मंगलवार, 24 मई 2016

“युवा” अध्यक्ष बनाम लोढा समिति

भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर का 41 साल  की उमर में निर्विरोध भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का अध्यक्ष चुने जाने से हिमाचल प्रदेश  का सर गर्व से ऊंचा हुआ है। अब तक बीसीसीआई का अध्यक्ष  पद तक पहुंचना तो दीगर रहा, दुनिया के इस अमीरतम खेल बॉडी  में माकूल नुमाइंदगी हासिल करना भी  हिमाचल प्रदेश  के लिए मुमकिन नहीं हो रहा था। देश  की बडी-बडी  क्रिकेट बॉडीज की तुलना में हिमाचल प्रदेश  क्रिकेट संघ की कोई हैसियत नहीं है। तथापि , अनुराग ठाकुर की बदौलत हिमाचल प्रदेश  ने वह मुकाम हासिल किया है, जिसकी वह कल्पना भी नही करता था। वे बीसीसीआई के दूसरे युवातम अध्यक्ष हैं।  56 साल पहले 1963 में फतेह सिंह गायकवाड  33 साल की उमर में बीसीसीआई के युवातम अध्यक्ष बने थे। अनुराग ठाकुर 25 साल की उमर में  हिमाचल प्रदेश  क्रिकेट एसोशिएशन के  युवातम  अध्यक्ष चुने गए थे। यह भी एक रिकार्ड  है। ठाकुर को धर्मशाला में अंतरराष्ट्रीय  स्तर का क्रिकेट स्टेडियम बनाने का श्रेय भी जाता है। यह स्टेडियम देश  में सबसे अधिक ऊंचाई पर बनाया गया पहला अंतरराष्ट्रीय  स्तर का स्टेडियम है। इसी स्टेडियम की जमीन को लेकर हिमाचल प्रदेश  की कांग्रेस सरकार ने उन पर विजिलेंस का मामला चला रखा है।  अनुराग ठाकुर पूर्व मुख्यमंत्री प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल के सुपुत्र हैं। वे भारतीय युवा मोर्चे के अध्यक्ष भी हैं। बहरहाल, अनुराग ठाकुर ने नाजुक समय में बीसीसीआई अध्यक्ष पद संभाला है। उन पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त जस्टिस (रिटायर्ड) आरएम लोढा समिति की सिफारिशों  को लागू करने का दबाव रहेगा। समिति की एक अहम सिफारिश  यह है कि सियासी नेताओं को बीसीसीआई समेत सभी स्पोर्टस बॉडी से दूर रखा जाना चाहिए। विडंबना यह है कि अनुराग ठाकुर खुद कद्दावर सियासी नेता हैं हालांकि  अनुराग ठाकुर क्रिकेट से अंतरंग तौर पर जुडे  रहे हैं।  2000-01 सीजन के दौरान ठाकुर ने फर्स्ट  क्लास मैच में हिस्सा लिया था। तब  अनुराग हिमाचल प्रदेश  क्रिकेट टीम के कप्तान थे। शशांक  मनोहर द्वारा बीसीसीआई अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिए जाने के कारण खाली हुए पद पर  अनुराग ठाकुर चुने गए हैं। शशांक  मनोहर की छवि साफ रही है। अक्टूबर 2015 में जगमोहन डालमिया के निधन पर “मिस्टर क्लीन“  मनोहर बीसीसीआई अध्यक्ष बने थे। नवंबर 2015 में  शशांक  मनोहर एन श्रीनिवासन की जगह आईसीआई के चेयरमैन बने थे। उन्हे हाल ही में आईसीसी के “एक पद, एक व्यक्ति“  सिद्धांत के कारण बीसीसीआई अध्यक्ष पद छोडना पडा । बहरहाल, अनुराग ठाकुर के अध्यक्ष पद पर चुने जाने से लोढा समिति की सिफारिशों  पर पानी फिरता नजर आ रहा है। निसंदेह, देश  में क्रिकेट समेत तमाम खेल संगठनों को सियासी नेताओं के शिकंजे से मुक्त करने की अविलंब जरुरत है।  न्यायपालिका ने  इस दिशा  में सार्थक पहल की है मगर देश  के सियासतदान इस पर पानी फेरने पर आमादा है। अनुराग ठाकुर बेशक  क्रिकेट से जुडे हैं मगर उनकी पहचान क्रिकेट से कहीं ज्यादा राजनीति से है। ठाकुर 2008 से लगातार हिमाचल प्रदेश  के हमीरपुर लोकसभाई हलके से भाजपा के सांसद चुने जाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट  के निर्देश  पर अगर महान क्रिकेट खिलाडी सुनील गावस्कर अथवा शिवलाल यादव को बीसीसीआई का अंतरिम अधयक्ष बनाया जा सकता है, तो फिर सचिन तेंडुलकर जैसे महान खिलाडी क्यों नहीं? दरअसल, देश  में खेल  संगठनों का ढांचा ऐसा है कि इनमें प्रतिभा अथवा योग्यता की जगह रसूख और मनी पॉवर का दबदबा रहता है। इसीलिए सियासी नेता और उधोगपति बीसीसीआई और अन्य खेल संगठनों पर कब्जा जमाने में सफल हो जाते हैं।  स्पोटर्स  बॉडीज को सियासी नेताओं और धन्नासेठों के कब्जे से मुक्त कराने के लिए वैधानिक कवच की  जरुरत है। लोढा समिति ने भी ऐसी सिफारिश  की है। मगर सबसे बडा सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार ऐसा कर पाएगी?