बुधवार, 11 अप्रैल 2018

आरक्षण पर सामाजिक टकराव

जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ मंगलवार (10 अप्रैल) को आहुत “भारत बंद“ से इस माह दूसरी बार देश   में जनजीवन अस्त-व्यस्त हुआ है। हर छोटे-बडे मुद्दे पर जनजीवन अस्त-व्यस्त करना अवाम की जैसे आदत बन  गई है।  इससे पहले सुप्रीम कोर्ट  के आरक्षण संबंधी फैसले से क्षुब्ध  दलितों ने दो अप्रैल को “भारत बंद“ का आहवान किया था। इस बंद के दौरान हिंसक घटनाओं में 12 लोग मारे गए थे।  अकेले मध्य प्रदेश में ही आठ लोगों की मौत हो गई थी। मंगलवार को भारत बंद सवर्णों द्वारा बुलाया गया था। इस बंद का सबसे ज्यादा असर बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब   और राजस्थान में देखा गया। बिहार में फैली हिंसा में 12 लोग जख्मी हो गए।  बंद में हिंसा की आशंका के  दृष्टिगत  राजस्थान के जयपुर और मध्य प्रदेश  के भोपाल में धारा 144 लगानी पडी। बहरहाल, आरक्षण पर दलितों और सवर्णों में टकराव सामाजिक विषमता को और तल्ख कर सकता है। दलित-सवर्ण टकराव से भारतीय जनता पार्टी के “सामाजिक समरसता“ और:सबका साथ, सबका विकास“ की भी बघिया उधेड डाली है। देश  में लंबे समय से जाति आधारित आरक्षण का विरोध हो रहा है। 1989 में पिछडी जातियों को आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों  को लागू करने की कोशिश  में  भाजपा समर्थित वीपी सिंह सरकार को सता तक गंवानी पडी थी। इस दौरान देश  व्यापी आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान छात्रों ने आत्मदाह तक की थी। उग्र आंदोलन के कारण वीपी सिंह सरकार को अन्य पिछडी जातियों को आरक्षण देने से पीछे हटना पडा था। अन्य पिछडी जातियों को आरक्षण देने के लिए जनता पार्टी की सरकार ने 1979 में  मंडल आयोग का गठन किया था और दिसंबर, 1980 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट  राष्ट्रपति  को सौंपी थी। तब जनसंघ (भाजपा की पूर्वज) भी जनता पार्टी का हिस्सा थी। इससे पहले की जनता पार्टी की सरकार मंडल आयोग की सिफारिशें  लागू करती, सरकार ही गिर गई।  आयोग की रिपोर्ट केे मुताबिक  उस समय देश  की 52 फीसदी आबादी अन्य पिछडी जातियों की थी। मगर 2006 में नेशनल सेंपल सर्वे के अनुसार ओबीसी की आबादी गिरकर 41 फीसदी ही रह गई थी। तमिल नाडु में पिछडे वर्गों की आबादी 86 फीसदी है। महाराश्ट्र की 52 फीसदी आबादी पिछडी हुई है।  2006 कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने अन्य पिछडा वर्गों को आईआईटी, आईआईएम, एम्स  और अन्य उच्च  शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण देने का फैसला लिया था। पूरे देश  में इसका जबरदस्त विरोध हुआ था। देश  की 16.6 फीसदी अनुसूचित जाततियों को 15 फीसदी और 6.6 फीसदी जनजातियों को 7.5 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है। इस बात के  मद्देनजर  अक्सर यह सवाल क्यिा जाता है कि 41 फीसदी आबादी को 27 फीसदी आरक्षण क्यों? देश  में ओबीसी, अजा-जजा की कुल मिलाकर 64 फीसदी से ज्यादा आबादी है। इस लिहाज से इन्हें 64 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए। मगर अभी भी 64 फीसदी पिछडे तबकों को 49 फीसदी आरक्षण ही मिल रहा है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के अनुसार आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी से अधिक नहीं की जा सकती। इस फैसले के  बावजूद तमिल नाडु में 69 फीसद्ी आरक्षण है और राजस्थान में 54 फीसदी। तमिल नाडु ने 86 फीसदी पिछडी आबादी की  बिला पर ं अपने 69 फीसदी आरक्षण को  सुप्रीम कोर्ट में जायज ठहराया है। इस बात में दम है कि देष में अन्य पिछडा वर्गों, अनुसूचित और जनजातियो की आबादी 64 फीसदी से भी ज्यादा और कई राज्यों में इससे कहीं अधिक है, इसलिए मौजूदा आरक्षण व्यवस्था कहीं ज्यादा प्रांसगिक है। और सच्चाई यह भी है कि राजनीतिक दलों ने आरक्षण का मुद्दा मतदाताओं को लुभाने का जरिया बना रखा है। इसीलिए, किसी भी राजनीतिक पार्टी में आरक्षण का विरोध करने का मादा नहीं है। मगर समय का तकाजा है कि आरक्षण मुद्दे पर गहराई से आत्ममंथन किया जाना चाहिए।