मंगलवार, 3 मई 2016

उजाला से उज्ज्वला तक


श्रमिक दिवस पर गरीब परिवारों को मुफ्त रसोई गैस मुहैया कराने की उज्ज्वला योजना आरंभ करके प्रधानमंत्री मोदी ने देश  के सबसे बडे राज्य उतर प्रदेश  में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजा दिया है। इस योजना को लांच करते समय प्रधानमंत्री ने खुद स्पष्टीकरण  दिया कि वे बलिया में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजाने नहीं , बल्कि गरीबी के खिलाफ लडाई ल डने आए हैं। मगर यह स्पष्टीकरण  किसी के गले नहीं उतर रहा है। अगर गरीबी के खिलाफ लडाई लडने के लिए गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले परिवारों (बीपीएल) को एलपीजी कनेक्शन्स  ही देने थे, तो यह दिल्ली से ही किया जा सकता था। इसके लिए बिहार से सटे बलिया सरीखे सूदूर क्षेत्र में जाने की जरुरत नहीं थी। स्पष्ट  है मकसद सियासी था।  मोदी सरकार की अधिकांश  परियोजनाओं की घोषणा अथवा आधारशिला  इस साल उत्तर प्रदेश  में रखी जा रही है, क्योंकि राज्य में अगले साल के शुरू  में विधानसभा चुनाव होने है। हाल ही में प्रधानंत्री ने “स्टैंड अप इंडिया“ का नोएडा में शिलान्यास किया  था। पिछले साल बिहार प्रधानमंत्री का बडी परियोजनाओं के  शिलान्यास का डेस्टिनेशन हुआ करता था। तब बिहार में विधानसभा चुनाव होने थे ।   बिहार की तरह, भाजपा उतर प्रदेश  में भी सत्ता की प्रमुख दावेदार है। लोकसभा चुवाव के नतीजे भाजपा के लिए काफी सुखद रहे हैं । लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते भाजपा ने 80 मेंसे 71 सीटें जीतीं थीं। पार्टी का राज्य में यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ  प्रदर्शन  था । उज्ज्वला योजना के तहत मोदी सरकार देश  के पांच करोड बीपीएल परिवारों को अक्टूबर  2019 तक मुफ्त में रसोई गैस कनेक्शन और चूल्हे देगी।  अक्टूबर  2019 में  राष्ट्रपिता  महात्मा गांधी की 150वी जयंती मनाई जानी है। इस बात के मद्देनजर  मोदी सरकार ने यह लक्ष्य तय किया है। इसमें  भी राजनीतिक स्वार्थ  है। योजना पर आठ हजार करोड रु का खर्चा आएगा। निसंदेह, गरीबी रेखा से नीचे गुजर्-बसर करने वाले परिवारों को मुफ्त रसोईगैस की सबसे ज्यादा जरुरत है और उनके लिए मोदी सरकार की यह योजना वरदान साबित हो सकती है। मगर सबसे बडा सवाल यह है कि क्या बीपीएल परिवारों के पास रसोईगैस पर पकाने के लिए पर्याप्त भोजन की सामर्थ्यता  है ? भारत में अभी तक गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों (बीपीएल)  की स्पष्ट परिभाषा नहीं  है। कुछ साल पहले तत्कालीन योजना आयोग (मीजूदा नीति आयोग) ने  शहरी  क्षेत्रों में 32 रु तो देहातों में 26 रु से कम कमाए वाले व्यक्ति को गरीबी रेखा से नीचे माना था। यानी  शहरों में 32 रु और देहातों में 26 रु से ज्यादा कमाने वाला गरीबी रेखा से नीचे नहीं है। यहां तक कि नरेन्द्र मोदी के मुख्य मंत्रित्व समय में गुजरात सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन 10.8 रु कमाने वाले को गरीबी रेखा से नीचे माना था। इस तरह मे मानदंड गरीबों का मजाक है। अंतरराष्ट्रीय  स्तर पर प्रति दिन 1.90 डालर अथवा 126 रु कमाने वाला गरीबी रेखा से नीचे माना जाता है। इस मानदंड के अनुसार भी देश  की लगभग 32.7 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करती है। और अगर देसी मानदंड को आधार माना जाए तो 70 फीसदी से भी ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर -बसर कर रही है।  बहरहाल, मोदी सरकार की ताजा योजना बीपीएल परिवारों तक पहुंच पाएगी, इस पर भी संदेह है।  अब तक गरीबों के उत्थान के लिए जितनी भी योजनाएं चलाई गईं है, उनकी मलाई  करप्ट  नौकरशाही और सियासी नेता चाट गए हैं। दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा से भी गरीबों का खास उत्थान नहीं हो पाया है। मनरेगा के तहत लोगों को सौ दिन के रोजगार का कानूनन हक दिया गया है और इस योजना का मूल मकसद भी ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों को गारंटिड रोजगार मुहैया कराना है। इससे पहले सतहर के दशक में गरीबी कम करने  के लिए “गरीबी हटाओ“ और बीस सूत्री आर्थिक कार्यक्रम  चलाए गए थे। तथापि, सरकारी आंकडे यही बताते है कि पिछले चार दशकों में गरीबों क लिए बडी-बडी योजनाएं चलाने के बावजूद गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या में कोई गिरावट  नहीं आई है।  केन्द्र सरकार ने बिजली बचाने के लिए “उजाला“ स्कीम भी चला रखी है मगर यह भी बहुत ज्यादा कारगर सिद्ध नहीं हुई है। आखिर कब तक यह सिलसिला जारी रहेगा़?