शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

सामाजिक एकता की मिसाल

हैदराबाद के पुजारी ने दलित को अपने कंधों पर बिठाकर मंदिर के अभराण्य तक ले जाकर  सामाजिक समरसता की अद्धितीय मिसाल पेश  की है। देश  में सामाजिक एकता का संदेश  फैलाने के लिए हैदराबाद के चिरकुल बालाजी मंदिर के पुजारी ने गत सोमवार को यह  अनुष्ठान  सपन्न किया। 2700 साल पुराने “मुनी वाहन सेवा“ नाम का यह अनुष्ठान  भारत की सनातनी उदार और सामाजिक समरस व्यवस्था का द्योतक है।  इससे पता चलता है कि जात-पात के बावजूद भारतीय समाज के विभिन्न समुदायों में हमेशा  “ सामाजिक भाईचारा“ बना रहा है। सनातनी भारत में न तो प्राचीन काल में और न समकालीन समाज में समाज को बांटने की “ओछी“ मानसिकता रही है। आधुनिक भारत में सियासी पार्टियां और दबंग अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए यह काम भले ही बखूबी कर रही हों , मगर अवाम ने इसे कभी भी स्वीकार नही किया है। इसी कारण  कमजोर और पिछडे तबकों का सामाजिक-आर्थिक उत्थान  आज भी सबसे बडी चुनौती है। दक्षिण भारत में आज भी कई मंदिरों में अनुसूचित जाति से संबंधित लोगों को प्रवेश  की अनुमति नहीं है।  चाय की दुकानों पर दलितों के लिए अलग प्यालियों में चाय दी जाती है। उनकी महिलाओं का सामाजिक और  शारीरिक उत्पीडन किया जाता है और मांगने पर भी त्वरित तो दीगर रहा, देर से भी न्याय नही मिलता है। असहिष्णुता  के मौजूदा माहौल में हैदराबाद के पुजारी का यह संदेश  अनुकरणीय है। पिछले कुछ समय से दलित अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं मगर इसका भी विरोध होना  शुरु हो गया है। सुप्रीम कोर्ट  की अजा-जजा एक्ट के तहत त्वरित गिरफ्तारी के फैसले के खिलाफ दलितों के दो अप्रैल को आहुत “भारत बंद“ के  जवाब   में  10 अप्रैल के बंद से सामाजिक एकता विखंडित हुई है । इससे पहले पहली जनवरी को महाराष्ट्र  में भीमा कोरेगांव की 200वीं वर्षगांठ  मनाने पर भी अनुसूचित जातियों और सवर्णों के बीच जबरदस्त टकराव हुआ था। आजादी के सात दशक बाद भी देश  में सामाजिक और सामुदायिक समरसता मजबूत होने की बजाए उतरोत्तर कमजोर ही हो रही है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड  ब्यूरो के अनुसार 2015, 16 और 2017 के दौरान दलितों के खिलाफ अत्याचार के मामले बढे हैं। 2015 में दलितों के खिलाफ 38,670 मामले दर्ज  हुए थे। 2016 में 40, 801 मामले दर्ज  किए गए और सबसे ज्यादा भाजपा  शासित उत्तर प्रदेश , राजस्थान और बिहार में। 2017 में तो दलितों के खिलाफ दबंगो के अत्याचारों में और ज्यादा इजाफा हुआ था । पांच मई, 2017 को उत्तर प्रदेश  में सहारनपुर जिले के शब्बीरपुर गांव में सवर्णों ने दलितं के 50 से ज्यादा जला डाले थे। दो दिन बाद 7 मई को मध्य प्रदेश  के एक गांव में दलित दूल्हे को बेरहमी से पीटा गया। उसका बस इतना कसूर था कि वह बारातियों के साथ कार में सवार था। जून, 2017 में कर्नाटक में एक दलित को सवर्ण लडकी को भगा कर ले जाने के संदेह में पेड से बांधकर पीट-पीट कर अधमरा कर दिया गया। आंकडे इस बात के गवाह हैं कि जिन क्षेत्रों में कटटरपंतियों का दबदबा है, वहां सवर्णों की दबंगई कुछ ज्यादा ही है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद असहिष्णुता भी बढी है। बहरहाल,  दलितों पर अत्याचार का यह सिलसिला अंतहीन है। सरकार ने सख्त कानून बना रखे हैं मगर इन्हें लागू करने वालों में दलितों की संख्या बहुत कम है। इसलिए सख्त कानून भी कमजोर तबकों की मदद नहीं कर पा रहे हैं। सामाजिक टकराव भारत की “विविधता में एकता“ के बृहद भारत  के लिए शुभ नहीं है। यही एकता आज तक समस्त भारत को एकसूत्र में बांधे रखे हुए हैं। हैदराबाद के मंदिर पुजारी ने जो मिसाल पेश  की है,, उसे  पूरे देश श  में फोलो करने की जरुरत है।