गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

सरकार का सिरदर्द

अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण कानून (एससी/ एसटी-प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज) पर सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले से सरकार का सिरदर्द  बढ सकता है और इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।  सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को सरकार की पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटीषन) पर अपनी 20 मार्च की व्यवस्था पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने 20 मार्च को एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी और आरोपी की तुरंत गिरफ्तारी से पहले शुरुआती जांच पर जोर दिया था। इस एक्ट के तहत आरोपी को जमानत नहीं दी जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपियों को जमानत भी दे दी। 2012 में सर्वोच्च न्यायालय ने  ही एससी-एसटी एक्ट के तहत आरोपी को जमानत की व्यवस्था को निरस्त कर दिया था।  20 मार्च  के फैसले से क्षुब्ध दलित संगठनों ने इस सोमवार (2 अप्रैल) को भारत बंद का आहवान किया था। बंद के दौरान प्रदर्शनकारियों  ने न केवल कानून-व्यवस्था की धज्जियां उडाई, बल्कि हिंसा में 9 निर्दोष  लोगों की मौत भी हो गई। बंद के एक दिन बाद राजस्थान में दलित नेताओं के घर-बार फूंक डाले और दलित बस्तियों को आग लगा दी गई। इस मामले में जिरह के दौरान एटॉर्नी जनरल ने कहा था कि सदियों से सामाजिक अत्याचार से पीडित दलित धारा 21 के सुरक्षा के हकदार है। सर्वोच्च न्यायालय ने इससे सहमति व्यक्त की है मगर अदालत का काम हर पक्ष को न्याय देना है।  सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि  एससी-एसटी एक्ट को ब्लैकमेल के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और किसी निर्दोष  को सजा नहीं दी जा सकती। योग्य जजों  ने यह भी कहा है कि अदालत से बाहर की घटनाएं सुनवाई और फैसले को प्रभावित नहीं कर सकती। बहरहाल, अदालत किसी भी  एक्ट की व्याख्या और समीक्षा ही कर सकती है, इसमें बदलाव करने का उसके पास कोई अधिकार नहीं है। यह काम विधायिका का है।   कानून बनने के बावजूद भी दलितों पर अत्याचार कम नहीं हो रहे हैं। दरअसल, सामाजिक व्यवस्था से उपजी विषमताओं का  समाधान कानून बनाकर नहीं किया जा सकता। इसके लिए समकालीन समाज में क्रांतिकारी सुधार लाने की जरुरत है। दलितों के सामाजिक-आर्थिक  उत्थान के लिए  राष्ट्रपिता  महात्मा गांधी ने किसी कानून का सहारा नहीं लिया, अलबता लोगों को छुआछूत के प्रति सजग किया था।  जन्म  से  कोई भी  छोटा या अछूत, हिंदू या मुसलमान नही होता है। समाज ही आदमी को बडा-छोटा बनाता है। महात्मा गांधी ने “छुआछूत को हिंदू शरीर में कोढ जैसा रोग बताया था। हिंदू समाज का दलित बनाम स्वर्णों  में बंटना भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक मंसूबों पर पानी फेर सकता है। भाजपा को पहले ही मुसलमान विरोधी माना जाता है। देश  की कुल आबादी का 16.6 फीसदी दलित हैं और 8.6 फीसदी जनजाति आबादी है। पंजाब में सबसे ज्यादा 32 फीसदी दलितों की आबादी है। दस दिन बाद सर्वोच्च न्यायालय में फिर से इस मामले की सुनवाई होनी है। तब तक सरकार के पास अपना मजबूत पक्ष तैयार करने का समय है। सरकार चाहे तो कानून को और सख्त भी बना सकती है मगर ऐसे कानून की ज्यादा प्रांसगिकता नहीं है जिससे सामाजिक विशमताएं उपजे और समाज और ज्यादा बंटे। सरकार को फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहिए। मई में कर्नाटक विधानसभा  के चुनाव है, इस राज्य में कांग्रेस सरकार ने लिंगायत बनाम विक्कालिगा बनाम वीरशैव लिंगायत में बांट रखा है और गेंद केन्द्र के पाले में डाल दी है। साल के अंत में मध्य प्रदेष, राजस्थान और छत्तीसगढ में  विधानसभा चुनाव होने हैं। दलितों के भारत बंद के दौरान सबसे ज्यादा हिंसा भी इन राज्यों में हुई है। मोदी सरकार के लिए ताजा मामला बहुत बडी चुनौती है।