भारतीय जनमानस के बारे यह पक्की धारणा है कि वह दो बातों की जरुर परवाह करता है। पहली और अहम बात यह कि उसकी जेब में कितना पैसा आता है। साफ शब्दों में कहा जाए तो नौकरी, महंगाई और सुविधाएं आम आदमी के लिए सबसे ज्यादा मायने रखती हैं। दूसरी बात यह है कि सरकार में कितना दमखम है और पडोसी मुल्क पाकिस्तान और चीन के साथ सरकार कैसे निपटती है। पाकिस्तान के साथ मधुर संबंध की न तो भारत में बहुत ज्यादा उम्मीद है और न ही पाकिस्तान में। भारतीय अवाम यह सच्चाई अच्छी तरह जानती है कि अगर पाकिस्तान को भारत के साथ भाईचारा ही रखना होता, तो वह भारत से अलग क्यों होता? यही जमीनी हकीकत है और पाकिस्तान के साथ द्धिपक्षीय संबंधों की बुनियाद भी इसी सोच पर आधारित है। भारत लाख प्रयास कर ले पाकिस्तान शक्तिशाली भारत के वजूद को कभी नहीं मानेगा और इसी मकसद से वह चीन की शरण में गया है। भारत के लिए यही सबसे बडा खतरा है। पाकिस्तान की सैन्य शक्ति से निपटना भारत के लिए ज्यादा कठिन नहीं है मगर चीन और पाकिस्तान की साझी सैन्य ताकत का मुकाबला करना भारत के लिए आसान नहीं है। चीन की उपनिवेशवादी मानसिकता भारत के लिए सबसे बडा खतरा है। विवादित दक्षिण चीनी सागर में चीन की बढती सैन्य उपस्थित इस बात का प्रमाण है। चीन की इस हिमाकत से न केवल जापान और विएतनाम ही, बल्कि अमेरिका भी बौखलाया हुआ है। मगर सिवा धमकी देने अथवा वक्तव्य जरी करने के अलावा वे कुछ कर नहीं सकते। चीन पूरे एशिया में अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है। चीन लगातार अपनी सैन्य शक्ति भी बढा रहा है हालांकि भारत और जापान भी पीछे नहीं है। अमेरिकी के रक्षा मंत्रालय पैटागन ने गत शुक्रवार को जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि चीन ने हाल ही में अपनी सैन्य शक्ति में खासा इजाफा किया है और भारत के साथ लगती सीमा पर और ज्यादा सैनिको को तैनात किया है। चीन ने हालांकि इस रिपोर्ट की निंदा करते हुए कहा है कि अमेरिका उसकी दक्षिण चीनी सागर में उपस्थिति से बौखलाया हुआ है और इसलिए जानबूझकर दो पडोसी मुल्कों के बीच अविश्वास का माहौल बना रहा है। पेंटागन ने अपनी रिपोर्ट में यह आशंका भी जताई है कि चीन दक्षिण चीनी सागर में इस साल बडे पैमाने कम्युनिकेशन और सर्विलेंस सिस्टम को मजबूत करके अपनी सैन्य ताकत बढाएगा। चीन के रक्षा मंत्रालय ने पेंटागन की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि अमेरिका को उसकी अपनी करनी का खौफ सता रहा है, न कि चीन की बढती सैन्य ताकत का। चीन का कहना है कि सालों से उसकी नेशनल डिफेंस पॉलिसी रही है और इस पॉलिसी का मूल मकसद किसी पर आक्रमण करना नहीं, बल्कि अपनी संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा करना है। चीन की इस बात पर किसी को विष्वास नहीं है। चीनी काइंया कूटनीतिज्ञ माने जाते हैं। वे कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। भारत चीन से कई बार धोखा खा चुका है। 1962 में “हिंदी-चीनी भाई भाई” कहकर चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया था। 1967 में चीनी सेना सिक्कम में घुस आई थी। सिक्कम तब संप्रभु राज्य हुआ करता था और इसके बाद ही उसका भारत में विलय हुआ था। अरुणाचल प्रदेश को चीन आज भी विवादित क्षेत्र मानता है। 3,225 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा को लेकर चीन से आज तक समझौता नहीं हो पाया है। संयुक्त राष्ट्र में अक्सर चीन भारत का विरोध करता है और पाकिस्तान का साथ देता है। भारत को न्यूक्लियर सप्लायर गु्रप में नहीं आने देने के लिए चीन ऐडी-चोटी का जोर लगाए हुए है़। पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश -ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रतिबंधित करने की भारत के हर प्रयास पर चीन हर बार पानी फेर देता है। भारत को छकाना तो जैसे चीन की फितरत है। बहरहाल, चीन के बढती उपनिवेश वादी भूख से निपटने के लिए भारत को जापान और अमेरिका से हाथ मिलाना होगा। अमेरिका और जापान दक्षिण चीनी सागर में चीन की बढती सैन्य उपस्थिति से परेशान है । भारत के लिए भी यह बढा खतरा है। भारत को पाकिस्तान से इतना खतरा नहीं है, जितना चीन से। आंखे दिखाने से ही ड्रैगन को रास्ते पर लाया जा सकता है।
मंगलवार, 17 मई 2016
ऐसे तो चीन कभी नहीं सुधरेगा
