लोकतंत्र के चौथे स्तंभ प्रैस पर जिस किसी ने भी नकेल डालने की कोशिश की, उसे मुंह की ही खानी पडी है। इतिहास इस बात का गवाह है। 70 के दशक में देश पर आपातकाल थोपने और मीडिया पर सेंसरशिप लगाने के लिए कांग्रेस सरकार को बहुत बडी कीमत चुकानी पडी थी। और बिडवंना देखिए कि जो पार्टी तब प्रैस की आजादी की सबसे बडी पैरवीकार हुआ करती थी, उसी पार्टी की सरकार को अब यह कांटे की तरह चुभ रही है। फर्जी अथवा झूठी (फेक न्यूज) खबरों के मामले में फजीहत झेलने के बाद अब सरकार ने ऑनलाईन, सोशल मीडिया और न्यूजपोर्टल को नियंत्रित करने की ठान ली है। इसके लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है। सरकारी नुमाइंदों के अलावा समिति में प्रैस काउंसिल, इंडियन ब्रॉडकास्टर्स फेडेरेशन और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधि में शामिल किए गए हैं। समिति के गठन का मूल मकसद ऑनलाइन मीडिया को भी प्रिंट और इलेट्रॉनिक मीडिया की तर्ज पर आचार संहिता के दायरे में लाना है। फेक न्यूज से संबंधित दिशा -निर्दोशों को वापस लेने के तुरंत बाद इस समिति का गठन किया है। इस बात में दो राय नहीं है कि ऑनलाइन एवं सोशल मीडिया को अविलंब आचार संहिता के दायरे में लाने की जरुरत है। झूठी खबरें प्रकाशित कर सनसनी फैलाने में ऑनलाइन एवं सोशल मीडिया और न्यूज पोर्टल्स का बहुत बडा हाथ रहता है। उतराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में सोशल मीडिया पर फैलाई गई एक झूठी खबर इसकी ताजा मिसाल है । झूठी खबर ने अगस्त्यमुनि क्षेत्र में तनाव पैदा कर दिया। सोशल मीडिया पर किसी ने एक फर्जी फोटो पोस्ट कर दी। इसमें एक युवती और युवक के आधे शरीर दिखाकर कहा गया कि एक समुदाय विशेष के युवक ने दूसरे समुदाय की युवती से बलात्कार किया है। इस पोस्ट से पूरे क्षेत्र में तनाव उत्पन्न हो गया। कुछ दुकानों से सामान बाहर फेंक गया। एक अन्य वाक्या केरल का है। लडकियां फोटो खिंचवाने स्टूडियो जाती हैं। मगर फोटोग्राफर उनकी तस्वीरों से छेडछाड कर पोर्न बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की धमकी देकर लडकियों कों ब्लैकमेल करता रहा। टीवी में इस तरह के किस्से आए रोज दिखाए जाते हैं। दोनों घटनाएं ऑनलाइन और सोशल मीडिया का खतरनाक मंशा से दुरुपयोग को उजागर करती है। निसंदेह ,सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम उठाना सरकार का दायित्व है। तथापि, फेक न्यूज के मामले में सरकार की पहल दिशाहीन है। पत्रकारों की सरकारी (पीएनबी) मान्यता को निरस्त करने से फेक न्यूज बंद होने से रहा। मौजूदा नियमों के तहत भी फेक न्यूज पर सरकार कभी भी पत्रकार की मान्यता निरस्त कर सकती है। तथापि, यह तय करना बेहद कठिन है कि कौनसी खबर फेक है। सरकारी मानदंडों पर हर ऐसी खबर (खोजी) फेक मानी जाएगी, जिसमें उसकी आलोचना की गई हो। सरकार की मंशा अगर वाकई फेक न्यूज को रोकने की है तो इसके लिए पत्रकारों की मान्यता रदद करने जैसे प्रभावहीन उपायों की जरुरत नहीं है। लोकतंत्र में इस तरह के दिशाहीन कदम स्वस्थ माहौल को प्रदूषित करते हैं। मोदी सरकार की “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता“ के प्रति संवेदनशीलता को लेकर मीडिया पहले ही संशक्ति है। लोकतंत्र स्वस्थ परंपराओं और मर्यादाओं के निर्वहन से फलत-फूलता है। भारत की सामाजिक और आर्थिक तरक्की में मीडिया का बहुत बडा योगदान है। मीडिया पर नकेल डालने से देश और समाज को किस कद्र झेलना पडता है , अवाम इस का खमियाजा आजादी से पहले और बाद में भुगत चुका है। सोशल और ऑनलाइन मीडिया का दायरा बहुत व्यापक है और इसकी पैठ भी गहरी है। समकालीन जीवन में सोशल मीडिया की भूमिका का काफी महत्व है। इसका दुरुपयोग रोकना जितना आवष्यक है, उससे कहीं ज्यादा जरुरी इसका सदुपयोग है। सरकार को फिजूल की बातों में समय नष्ट करने की बजाए सृजनात्मक कार्यों पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
यह ब्लॉग खोजें
ब्लॉग आर्काइव
- अप्रैल (2)
- मार्च (1)
- सितंबर (2)
- अगस्त (2)
- जुलाई (3)
- जून (2)
- मई (2)
- अप्रैल (4)
- मार्च (9)
- फ़रवरी (7)
- जनवरी (6)
- दिसंबर (11)
- नवंबर (7)
- अक्टूबर (4)
- सितंबर (10)
- अगस्त (22)
- जुलाई (2)
- जून (11)
- मई (12)
- अप्रैल (7)
- मार्च (6)
- फ़रवरी (1)
- दिसंबर (5)
- नवंबर (4)
- अक्टूबर (5)
- सितंबर (17)
- अगस्त (33)
- जुलाई (28)
- जून (21)
- मई (30)
- अप्रैल (20)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (23)
- जनवरी (23)
- दिसंबर (22)
- नवंबर (22)
- अक्टूबर (22)
- सितंबर (19)
- अगस्त (22)
- जुलाई (21)
- जून (19)
- मई (20)
- अप्रैल (19)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (20)
- जनवरी (19)
- दिसंबर (22)
- नवंबर (21)
- अक्टूबर (21)
- सितंबर (21)
- अगस्त (16)
- जुलाई (15)
- जून (20)
- मई (18)
- अप्रैल (21)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (21)
- जनवरी (24)
- दिसंबर (25)
- नवंबर (27)
- अक्टूबर (23)
- सितंबर (27)
- अगस्त (35)
- जुलाई (22)
Copyright 2015 | Chander M Sharma . Blogger द्वारा संचालित.






