रविवार, 15 मई 2016

How To Fight Pollution?

                             

 इस बात पर ज्यादा इतराने की जरुरत नहीं है कि देश  की राजधानी दिल्ली अब दुनिया का सर्वाधिक प्रदूषित शहर नहीं रहा है। विश्व   स्वास्थ्य संगठन (डव्ल्यूएचओ) की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली की आबो-हवा में सुधार आया है और अब यह नौंवे स्थान पर पहुंच गई है। निसंदेह, सीएनजी और सम-विषम स्कीम ने दिल्ली में प्रदूषण कम करने में अहम भूमिका निभाई है और अब स्मार्ट  सिटी से प्रदूषण के और कम होने की उम्मीद की जा सकती है।  डव्ल्यूएचओ ने प्रदूषण से निपटने के लिए भारत के प्रयासों की सराहना भी की है। मगर यह बात इतनी सुकून देने वाली नहीं है जितनी ड्ब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट का यह खुलासा कि दुनिया के सर्वाधिक बीस प्रदूषित जगहों  में दस तो भारतीय शहर  हैं। और सर्वाधिक पहले पांच शहरों में चार भारत के हैं। इनमें ग्वालियर, इलाहाबाद, रायपुर और पटना शामिल हैं। पंजाब के खन्ना और लुधियाना भी प्रदूषित शहरों की श्रेणी में  शामिल हो गए हैं। आधुनिक भारत में प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बडा खतरा बनता जा रहा है। दिल्ली में हर साल दस हजार से ज्यादा लोग प्रदूषण जनित रोगों से मरते हैं। और पूरी दुनिया में हर साल 70 लाख लोग वायु प्रदूषण से मरते हैं। इन मेंसे तीस लाख लोग बाहर की जहरीली हवा से मारे जाते हैं। भारत में 55 फीसदी लोग प्रदूषण से पीडित हैं । वायु प्रदूषण लोगों की सेहत बिगाडने वाले दस प्रमुख खतरनाक कारणों में  शुमार है।   सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती यह हे कि बडे-तो-बडे, छोटे श हर भी उत्तरोतर   प्रदूषण की चपेट में आ रहे हैं।  संसद के बजट सत्र में सरकार ने माना था कि देश  के कई छोटे शहर भी प्रदूषण की जद में आ रहे हैं। पंजाब और हिमाचल समेत देश  के टियर-दो के 74 शहरों मेंसे 41 व्यापक स्तर पर वायु और जल प्रदूशण की समस्या से जूझ रहे हैं। बढती आबादी, बेतरतीब निर्माण, गरीबी और देहातों से शहरों की ओर बढता पलायन जैसे प्रमुख कारण है, जिनसे शहरों में प्रदूषण बढता है। महानगरों में बढती वाहनों की संख्या प्रदूषण बढाने का प्रमुख कारण है तो देहातों में जल प्रदूषण की समस्या भी है। देश  के अधिकांश  शहरों और बस्तियों  मे पीने का पानी प्रदूषित पाया गया है।  एशियन डवलपमेंट बैंक की  2007 की रिपोर्ट के मुताबिक भारते के बडे शहरों में भी  शुद्ध  पीने के पानी की सप्लाई नहीं की जाती है, छोटे शहरों की हालत तो और भी खराब है। नदी -नालों पर निर्भर  गा्रमीण क्षेत्रों का और भी बुरा हाल है। अधिकतर पेयजल के परंपरागत स्त्रोत पूरी तरह से प्रदूषित हो चुके हैं। राष्ट्रीय  अस्मिता से जुडी गंगा का पानी बिल्कुल पीने लायक नहीं है। गंगा  को प्रदूषण से बचाने के लिए हालांकि बडी-बडी योजनाएं शुरू  की गई है मगर इसका प्रदूषण बढता ही जा रहा है। गंगा- यमुना के संगम इलाहाबाद  शहर का विश्व  के चार सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में  शामिल होना इस बात का प्रमाण है। इसी तरह गंगा के तट पर बसे बिहार की राजधानी पटना का भी इलाहाबाद के साथ  सर्वाधिक प्रदषित शहरों में शामिल होना भी यही दर्शाता   है कि गंगा और ज्यादा प्रदूषित होती जा रही है। भारत में  प्रदषित  पेयजल 22 फीसदी संचारी (क्म्युनिकेबल) रोगों के लिए जिम्मेदार है। 2012 में 3,883 लोग  प्रदषित पीने के पानी के कारण मारे गए थे। बहरहाल, बढते प्रदूषण से उभरते शहरों और बस्तियों को कैसे बचाया जाए, सरकार को इस पर गंभीरता से सोचना होगा। मोदी सरकार की “स्मार्ट सिटी “ योजना प्रदूषण रोकने के लिए कारगर साबित हो सकती है। पर भारत में महत्वाकांक्षी योजनाओं के  कार्यन्वयन का हश्र  संतोषजनक नहीं रहा है । बडी-बडी योजनाए जमीनी सच्चाई से कहीं दूर वातानुकुलित कमरों के भीतर तैयार की जाती हैं। अनावश्यक  विलंब, लालफीताशाही और करप्ट  तंत्र से अततः सब कुछ गुड-गोबर हो जाया करता है। गंगा को स्वच्छ बनाने की मोदी सरकार की योजना इस बात का प्रमाण है। स्मार्ट योजनाएं चलाने और उनके सफल  कार्यन्वयन  के लिए राजनीतिक स्वार्थ से मुक्त स्मार्ट  सोच, स्मार्ट कार्यशैली और स्मार्ट इच्छा शक्ति  की दरकार है।  प्रदूषण से निपटने के लिए युद्ध स्तर पर उपाय करने की जरुरत है । यह तभी मुमकिन हो पाएगा जब सरकार स्वार्थ  की राजनीति से उपर उठकर निस्वार्थ भावना से काम करे।