बुधवार, 11 मई 2016

लांछन की गंदी राजनीति


देश  की आन-बान के लिए यह बात बेहद शर्मनाक है कि प्रधानमंत्री को अपनी शैक्षणिक योग्यता का प्रमाण सार्वजनिक रुप से देना पडे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीए-एमए कहां से पास की है, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस पर खूब बवाल मचा रही है। मामले को इतना तूल दिया जा चुका  है कि सोमवार को भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमिल  शाह को प्रधानमंत्री की बीए-एमए की डिग्रियां सार्वजनिक तौर पर दिखानी  पडी। शाह का साथ देने के लिए बतौर गवाह वित्त मंत्री अरुण जेटली भी मौजूद थे। जेटली सतहर के दशक (1975-77)  में दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र नेता थे। जेटली के अनुसार देश  में आपातकाल लगे होने के कारण नरेन्द्र मोदी को पढाई करने दिल्ली आना पडा था। इससे मामले की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। मगर अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के लोग हैं कि इन डिग्रियों पर भी सवाल उठा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने दिल्ली यूनिवर्सिटी  से बीए पास की है और उनकी डिग्री को सार्वजनिक तौर पर दिखाया भी गया है मगर आम आदमी पार्टी कह रही है कि यह डिग्री किसी और नरेन्द्र दामोदर मोदी की है। आम आदमी पार्टी के अनुसार मार्क शीटस नरेन्द्र कुमार दामोदर दास मोदी नाम पर जारी की गई है जबकि डिग्री में कुमार गायब है और इसमें नरेन्द्र दामोदर दास मोदी दर्ज है। आप का यह भी आरोप है कि मार्क  शीटस  1977 में जारी की गई मगर डिग्री 1978 में। यह मुमकिन नहीं है और जाहिर है कुछ गडबड है। आप का यह भी दावा है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के रिकार्ड  मुताबिक  1978 में अलवर (राजस्थान) के रहने वाले नरेन्द्र महावीर मोदी ने बीए की परीक्षा उतीर्ण  की थी। इसके अलावा और किसी भी नरेन्द्र मोदी ने  1978 में दिल्ली से बीए पास नहीं की। इसी बिला पर आप डिग्री को फर्जी करार दे रही है। यूनिवर्सिटीज अथवा विभिन्न बोर्डों द्वारा जारी डिग्री और मार्क शीटस में गलतियां पाया जाना आम बात है मगर इससे डिग्री को फर्जी करार नहीं दिया जा सकता। दिल्ली यूनिवर्सिटी ने खुद कहा है कि यह डिग्री उसी ने जारी की है। आम आदमी पार्टी बाल की खाल उतारने पर आमादा है। बहरहाल, देश  में शीर्ष   नेताओं की शैक्षणिक योग्यता को बहुत ज्यादा अहमियत नहीं दी जाती है। जिस देश  मे विश्व  के सबसे अधिक निरक्षर हों और जहां आजादी के सात दशक बाद भी साक्षरता दर विश्व  स्तर से काफी कम हो ( भारतः 74 फीसदी, विश्व: 84 फीसदी), वहां सियासी नेताओं की  शैक्षणिक   योग्यता ज्यादा मायने नहीं रखती। नई पीढी को  शायद ही मालूम हो कि कांग्रेस के कद्दावर द्रविड नेता कामराज मैट्रिक पास भी नहीं थे मगर पचास के दशक में वे मद्रास के अत्याधिक कुशल प्रशासक साबित हुए थे।  इंदिरा गांधी के पास भी बहुत बडी  शैक्षणिक  योग्यता नहीं थी मगर वे लोगों के दिलों पर राज करती थी। र्राजीव गांधी की  शैक्षणिक योग्यत भी  ज्यादा नहीं थी। काग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की  शैक्षणिक योग्यता पर भी जब-तब अंगुलियां उठाई जाती हैं। पीवी नरसिंह राव बहुत ज्यादा पढे-लिखे, प्रकांड विद्धान और कई भाषाओं में पारंगत थे मगर उनकी  शैक्षणिक  योग्यता उन्हे बहुत ज्यादा लोकप्रिय नहीं बना पाई। आदमी पार्टी मोदी सरकार को इसलिए निशाना  बनाए हुए हैं क्योंकि उसके कुछ नेता फर्जी डिग्री अथवा दस्तावेजों के लिए नपे गए हैं। देश  में लांछन  की राजनीति बराबर सर चढ कर बोल रही है। केजरीवाल और कांग्रेस प्रधानमंत्री की डिग्री को लेकर कीचड उछाल रहे हैं, तो भाजपा अगस्तावेस्टलैंड हेलिकॉप्टर स्कैम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी को निशाना बना हुए हैं। देश  की एक तिहाई आबादी भीषण सूखे से त्रस्त है और बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है, सियासी दलों को इसकी कोई चिंता नहीं है। ज्वलंत मुद्दे छोडकर, गौण मुद्दो को कैसे हवा दी जाती है, समकालीन भारतीय नेता यह बात बखूबी जानते हैं। लंाछन की राजनीति से रही-सही मूल्य आधारित राजनीति भी जाती रही है। देश  को इस विषय पर सोचना होगा।