भारत में आजादी के बाद बदस्तूर जारी घोटाला-दर-घोटाले ने वित्तीय सेक्टर को बर्बादी की कगार पर ला खडा कर दिया है और इसका खमियाजा आम आदमी को भुगतना पड रहा है। कभी नॉन बैंकिंग फाइनेस कंपनियों ( एनबीएफसी) के घोटाले , तो कभी पोंजी स्कीम की आड में निवेशकों को ठगने का धंधा़। और अगर कुछ नहीं तो बैंकों का फ्रॉड या प्रतिभूति घोटाले। नब्बे के दशक में प्रतिभूति घोटाले ने शेयर बाजार में कोहराम मचा दिया था। देश में निवेशकों से ठगी और धोखाधडी का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है मगर सरकार और आरबीआई मूक दर्शक बने रहते हैं। सरकार तब जागती है जब कंपनियां निवेशकों को भारी चूना लगा चुकी होती हैं। सांप के निकलने जाने से लाठी पीटने का क्या फायदा ? 70 और 80 के दशक में नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों की बहार थी और ये संसथाएं निवेशकों को भारी-भरकम ब्याज का लालच देकर आकर्षित करती थी जबकि कानूनन आरबीआई द्वारा तय ब्याज दरों से ज्यादा देना अपराध था। यह सिलसिला पिछली शताबदी के अंत तक चलता रहा और जब बंद हुआ तब तक छोटे और मझौले निवेशकों को अरबों रु का चूना लग चुका था। सुप्रीम कोर्ट को भी एक एनबीएफसी से निवेशकों के तीस हजार करोड रु से ज्यादा राशि वसूलने के लिए पूरा जोर लगाना पड रहा है। नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनिया बंद हुई तो पोंजी स्कीम की बाढ आ गई और इन फर्जी कंपनियों की धोखाधडी बंद हुई तो एक के बाद दूसरा बैंक फ्रॉड सामने आ रहा है । अभी पीएनबी से 12500 करोड रु की धोखाधडी की स्याही सूखी भी नहीं थी कि देश में निजी सेक्टर के सबसे बडे बैंक आईसीआईसीआई में 3250 करोड रु के घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। इस घोटाले में आईसीआईसीआई की मुख्य कार्यकारी अधिकारी का नाम भी सामने आया है। आरोप है कि आईसीआईसीआई ने बैंक की सीईओ के पति को लाभ पहुंचाने के लिए एक बडी कंपनी को 3250 करोड रु का कर्जा दिया। कंपनी ने इस क्रर्ज का एक पैसा भी नहीं लौटाया। अब सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है। इस मामले में सीबीआई आईसीआईसीआई की सीईओ, उनके पति, देवर और संबंधित कंपनी प्रमुख के लुकआउट सर्कुलर तक जारी कर चुकी है। आरोपियों के खिलाफ बैंकों में लगातार हो रहे फ्रॉड के मामले में बैंकों के कर्मचारियों का हाथ रहता है। इससे पहले सरकारी बैंक आईडीआईबी के एमडी को विजय माल्या को घाटे में चल रही किंगफिशर को “भ्रष्ट “ तरीके से ऋण देने के लिए गिरफ्तार किया जा चुका है। एक्सिस बंका की सीईओ सीबीआई बी जाँच के घेरे मैं है। आरबीआई द्वारा जारी आंकडों के अनुसार देश में सरकारी बैंकों में घोटालों का सिला इस कद्र बढ गया है कि हर चार घंटों में एक बैंक कर्मी को फ्रॉड के लिए गिरफ्तार किया जाता है। जनवरी 2015 से मार्च 2017 के दौरान 5200 बैंक कर्मियों को फ्रॉड में गिरफ्तार किया गया। 2013 से 2017 के दौरान बैंक फ्रॉड के 17,504 मामले पकडे गए और इनमें बैंकों की 66068 करोड रु की विषाल राशि डूब गई। 2016-17 के दौरान ही बैंक फ्रॉड के 3870 मामले पकडे गए और इनमें बैकों की 17,750 करोड रु की राशि डूब गई। 2016-17 में 86 फीसदी बैक फ्रॉड एडवांस (लोन) से संबंधित थे और पंजाब नेशनल बैंक के 99 फीसदी फ्रॉड लोन से जुडे थे। हैरानी इस बात की है कि बैंकों में फ्रॉड रोकने के लिए कडी निगरानी व्यवस्था के बावजूद घोटालों का जारी रहना साफ बताता है कि निगरानी व्यवस्था में भी भ्रष्टाचार है। भारत ही नहीं , हर देश को बैंकों के फ्रॉड और घोटाले से दो-चार होना पडता है मगर इनसे अर्थव्यवस्था को भारी कीमत चुकानी पडती है। भारत तेज रफ्तार से आगे बढती अर्थव्यवस्था है। घोटाले और फ्रॉड उसकी रफ्तार रोकते हैं। बैकों के निजीकरण से घोटाले नहीं रुक सकते। इन्हें रोकने के लिए निगरानी व्यवस्था को और चुस्त-दुरुस्त करने की जरुरत है।
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