मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

आक्रोशित दलित समाज

 अनुसूचित जाति-जनजाति (एससी-एसटी) संबंधित  सुप्रीम कोर्ट  के फैसले से क्षुब्ध दलित समाज सोमवार को सडकों पर उतर आया। दलित संगठनों द्वारा आहुत “भारत बंद“ के दौरान 9  लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए। मध्य प्रदेश  के ग्वालियर में कर्क्यू तक लगना पडा।    दलित सुप्रीम कोर्ट  द्वारा एस-एसटी एक्ट ( प्रिवेंशन  ऑफ एट्रोसिटीज) के तहत दर्ज  मामले में तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने से नाराज है। सुप्रीम कोर्ट  ने 20 मार्च  को एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी और इसके तहत होने वाले दर्ज मामलों में तुरंत गिरफ्तारी की जगह षुरुआती जांच पर जोर दिया था। दलितों को इस बात का गुस्सा है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में संतोष जनक  जिरह नहीं की और न ही मामले से जुडे विभिन्न पहलुओं को  अदालत में सही तरीके से पेश भी नहीं  किया।  सुप्रीम कोर्ट  की इस व्यवस्था से देश  में एससी-एसटी कानून का भय कम होने और दलितों पर अत्याचार के मामले बढने की आशंका है।  जिस दिन यह फैसला आया है, उसी दिन से सरकार कोर्ट में समीक्षा याचिका (रिवीजन पिटिशन) दायर करने की बात कह रही थी। सोमवार को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर भी कर दी। जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है, वह महाराष्ट्र  के सतारा जिले में कराड स्थित सरकारी फार्मेसी कॉलेज के एक दलित कर्मचारी से जुडा है। इस कर्मचारी ने अपने एसीआर में नकारात्मक टिप्पणियों के लिए आला अधिकारियों के खिलाफ  एफआईआर लिखा रखी है। कराड फार्मेसी कॉलेज के दलित कर्मचारी की गोपनीय रिपोर्ट  (एसीआर) में उसके आला अधिकारियों ने नकारात्मक टिप्पणियां की थीं।  इस एक्ट के तहत गिरफ्तारी पर अग्रिम जमानत तक की व्यवस्था नहीं है। एक्ट के तहत आरोपियों की गिरफ्तारी तय थी मगर मामला  अदालत पहुंवा।  सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस एक्ट का दुरुपयोग नहीं किया  जा सकता और  पहली नजर में आरोपी अधिकारियों के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है। अदालत ने आरोपियों को जमानत भी दे दी। आरोपियों की दलील थी कि उन्होंने अपने अधीनस्थ कर्मचारी की एसीआर में जो कुछ भी लिखा है, वह उनके विवेक पर आधारित है और इस बिला पर एससी-एसटी एक्ट के तहत कोई मामला नहीं बनता है । अगर इस तरह का मामला बनाया गया तो कोई भी अधिकारी निष्पक्ष  और विवेकपूर्ण एसीआर नहीं लिख पाएगा। इस मामले में दो राय नहीं हो सकती कि देश  में कानूनों का सदुुपयोग कम और दुरुपयोग ज्यादा किया जाता है। कानून उन लोगों के लिए मान्य होता है, जो उसका सम्मान करते  हैं। जो लोग मर्यादा तक का सम्मान नहीं करते, उनके लिए कैसा कानून? सभ्य समाज  विरोध के नाम पारा हिंसा, आगजनी  और निर्दोष  लोगों की  हत्या  सहन  नहीं करता है  मगर इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि देश  के कई हिस्सों में दलितों को आज भी  स्वर्णों द्वारा बराबरी का दर्जा  नहीं दिया जाता। मंदिरों में दलितों को प्रवेश  नहीं दिया जाता। गांव के कुंए से पानीं नहीं भरने दिया जाता। सामाजिक आयोजनों में दलितों को अलग से बिठाया जाता है। दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में आज भी चाय की दुकानों पर दलितों को अलग गिलास अथवा डिस्पोजल कप मे चाय दी जाती है। दबंगों द्वारा दलितों की सरेआम पिटाई की जाती हे। उनकी महिलाओं की अस्मिता लुटी जाती है। 2016 के दौरान देश  में दलितों पर अत्याचार के 40,801 मामले दर्ज हुए थे। सुप्रीम कोर्ट  ने एससी-एसटी एक्ट को संजीदगी से लागू करने पर बल दिया है। न्यायपालिका कानून की व्याख्या करती है, कानून बनाती नहीं है। कानून बनाना संसद का काम है और अगर सरकार को लगता है मौजूदा एक्ट के प्रावधान पैने नहीं है, सरकार नए कानून बना सकती है। तथापि ऐसे कानून की कोई प्रासंगिकता नहीं है, जिनसे सामाजिक विषमताएं बढे और समाज बंटे। इस तरह के संवेदनशील विषयों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।