बुधवार, 18 अप्रैल 2018

बेटियों ने बढाया देश का मान

जम्मू-कश्मीर  के कठुआ, गुजरात के सूरत और हरियाणा के  रोहतक में मानवता को शर्मसार करती अबोध बालिकाओं की बलात्कार के बाद निर्मम हत्याओं से पूरा देश  गुस्से में है। जगह-जगह  प्रदर्शन  हो रहे हैं और वहशी  हत्यारों को फांसी की मांग की जा रही है। समाज  के इस विकृत चेहरे से दुनिया में देश  की छवि धूमिल हो रही है। विकास और प्रगति के कोई मायने नहीं रह जाते हैं अगर हम अपनी बेटियों को “हवस के भेडियों“ से न बचा पाएं। एक ओर जहां महिलाओं की भयवाह स्थिति से पूरा देश  चिंतित है, वहीं आस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में रविवार को सपन्न राष्ट्रमंडल  खेलों में बेटियों के शानदार प्रदर्शन से  देशवासी गौरवान्वित हुए हैं।  आठ साल बाद कॉमनवैल्थ गेम्स-2018 में  भारत ने 26 सोने के तमगे समेत 66 मेडल जीतकर अच्छा प्रदर्शन किया है। 2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल  खेलों में भारत ने सबसे ज्यादा 100 मेडल जीते थे। चार साल पहले इंग्लैंड के ग्लास्को में हुए  राष्ट्रमंडल  खेलों में भारत ने 64 मेडल जीते थे। 13 बिलियन आबादी वाला भारत अभी भी 24 मिलियन आबादी वाले आस्ट्रेलिया और 66 मिलियन आबादी वाले इंग्लैंड से काफी पीछे है। मेजबान आस्ट्रेलिया ने 80 गोल्ड मेडल समेत कुल 198 पदक जीते हैं और 45 गोल्ड समेत 136 मेडल हासिल करने वाला इंग्लैंड भारत से कहीं आगे है।  इस बार के राष्ट्रमंडल  खेलों में बेटियों का प्रदर्शन  इसलिए भी अभूतपूर्व रहा है कि  पहली बार राष्ट्रमंडल  खेलों में भाग लेने वाली हरियाणा की  16 साल की बेटी मनु भाखर ने गोल्ड मेडल जीत कर नया रिकॉर्ड बनाया है तो 35 वर्षीय  मेरी कॉम ने पहला  कॉमनवैल्थ मेडल जीता है। मनु भाखर के अलावा निशानेबाज तेजस्वनी सावंत ने भी गोल्ड कोस्ट में नया रिकॉर्ड  बनाकर देश  का नाम रोशन किया है। 22 साल की मनिका बत्रा ने राष्ट्रमंडल  खेलों में पहली बार भारत को टेबिल टेनिस में गोल्ड मेडल के अलावा चार-चार मेडल  दिलवाए। आधे गोल्ड मेडल (12) महिलाओं ने जीते है और एक गोल्ड मेडल मिक्स वर्ग (महिला-पुरुष ) में जीता गया है। राष्ट्रमंडल  खेलों में बेटियों की सफलता पर देशवासियों को गर्व है मगर इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें आज भी पुरुष  प्रधान समाज में भेदभाव और कडे  संघर्ष  का सामना करना पडता है। महाराष्ट्र  की निशानेबाज तेजस्वनी सावंत विदेशी  राइफल खरीदने के लिए पैसे तक नहीं जुटा पाई थी। अपनी बेटी के सपने को पूरा करने के लिए उनके पिता को मदद के लिए दर-दर भटकना पडा था। गोल्ड कोस्ट मे भारत को पहला गोल्ड मेडल दिलाने वाली वेटलिफ्टर मीराबाई चीनू प्रतिदिन  40 किलोमीटर साइकल चलाकर प्रशिक्षण लिया करती थी। लोहे के बार नहीं मिलते तो बांस के बार से प्रेक्टिस करती। मेरी कॉम ने जब बॉक्सर बनने की ठानी, उन्हें प्रोत्साहित करने की बजाए लोग-बाग उनका मजाक उडाया करते थे। मगर उन्होंने हार नहीं मानी। 222 किलोग्राम वेट उठाकर भारत के लिए गोल्ड जीतने वाली 22 साल की पूनम यादव को इस मुकाम तक पहुंचने के लिए कडा संघर्ष  करना पडा। पिता की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण पूनम को वेट लिफ्टिंग  के साथ-साथ पारिवारिक आर्थिक भार भी उठाना पडता था। गोल्ड कोस्ट मे कांस्य पदक जीतने वाली दिव्या काकरन को घर क बोझ उठाने के लिए गांव-गांव जाकर लडकों से कुश्ती  लड़नी  पडती क्योंकि ऐसा करने से ज्यादा कमाई होती मगर साथ में ताने भी मिलते। लगभग हर महिला के जूझारुपन के जज्बाती किस्से हैं। सामाजिक उत्पीडन के साथ-साथ भारत में महिला खिलाडियों को हर मुकाम पर नई चुनौती का सामना करना पडता है। कुश्ती  तो एक जमाने में महिलाओं के लिए लगभग वर्जित थी। इसे पुरुषों  की बपौती माना जाता था। बहरहाल, तरह-तरह की चुनौतियों के  बावजूद महिलाओं ने इस बार राष्ट्रमंडल  खेलों में पुरुषों  को भी पीछे छोड दिया है। भारत को इस बात का सकून है कि उसने पाकिस्तान की तुलना में कही ज्यादा मेडल जीते हैं।