एक बार फिर न्यायपालिका को ही लोकतांत्रिक की स्वस्थ परपंराओं का निर्वहन कराने के लिए दखल देना पडा है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को बहुमत साबित करने का एक मौका दिया है। इससे उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने भी यही व्यवस्था दी है। दुखद स्थिति यह है कि जो लोग लोकतंत्र के प्रहरी है, वही उसके पीठ पर वार कर रहे हैं। केन्द्र सरकार ने उत्तराखंड में अपनी शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करके जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करके राज्य में राष्ट्र्रपति शासन लगाकर “लोकतंत्र का गला घोंटा है, सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय की व्यवस्थाओं का यही निचोड है। उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार का कसूर इतना था कि उसका संबंध कांग्रेस से था। केन्द्र में सत्तारूढ मोदी सरकार ने अब चूंकि देश को कांग्रेस मुक्त करने का संकल्प ले रखा है, इसलिए साम, दाम, दंड, भेद के तौर-तरीके अपनाकर भाजपा कांग्रेस शासित राज्यों को अपदस्थ करने पर आमादा है। भाजपा, इसी साल के शुरु में पहाडी राज्य अरुणाचल प्रदेश में दल-बदल करवाकर कांग्रेस की सरकार गिरा चुकी है। इसके तुरंत बाद उत्तराखंड को निशाना बनाया गया और कांग्रेस के नौ विधायकों की बगावत की आड में हरीश रावत सरकार को गिराने का प्रयास किया गया। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस के नौ बागी विधायकों ने 18 मार्च को बजट पारित करते समय सरकार के खिलाफ वोटिंग की थी मगर विधानसभा अध्यक्ष ने आनन-फानन में बजट पास कर दिया था। बस, इसी बिला पर मोदी सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया। सच्चाई यह हे कि विधानसभा अध्यक्ष द्वारा कांग्रेस के नौ विधायकों की सदस्यता निरस्त किए जाने से भाजपा सरकार नहीं बना सकी। और जब न कांग्रेस की सरकार गिरी, न ही अपनी बनी, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसे लोकतंत्र नहीं, जंगलतंत्र ही माना जा सकता है। बहरहाल, देश की सर्वोच्च अदालत ने भाजपा के मंसूबों पर फिलहाल पानी फेर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को आगामी दस मई को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने का मौका दिया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि दस मई को दो घंटे के लिए सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक राज्य में राष्ट्रपति शासन उठा लिया जाएगा। विधानसभा जीवंत हो जाएगी और सुप्रीम कोर्ट के पर्यवेक्षक की निगरानी में सदन मे दो घंटे कें मुख्यमंत्री हरीश रावत विश्वास मत पेश करेगें। समूची कार्यवाही की वीडियो रिकार्डिंग की जाएगी और सुप्रीम कोर्ट में पेश की जाएगी। देश में, संभवतय, पहली बार ऐसा हो रहा है कि किसी राज्य से मात्र दो घंटे के लिए राष्ट्रपति शासन हटा लिया जाएगा और विधानसभा निलंबित नहीं रहेगी। हरीश रावत फिर दो घंटे के लिए मुख्यमंत्री होंगे। इससे पहले उत्तराखंड उच्च न्यायालय द्वारा 21 अप्रैल को राज्य में राष्ट्रपति शासन अवैध घोषित किए जाने पर हरीश रावत एक दिन के लिए और मुख्यमंत्री बने थे। उच्च न्यायालय ने 29 अप्रैल विधानसभा में बहुमत साबित करने की तारीख भी तय की थी। अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय की व्यवस्था रोक दी और राज्य में फिर राष्ट्रपति शासन लग गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी विश्वास मत को लोकतंत्र में बहुमत साबित करने का एकमात्र विकल्प माना है। पहले उच्च न्यायालय और अब सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था से मोदी सरकार को तगडा झटका लगा है। अब अगर हरीश रावत विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर लेते हैं, तो मोदी सरकार और जोर से झटका लग सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के नौ बागी विधायकों को दस मई के विष्वास मत में शामिल होने की अनुमति नहीं दी है। हाई कोर्ट सोमवार को इस मामले में फैसला सुनाएगा। इस स्थिति में लग रहा है कि रावत सदन में अपना बहुमत साबित कर लेंगे। उतराखंड प्रकरण ने मोदी सरकार की “अलोकतांत्रिक“ सोच को उजागर किया है। लोकतंत्र में जनादेश सर्वोपरि होता है। देश को कांग्रेस से मुक्त रहना है या नहीं, यह फैसला जनता करेगी। उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव होनेे है। मोदी सरकार जनता से कांग्रेस मुक्त शासन का जनादेश मांग सकती है। दिल्ली पहले ही कांग्रेस से मुक्त है। जो पार्टी दिल्ली पर लगातार 15 साल तक एकछत्र राज करती रही, उस पार्टी का आज विधानसभा में एक भी विधायक नहीं है। यह करिश्मा अरविंद केजरीवाल या भाजपा ने नही, दिल्ली की जनता ने कर दिखाया है। मोदी सरकार को इससे सीख लेने की जरुरत है। ताकत अथवा छल से किसी राज्य तो क्या, मोहल्ले को भी कांग्रेस मुक्त नहीं किया जा सकता।
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