सोमवार, 2 अप्रैल 2018

Corrupt Banking System

अस्सी के दशक में समाचार-फीचर एजेंसी चलाने के लिए  दो बैंकों से कर्जा लेना पडता था। कुछ अखबारों ने एजेंसी की सर्विस को तो खूब इस्तेमाल किया मगर एक  पैसे का  भुगतान नहीं किया और मैं डिफाल्टर बन गया।  संबंधित  बैंकों से सेटलमेंट का आग्रह किया मगर बात नहीं बनी। अततः मूल धन का चार गुना ज्यादा पैसा लौटाना पडा। बैंकों से कर्जा  लिया हे तो लौटाना पडता है। मगर यह व्यवस्था धनाढय और रसूखदार लोगों पर लागू नहीं होती है। आरबीआई की रिपोर्ट  के अनुसार देश  की 12 कंपनियां बैकों के बैड लोंस का 25 फीसदी से ज्यादा डकार चुकी है। और इनमें कई नामी गिरामी कंपनियां  शामिल हैं। भूषण स्टील बैंकों का 44,478 करोड रु दबाए हुए है। लैंको इंफ्राटेक 44, 364 करोड रु और एस्सार स्टील 37,248 करोड रु। विजय माल्या लगभग 10,000 करोड रु लेकर विदेश भाग गए हैं और बैंक्स हाथ मकते रह गए हैं  । भारतीय बैंकों का लगभग 9 लाख करोड डूब चुका है। रेटिंग  एजेंसियों के अनुसार इस साल बैंकों के बैड लोंस में 18 फीसदी का इजाफा हो सकता है। नेताओं समेत और भी कई बडे धुरंधर हैं, जिन्होंने अरबों डकार रखे हैं और माल्या की तरह ऐशो -आराम की जिंदगी जी रहे हैं। देश  में अभी तक ऐसा कोई कानून नहीं है कि बडे-बडे डिफाल्टर को धरा जा सके। बेचारा किसान अथवा आम आदमी कर्ज  से तंग आकर खुदकशी   कर लेता है। पर क्या आपने कभी किसी बडे कर्जदारों को लेकर ऐसा कुछ सुना या पढा है (इस  धृष्टता  के लिए क्षमा याचना)। बैंक किसानों और आम डिफाल्टर्स  की जमीन-जायदाद ली कुर्की लके अदालती आदेश ले आते हैं, उन्हें शर्मिदा और  प्रताड़ित  में कोई कसर नहीं छोडते   मगर बडे लोगों की जायदाद कुर्की के अदालती आदशों  पर भी अमल नहीं किया जाता । इस मामले में स्टेट बैंक प्रमुख अरून्धति भट्टाचार्य विजय माल्या के गोवा स्थित आलीशान बंगले की कुर्की को लेकर रोचक किस्सा सुना चुकी हैं। अदालती आदेश  के बावजूद प्रशासन ने बहाना-दर-बहाना बनाकर लंबे समय तक कुर्की को टाले रखा और अंत में जब अदालती के अवमानना नोटिस का सामना करना पडा, कुर्की का अनुपालना करवाने वाले बडे बाबू लंबी छुट्टी पर  चले गए। निष्कर्ष   यह है कि अपने देश  में  सिर्फ पैसा और रसूख बोलता है।