बुधवार, 4 मई 2016

विंटेज पार्टी के नौसिखिए नेता


उत्तर प्रदेश  में पार्टी का बंटाधार कैसे किया जाए, कांग्रेस के समक्ष इस समय यह सबसे बडी चुनौती है। कांग्रेस के नेताओं को स्वंय इस  बात का ज्ञान नहीं है कि पार्टी  देश  के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश  में कब से सत्ता से बाहर है। 1984 के बाद से उत्तर प्रदेश  में कांग्रेस आज तक न तो लोकसभा और न ही विधानसभा चुनाव  में बहुमत सीटें हासिल कर पाई हैं।  1984 लोकसभा चुनाव  कांग्रस का अंतिम सर्वश्रेष्ठ   प्रदर्शन  रहा है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर के कारण कांगेस ने लोकसभा चुनाव में विपक्ष का सुपडा ही साफ कर दिया था। तब उतर प्रदेश  में कांग्रेस को 85 मेंसे 83 सीटों का प्रचंड जनादेश  मिला था। लेकिन इससे भी ज्यादा प्रचण्ड  जनादेश 1977 में कांग्रेस के खिलाफ  भी दिया गया था । 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उत्तर प्रदेश  की 85 सीटों मेंसे एक सीट भी निकाल नहीं पाई। इसके बाद से देश  की सबसे पुरानी पुरानी पार्टी का यह हश्र है कि पिछले लोकसभा चुनाव में  पार्टी  अस्सी मेंसे मात्र दो सीटें-राय बरेली से पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और अमेठी से राहुल गांधी- जीत पाई। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 21 सीटें जीती थी।  1984 के बाद उत्तर प्रदेश  में यह कांग्रेस का सबसे अच्छी परफॉर्मंस थी ।  मगर तीन साल बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी 403 विधानसभाई सीटों मेंसे बमुश्किल  28 निकाल पाई थी।  उत्तर प्रदेश  के बारे कहा जाता है कि जिसने इस राज्य को जीत लिया, उसने दिल्ली फतेह कर ली। 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजे इस बात के प्रमाण है। प्रचंड मोदी लहर के बलबूते  भाजपा ने 80 मेंसे  71 सीटे जीत कर दिल्ली फतेह कर ली। कांग्रेस का एक जमाने में उत्तर प्रदेश  पर एकछत्र राज हुआ करता था। मतदाताओं का धुर्वीकरण कराकर कांग्रेस मजे से   शानदार जनादेश  हासिल कर लेती। यह सिलसिला इंदिरा गांधी के समय तक जारी रहा अगर 1977 में पहली बार जनता लहर ने नेहरु परिवार का तिलिस्म तोड दिया।  1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उत्तर प्रदेश  में 85 की  85  सीट हलकों  में  बुरु तरह से हार गई  थी । यहां तक कि इंदिरा गांधी खुद राय बरेली से जनता पार्टी के उम्मीदवार समाजवादी नेता राज नारायण से हार गईं। तथापि मात्र अढाई साल बाद 1980 में हुए  लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश  में  85 मेंसे 50 सीटें जीतकर जनता पार्टी की लुटिया डूबो दी। तब तक जनता पार्टी पूरी तरह बिखर चुकी थी और पार्टी से अलग हुए किसान नेता चौधरी चरण सिंह की पार्टी 29 सीटें जीत कर दूसरे स्थान पर रही  थी । कुल मिलाकर स्थिति यह है कि 1989 के बाद से उत्तर प्रदेश  में कांग्रेस  आज तक उभर नहीं पाई है। पार्टी को इस स्थिति से कैसे उभारा जाए, इसके लिए कांग्रेस ने चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर  को हायर किया है। यह वही शख्स है जिनके बारे कहा जाता है कि बिहार में नीतिश  कुमार के गठबंधन को सत्ता में लाने का इनका बडा योगदान है। अब इसे सियासी दलों के राजनीतिक कौशल का दिवालियापन कहा जाए या नेट जमाने की सामरिक जरुरत  कि अब राजनितिक पार्टीज को बाहरी  रणनीतिकारों को हायर कर चुनाव जीतने की नौबत आन पडी है। किशोर  ने कांग्रेस को सुझाव दिया है कि अगर उत्तर प्रदेश   विधानसभा चुनाव में पार्टी की परफॉर्मेंस सुधारनी है  तो राहुल गांधी अथवा प्रियंका गांधी को मुख्यमंत्री का प्रत्याशी  घोषित किया जाए। किशोर  राहुल के पक्ष में है जबकि कार्यकर्ता प्रियंका गांधी को इंदिरा गांधी का “अवतार“ मानकर उन्हें आगे लाने की बराबर मांग कर रहे हैं। अपने पति और सास को खो चुकी माताश्री सोनिया गांधी दोनों को आगे लाने के पक्ष में नहीं है। कांग्रेस की दुविधा यह है कि पार्टी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बना चुकी है। राहुल को राष्ट्र्रीय  से प्रांतींय स्तर का नेता घोषित करना  पार्टी के लिए आसान नहीं होगा और खुद राहुल इसके लिए तैयार नहीं होंगे। मगर प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश  की कमान सौंपी जा सकती है, बशर्ते वे और उनका परिवार (ससुराल) इसके लिए स्वेच्छा से राजी हों। उतर प्रदेश  में समाजवादी और बीएसपी की जातिगत राजनीति और भाजपा की धर्म-कर्म  आधारित सियासत के लिए प्रियंका कांग्रेस के लिए असरदार विकल्प बन सकती है। बहरहाल, प्रशांत  किशोर  के सुझाव ने यह सच्चाई फिर उजागर की है कि कांग्रेस को अतोगत्वा नेहरु-गांधी परिवार पर ही आश्रित रहना पडता है और इस परिवार के सिवा देश  की “विंटेज“ पार्टी के पास कोई दमदार विकल्प नहीं है।