बुधवार, 18 अप्रैल 2018

तीसरा विश्व युद्ध ?

विश्व सीरिया पर अमेरिका, फ्रांस और इंग्लैंड के मिसाइल हमलों के बाद से रुस और पश्चिम  देशों  के बीच तनाव और बढ गया है। सीरिया में विद्रोहियों के कब्जे वाले डूमा शहर पर  असद की सेना ने पिछले सप्ताह नर्व एजेंट से रासायनिक हमला किया था जिसमें 70 से ज्यादा लोग मारे गए थे। इसके प्रतिक्रियास्वरुप  गत शनिवार को  अमेरिका और उसके मित्र  फ्रांस और इंग्लैंड  ने सीरिया पर मिसाइलों से हमला किया और दावा किया कि हमलों में  सीरिया रासायनिक लैब नष्ट  कर दी गई है।हमले इसी मकसद से किए गए थे।  सीरिया में यह सिला पिछले सात साल से जारी है।  गृह युद्ध से त्रस्त  सीरिया को बडी ताकतों ने युद्ध का अखाडा बना रखा है। इस युद्ध विभीषका  में कब दोस्त  दुश्मन  बन जाता है, इसका पता तक नहीं चलता।  सीरिया ही नहीं अंतरराष्ट्रीय  हालात अत्याधिक तनावपूर्ण बने हुए हैं। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार शीत  युद्ध, दक्षिण चीन सागर पर बढता तनाव, उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जॉन उन और अमेरिकी राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप की आए दिन की परमाणू हमलों की धमकियां और आपस में भिडते पडोसी पूरे विश्व  को तीसरे वर्ल्ड वार की आशंका  से डराने-धमकाने के लिए काफी है। नवंबर, 2017 में उत्तर कोरिया ने खुद को न्यूक्लियर पॉवर घोषित करके  तीसरा विश्व  युद्ध का सायरन तक बजा दिया था। तब अमेरिका के  राष्ट्रपति  ट्रंप ने शीत   युद्ध के बाद तब पहली बार अपने न्यूक्लियर बम दस्ते को 24 घंटे के अलर्ट  पर रखा था।  इंग्लैड के सलसबरी में रह रहे रुस के पूर्व जासूस सर्गेई स्क्रिपल की हत्या की कोशिश  के कारण पश्चिम  और रुस में संबंध पहले ही बिगड चुके थे। इस प्रकरण के बाद पश्चिम देशों  ने रुस के 130 राजनयिकों को निकाल दिया था। और अब सीरिया पर ताजा हमले से रुस के साथ-साथ मध्य-पूर्व की बडी शक्ति ईरान भी भनभनाया हुआ है। ईरान अमेरिकी की दबंगई से पीडित रहा है और न्यूक्लियर परीक्षण के लिए अमेरिकी प्रतिबंध भी झेल चुका है। इजरायल के दखल को रोकने के लिए सीरिया में ईरान ने बाकायदा लडाकू सैनिक तैनात कर रखे हैं। सीरिया में उर्जा संयंत्र स्थापित करने और चलाने के लिए असद सरकार को मुफ्त में तेल और तकनीकी मदद भी दे रहा है। और यह सब ईरान अमेरिका और इजरायल की दबंगई रोकने के लिए कर रहा है। शिया बहुल आबादी वाला ईरान  शियाओं बहुल देशों  की अगुआई करता है। सीरिया में हालाकि सुन्नी मुसलमानों की आबादी  ज्यादा है मगर ईरान  राष्ट्रपति  असद को षिया मुसलमान मानता है। सुन्नी मुसलमानों का लीडर सउदी अरबिया और अन्य सुन्नी बहुल देश  सीरिया में रुस की दखलादांजी के सख्त खिलाफ हैं और अमेरिका के पीछे खडे हैं। असली लडाई  शिया और सुन्नी के बीच है। ईरान और सउदी अरबिया दोनों में अरब देषों की होड है और इसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसी मकसद से वे बडी ताकतों की षरण में जाते हैं। और बडी ताकतें अपने फायदे के लिए छोटे देषों की युद्ध की भठ्ठी में झोंकने का कोई मौका नही चूकते हैं।   पहले वियतनाम, फिर कंबोडिया , इराक और अब सीरिया। यमन, लेबनान, ईरान-इराक युद्ध से लेकर अफगानिस्तान, सीरिया गृह युद्ध और कोरियाई प्रायद्धीप में भी यही सब हो रहा है। युद्ध से बडी ताकतों की कमाई होती है और छोटे देशों  की तबाही। ग्लोबल पीस इंडेक्स की रिपोर्ट  के अनुसार 2015 इस सदी का अब तक सबसे खराब साल रहा है। 2015 में विभिन्न  क्लॅशेस ( युद्ध) से  वैश्विक  अर्थव्यवस्था को  13.6 खरब (परचेजिंग पॉवर पैरिटी)  का नुकसान उठाना पडा था। यानी प्रति व्यक्ति पांच डॉलर का नुकसान। अगर इस धन को भुखमरी और गरीबी हटाने के लिए खर्च  किया जाता, आधी आबादी का आर्थिक उत्थान हो सकता था। दुनिया का कोई भी देश  युद्ध नहीं चाहता मगर   फिर भी हथियार खरीद पर बेतहाशा  खर्च करता  है।  अगला युद्ध परमाणु हथियारों से लडा जाएगा और अगर युद्ध हुआ तो 48 घंटों के दौरान हर शहर की तीन लाख आबादी खत्म हो जाएगी। कोई भी देश  ऐसा नहीं चाहेगा।