मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

Why Political Party, There Are Other Options Too ?

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक्दर से पहले, खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है“, समाज में कुछ कर दिखाने वालों पर यह षेयर सौ फीसदी  मौजूं होता है। “खुदी को बुलंद करना“ हर आदमी के बूते की बात नहीं होती है। जिनके इरादे मजबूत होतें, वही समाज के लिए कुछ कर पाते हैं।  देष की अलग-अलग  प्रोद्योगिक संस्थानों से पढे 50 पूर्व छात्रों ने ऐसा ही कुछ कर दिखाने की ठानी है। प्रतिश्ठित प्रोद्योगिक संस्थानों (आईआईटी) में पढकर मोटी तन्ख्वाह और ऊंचा पद पाना हर युवक का दिव्य सपना होता है और इसे हकीकत में बदलने के लिए दिन-रात परिश्रम करता है, मगर इन 50 पूर्व छात्रों ने अपनी पूर्ण कालीन  नौकरी-व्यवसाय छोडकर राजनीतिक पार्टी बनाई है। अनुसूचित जाति-जनजाति एवं अन्य पिछडा वर्ग के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के मकसद से गठित इस पार्टी का नाम बहुजन आजादी पार्टी रखा गया है। इस पार्टी को निर्वाचन आयोग के पास पंजीकरण के लिए भेजा गया है और इसकी प्रतीक्षा की जा रही है और इस बीच सभौ 50 आईआईटी एलुमिनी जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं। पार्टी के प्रवक्ता का कहना है कि वे आनन-फानन में काम नहीं करना चाहते हैं। मजूबत इरादों से राजनीतिक अखाडे में उतरे इन युवकों का आगे का सफर बेहद कठिन है और पग-पग पर उन्हें तरह-तरह की रुकावटों का  सामना करना पड सकता है। देष की ठेठ देसी सियासत और उसके काइंया नेता अपनी बिरादरी से बाहरी लोगों को जरा भी बर्दाष्त नहीं करते है और आज तक जितने भी “सज्जन“ सियासत में आए, दुर्ज्जनों ने भगा दिए या वे खुद ही मैदान छोड कर भाग गए। समकालीन भारतीय राजनीति:छल-कपट और झूठ-फरेब की पर्यावाची बन चुकी है और इसमें “सज्जन“ और योग्य व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है। सियासत में आईआईटियन की क्या दुर्दषा होती है और किस तरह “सज्जन“ व्यक्ति “दुर्जन“ और नायक से खलनायक बन जाता है, आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा  अरविंद केजरीवाल इसकी मिसाल है। देष में परपंरागत राजनीति से हटकर मर्यादित और मूल्य आधारित सियासत का वायदा करते-करते केजरीवाल खुद ही मर्यादा और मूल्यों की कद्र करना भूल गए। और पांच साल में उनकी हालत “न खुदा मिला, न विसाले सनम“ जैसी हो गई है।  बहरहाल, देष के 50 आईआईटियन राजनीतिक पार्टी बनाकर “अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछडे वर्ग  का कैसे उद्धार करेंगे इसका कुछ-कुछ अनुमान भी से हो जाता है। समाज के षोशित तबकों का उत्त्थन बगैर राजनीतिक दल बनाए और अच्छे से किया जा सकता है। आचार्य  विनोबा भवे ने “भूदानः आंदोलन चलाकर देष के भूमिहीनों के लिए अद्धितीय काम किया था। मदर टेरेसा का योगदान देष भुलाए भी नहीं भुलाया जा सकता है। बाबा आम्टे, पांडुरंग षास्त्री अथवले, गोपाल गणिष आगरकर सरीखे समाज सुधारकों का देष और समाज के लिए “राजनेताओं“ से कहीं बढकर योगदान दिया है। अन्ना हजारे लंबे समय से समाज सुधार का काम कर रहे हैं और उनका योगदान अरविंद केजरीवाल से कहीं ज्यादा बेहतर है। राजनीति सत्ता हथियाने का जरिया मात्र रह गया है। इससे सियासी नेताओं के सिवा समाज के किसी वर्ग का आर्थिक उत्त्थान नहीं हो पाया है। किसान बेहाल है, कामगारों का षोशण बदस्तूर जारी है। आजादी के सात दषक बाद भी दलितों का समग्र सामाजिक-आर्थिक उत्थान नहीं हो पाया है।  वृद्ध  गरीब और  बेसहारा को सामाजिक सुरक्षा मिले न मिले मगर सांसदों और विधायकों को मोटी पेंषन जरुर मिल रही है, अवाम को अब सियासी नेताओं पर  जरा भी भरोसा नहीं है। इन हालात में आईआईटियन को अगर वाकई दलितों और अन्य पिछडे वर्गर के लिए कुछ करना है तो राजनीति के अलावा और कई विकल्प है। ाजनीति में अपनी विष्वसनीयता को खतरे में डालने की बजाए, इन विकल्पों को आजमाया जाना ही उन युवाओं के लिए बेहतर होगा।