गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

मौत का मंजर

हर तरफ मौत का मंजर। लाशों  का ढेर। विलखता-टूटता क्रंदन, रूह को कंपा देने वाला चीत्कार । आंसुओं का सैलाब।  सडक पर आए दिन होनी वाली दुर्घटनाओं के समय अक्सर यह नजारा देखने को मिलता है।  पहाडों में तो कुछ ज्यादा ही। पर यह अलाप-विलाप आलीशान भवनों में रहने वाले  शासकों और लोभी “मौत के सौदागरों“ को सुनाई नहीं देता है। और अगर सुनाई देता भी है, तो बस “इस कान सुन, उस कान निकाल“ ।  सडक परिवहन पहाडों में आवाजाही का एकमात्र साधन होता है । आजादी के सात दशकों में रेल नेटवर्क अभी पहाडों में पहुंचा नहीं है। हवाई यातायात की सुविधा न के बराबर है ।   दुखद स्थिति यह है कि सात दशक बाद भी पहाडी राज्यों में सडकों का सफर सुरक्षित नहीं बन पाया है। हिमाचल प्रदेश  के कांगडा जिले में नूरपुर के निकट सोमवार को हुए दर्दनाक सकूली बस हादसा यही बयां करता है। इस हादसे में 24 मासूमों समेत 27 लोग मारे गए हैं। अपने लाडलों को खोने वाले माता-पिता और परिजनों  की पीडा को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। बच्चों को खोने की क्षति अपूर्णिय  होती है और दुनिया भर की महलम-पट्टी ताउम्र इस नासूर को भर नहीं सकती। ऐसी प्रगति और खुशाहली का क्या फायदा जो बच्चों तक को सुरक्षा मुहैया नहीं करा पाए। स्कूली बसों की दुर्घटनाएं रोकने के लिए सरकार ने लंबे-चौडे नियम बना रखे हैं मगर उनका पालन नहीं किया जाता और न ही प्रशासन इन्हें सख्ती से लागू करवाता है। दुृर्घटना के समय नेताओं की बिरादरी “मगरमच्छी आंसू“ टपका कर बडी-बडी बातें करती है मगर अमल में होता कुछ भी नहीं। ज्यादा से ज्यादा जांच समिति बिठाकर “दुर्घटना“ का ठीकरा किसी अदने कर्मचारी के सिर फोड दिता जाता है। पुलिस रिकार्ड के अनुसार हिमाचल प्रदेश  में हर साल औसतन 3000 सडक हादसे होते हैं और इनमें  1,000 लोग मारे जाते हैं। पिछले दस साल में 30,000 से ज्यादा सडक हादसे हो चुके है और  इनमें 11,000 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।  यह सिलसिला अंतहीन है और इसमें कमी आने की बजाए उतरोत्तर बढोतरी हो रही है। पूरे देश  का यही हाल है। दुनिया में सबसे ज्यादा सडक हादसे भारत में होते हैं। हर चार मिनट में एक व्यक्ति सडक हादसों में मारा जाता है।  भारत में हर साल जितने लोग सडक हादसों में कालग्रसत हो जाते हैं, उतने लोग तो आज तक विभिन्न युद्धों में नहीं मारे गए । 2013 में 1 लाख 37 हजार लोग सडक दुर्घटनाओं में मारे गए थे। यह अपने आप में एक रिकार्ड  है। इसके बावजूद अभी तक नेशनल रोड सेफ्टी एंड ट्रैफिक मेनेजमेंट बोर्ड  बिल पारित नहीं हो पाया है। 8 साल से यह बिल संसद की मंजूरी के लिए तरस रहा है। भूतल परिवहन मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि लापरवाह ड्राइविंग, तेज गति और यातायात नियमों की घोर उल्लंघन और ड्राइविंग के समय मोबाइल का उपयोग सडक दुर्घटनाओं के लिए काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं। यातायाय नियमों का उल्लघन देश  का चरित्र बन चुका है। रेड लाइट तोडना, गलत लेन या साइड पर चलना, वोवरटेकिंग, सीट बेल्ट लगाए बगैर सफर करना और ड्राइविंग के समय बातों में ध्यान बंटना कानूनन प्रतिबंधित है और इसके लिए चालकों को दंडित भी किया जाता है।  मगर मजाल है कि इन कदमों से कोई फर्क  पडा हो। दंडित होने के बावजूद चालक वही गलती दोहराता है। हर काम  प्रशासनिक मशीनरी पर नहीं छोडा जा सकता। सीसीटीवी कैमरा जैसी उन्नत टकनॉलॉजी के इस्तेमाल से निगरानी रखी जा सकती है मगर सडक हादसे नहीं रोके जा सकते। पुलिस सडकों पर चालान कर सकती है मगर लोगों को कायदे-कानून का सम्मान करने के लिए विवश  तो नहीं कर सकती।   हर नागरिक अगर ट्रैफिक नियमों का संजीदगी से पालन करता है, तो सडक दुर्घटनाएं वैसे ही कम हो जाएंगी। हिमाचल प्रदेश  के नूरपुर स्कूल बस हादसे में अगर जरा सी एतियातन बरत जाती, मासूमों की जिंदगी बच जाती।