गंगोत्री की पावन धरती उत्तराखंड में मोदी सरकार को न्यायपालिका ने बडा पाप करने से बचा लिया। मोदी सरकार सत्ता के बल पर इस पहाडी राज्य में लोकतंत्र की लगभग हत्या कर चुकी थी। धन्य है देश की न्यायपालिका जिसने न केवल लोकतंत्र की रक्षा की, बल्कि दल-बदलुओं को भी सबक सिखाया है। भाजपा की लाख कोशिशों के बावजूद उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार का फिर से पदस्थ होना केन्द्र और उसके नुमाइंदे राज्यपाल के मुंह पर करारा तमाचा है। मंगलवार (दस मई) को सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर बर्खास्त हरीश रावत सरकार ने विधानसभा में विश्वास मत प्राप्त करके राज्य में चुनी हुई सरकार के पदस्थ होने का रास्ता प्रशस्त कर दिया। 70 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के नौ बागी विधायक निलंबित हैं। इस स्थिति में 61 सदस्यीय सदन में हरीश रावत को सदन का विश्वास प्राप्त करने के लिए 31 विधायकों के समर्थन की दरकार थी। कांग्रेस के पास रेखा आर्य के भाजपा के साथ जाने के बाद केवल 26 विधायक थे मगर भीम लाल आर्य के पार्टी में आने से उसके विधायकों की संख्या फिर 27 हो गई। भाजपा के पास 28 विधायक थे । बसपा के 2, 3 निर्दलीय और उत्त्तराखंड क्रांति दल के 1 विधायक ने भी हरीश रावत का साथ दिया। इस तरह रावत बाजी मार गए। दराअसल, भाजपा की सारी उम्मीद कांग्रेस के नौ बागी विधयाकों पर टिकी हुई थी। अगर इन नौ विधायकों को मतदान का अधिकार मिल जाता, रावत शर्तिया हार जाते। मगर न्याायपालिका ने ऐसा नहीं होने दिया। केन्द सरकार के पास अब राज्य में राष्ट्रपति शासन जारी रखने का कोई बहाना नहीं बचा है। विश्वास मत सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में सपन्न हुआ था। इस बात के मद्देनजर केन्द्र के पास “कुटिल“ चालें चलने का भी कोई अवसर नहीं है। बुधवार को केन्द्र ने न्यायालय में माना कि हरीश रावत के पास सदन में बहुमत है। उत्तराखंड प्रकरण से मोदी सरकार की खासी फजीहत हुई है। राज्यपाल की सिफारिश पर उत्तराखंड में इस बिला पर राष्ट्रपति शासन लगाया गया था कि हरीश रावत के पास बहुमत नहीं है और बहुमत जुटाने के लिए विधायकों की “खरीद-फरोख्त हो सकती है। मगर विश्वास मत से एक दिन पहले तक दल-बदल का खेल बदस्तूर जारी रहा। एक-दूसरे के घर में सेंध लगाने की हरचंद कोशिश होती रही। कांग्रेस की विधायक रेखा आर्य ऐन समय पर पार्टी छोडकर भाजपा के साथ हो ली। भाजपा के बागी विधायक भीम लाल आर्य कांग्रेस में शामिल हो गए। जाहिर है यह सब फोक्ट में तो नहीं हुआ होगा। बहरहाल, भाजपा की उत्तराखंड को कांग्रेस मुक्त करने की चाल सफल नहीं हो पाई और इसे विफल करने में कांग्रेस का कोई बहुत बडा योगदान नहीं है। कांग्रेस ने सिर्फ इतना भर किया कि वह अदालत की शरण में चली गई। सच यह है कि हर बार की तरह इस मर्तबा भी कांग्रेस के “विभीषणों“ ने ही लंका ढहाई है। कांग्रेस के नौ बागी विधायक पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के समर्थक बताए जाते हैं और उनकी शह पर ही विधायकों ने पार्टी से बगावत की है। विजय बहुगुणा को इस बात का मलाल है कि हरीश रावत ने उन्हें हटाने के लिए साजिश रची थी। वे अपने घाव सहला रहे थे। भाजपा के उतराखंड प्रभारी विजय वर्गीज को यह बात बखूबी मालूम थी। स्थिति को भुनाने के लिए वर्गीज ने पहले साकेत बहुगुणा से संपर्क साधा और बेटे के मार्फत पिता विजय बहुगुणा को विश्वास में लिया। फिर शुरू हुआ रावत को हटाने का खेल। हरीश रावत से नाराज और मंत्री पद के भूखे विधायकों को पटाया गया। इस क्रम में नौ विधायक पार्टी छोडकर भाजपा के साथ मिलकर रावत सरकार गिराने को तैयार हो गए। हैरानी इस बात कि है कि विजय बहुगुणा अथवा भाजपा के रणनीतिकारों ने इस बात पर गौर क्यों नहीं किया कि दल-बदल कानून उनके आडे आ सकता है। बहरहाल, उत्तराखंड प्रकरण से केन्द्र को सबक लेना चाहिए कि हर बार आग से खेलना सुरक्षित नहीं होता है। कभी-न-कभी तो इस खेल में हाथ जलते ही हैं। अगले साल के शुरू में ही उत्तरखंड में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। ताजा प्रकरण ने भाजपा को चुनाव से पहले जनता के समक्ष “अपराधी“ बना दिया है और हरीश रावत के प्रति सहानुभुति उपजी है। भाजपा को अब तो समझ जाना चाहिए कि दल-बदल से आज तक किसी भला नहीं हुआ है।
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