, उन्हें थानेदार ने यह कहकर भगा दिया कि “ पुलिस का सिरदर्द न बढाओ“। बाद में जब मामले पर बवाल मचा, थानेदार को सस्पेंड करना पडा। पुलिस का रवैया कितना पक्षपातपूर्ण था, इसका पता इस बात से चलता है कि लापता बालिका को तलाशने जिन पुलिसकर्मियों को भेजा गया, उन्होंने उस जगह को जानबूझकर नहीं तलाशा जिस जगह बालिका को छिपाया गया था। बालिका को एक मंदिर मंे छिपाया गया था। जंाच पर खुलासा हुआ कि बालिका को नशे की गोलियां खिलाई गईं, उसे बार-बार बलात्कार और टार्चर किया गया। गुज्जरों के भारी विरोध प्रदर्शन पर तीन महीने बाद इस जघन्य अपराध के लिए एक सेवा निवृत अधिकारी को गिरफ्तार किया गया। बालिका को दफन के लिए दो जगह जमीन भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाई। कट्टरपंथियों ने इस पर कोहराम मचाया। उन्नाव और कठुआ बलात्कार मामले समकालीन भारत के विकृत चेहरे का आइना है। भारत में अबोध बालिकाओं से लेकर वृद्ध महिलाएं की सरेआम अस्मिता लूटी जाती है और पुलिस-प्रशासन को इसकी कतई फिक्र नहीं है। उन्नाव में पीडिता को एक साल बाद भी न्याय के लिए तरसना पड रहा है और कठुआ की अबोध बालिका को मरणोपरांत भी सुकून नहीं मिल रहा है। न्याय के लिए आखिर जाए तो जाएं कहां?
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