Posted on 7:28 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारतीय जनमानस के बारे यह पक्की धारणा है कि वह दो बातों की जरुर परवाह करता है। पहली और अहम बात यह कि उसकी जेब में कितना पैसा आता है। साफ शब्दों में कहा जाए तो नौकरी, महंगाई और सुविधाएं आम आदमी के लिए सबसे ज्यादा मायने रखती हैं। दूसरी बात यह है कि सरकार में कितना दमखम है और पडोसी मुल्क पाकिस्तान और चीन के साथ सरकार कैसे निपटती है। पाकिस्तान के साथ मधुर संबंध की न तो भारत में बहुत ज्यादा उम्मीद है और न ही पाकिस्तान में। भारतीय अवाम यह सच्चाई अच्छी तरह जानती है कि अगर पाकिस्तान को भारत के साथ भाईचारा ही रखना होता, तो वह भारत से अलग क्यों होता? यही जमीनी हकीकत है और पाकिस्तान के साथ द्धिपक्षीय संबंधों की बुनियाद भी इसी सोच पर आधारित है। भारत लाख प्रयास कर ले पाकिस्तान शक्तिशाली भारत के वजूद को कभी नहीं मानेगा और इसी मकसद से वह चीन की शरण में गया है। भारत के लिए यही सबसे बडा खतरा है। पाकिस्तान की सैन्य शक्ति से निपटना भारत के लिए ज्यादा कठिन नहीं है मगर चीन और पाकिस्तान की साझी सैन्य ताकत का मुकाबला करना भारत के लिए आसान नहीं है। चीन की उपनिवेशवादी मानसिकता भारत के लिए सबसे बडा खतरा है। विवादित दक्षिण चीनी सागर में चीन की बढती सैन्य उपस्थित इस बात का प्रमाण है। चीन की इस हिमाकत से न केवल जापान और विएतनाम ही, बल्कि अमेरिका भी बौखलाया हुआ है। मगर सिवा धमकी देने अथवा वक्तव्य जरी करने के अलावा वे कुछ कर नहीं सकते। चीन पूरे एशिया में अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है। चीन लगातार अपनी सैन्य शक्ति भी बढा रहा है हालांकि भारत और जापान भी पीछे नहीं है। अमेरिकी के रक्षा मंत्रालय पैटागन ने गत शुक्रवार को जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि चीन ने हाल ही में अपनी सैन्य शक्ति में खासा इजाफा किया है और भारत के साथ लगती सीमा पर और ज्यादा सैनिको को तैनात किया है। चीन ने हालांकि इस रिपोर्ट की निंदा करते हुए कहा है कि अमेरिका उसकी दक्षिण चीनी सागर में उपस्थिति से बौखलाया हुआ है और इसलिए जानबूझकर दो पडोसी मुल्कों के बीच अविश्वास का माहौल बना रहा है। पेंटागन ने अपनी रिपोर्ट में यह आशंका भी जताई है कि चीन दक्षिण चीनी सागर में इस साल बडे पैमाने कम्युनिकेशन और सर्विलेंस सिस्टम को मजबूत करके अपनी सैन्य ताकत बढाएगा। चीन के रक्षा मंत्रालय ने पेंटागन की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि अमेरिका को उसकी अपनी करनी का खौफ सता रहा है, न कि चीन की बढती सैन्य ताकत का। चीन का कहना है कि सालों से उसकी नेशनल डिफेंस पॉलिसी रही है और इस पॉलिसी का मूल मकसद किसी पर आक्रमण करना नहीं, बल्कि अपनी संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा करना है। चीन की इस बात पर किसी को विष्वास नहीं है। चीनी काइंया कूटनीतिज्ञ माने जाते हैं। वे कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। भारत चीन से कई बार धोखा खा चुका है। 1962 में “हिंदी-चीनी भाई भाई” कहकर चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया था। 1967 में चीनी सेना सिक्कम में घुस आई थी। सिक्कम तब संप्रभु राज्य हुआ करता था और इसके बाद ही उसका भारत में विलय हुआ था। अरुणाचल प्रदेश को चीन आज भी विवादित क्षेत्र मानता है। 3,225 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा को लेकर चीन से आज तक समझौता नहीं हो पाया है। संयुक्त राष्ट्र में अक्सर चीन भारत का विरोध करता है और पाकिस्तान का साथ देता है। भारत को न्यूक्लियर सप्लायर गु्रप में नहीं आने देने के लिए चीन ऐडी-चोटी का जोर लगाए हुए है़। पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश -ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रतिबंधित करने की भारत के हर प्रयास पर चीन हर बार पानी फेर देता है। भारत को छकाना तो जैसे चीन की फितरत है। बहरहाल, चीन के बढती उपनिवेश वादी भूख से निपटने के लिए भारत को जापान और अमेरिका से हाथ मिलाना होगा। अमेरिका और जापान दक्षिण चीनी सागर में चीन की बढती सैन्य उपस्थिति से परेशान है । भारत के लिए भी यह बढा खतरा है। भारत को पाकिस्तान से इतना खतरा नहीं है, जितना चीन से। आंखे दिखाने से ही ड्रैगन को रास्ते पर लाया जा सकता है।






