प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत राजग सरकार ने दो साल पूरे कर लिए हैं। किसी भी सरकार की परफॉरमेंस का आकलन करने के लिए दो साल का समय पर्याप्त होता है। भारत में पांच साल के लिए सरकार चुनी जाती है और इतने ही समय में सरकार को अपने चुनावी वायदे पूरे करने पडते हैं। मोदी सरकार के अब तीन साल बचे हैं। दो साल में मोदी सरकार का रिपोर्ट कार्ड इतना भी बुरा नहीं है, सिवा इसके कि प्रमुख चुनावी वायदे अभी पूरे किए जाने बाकी हैं। चुनावी वायदे पूरे करने के लिए सरकार को पांच साल का समय दिया जाना चाहिए। दो साल में मोदी सरकार की सबसे बडी उपलब्धि यह रही है कि देश को घोटालों से निजात मिली है। संप्रग सरकार के कार्यकाल में घोटाला-दर-घोटाले का अनावरण होने से देश का सर नीचा हो रहा था, अब ऐसा नहीं हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने “न खुद खाऊंगा, न औरो को खाने दूंगा“ का वायदा पूरा किया है। मगर शीर्ष स्तर पर भले ही करप्शन (मिटी नहीं) गई हो मगर निचले स्तर पर घूसखोरी अभी भी बदस्तूर जारी है। राजस्व विभाग के कर्मी सरेआम संपति की रजिस्ट्री करते समय घूस लेते हैं और धडल्ले से कहते हैं “ पैसा ऊपर तक जाता है“। पंजाब तो इस मामले में खासा बदनाम है। पुलिसिए मामला दबाने के लिए खुलेआम घूस मांगते है। बिजली, पानी, राशन कार्ड बगैर घूस दिए नहीं मिलते। घूसखोर इंस्पेक्टरी राज अभी कायम है। सडक किनारे पानी-बीडी बेचने वालों से लेकर रेहडी-ठैले लगाने वालों से बाकायदा घूस ली जाती है। ट्रक ड्राइवर को पुलिस वाले को हफ्ता देना पडता है और इसकी बाकायदा डायरी में ऐंट्री की जाती है। कुल मिलाकर, रोजमर्रा की जिंदगी से जुडे हर मामले में घूस का बोलबाला है। आम आदमी के लिए शीर्ष स्तर पर के घोटाले ज्यादा मायने नहीं रखते क्योंकि इनसे उसका प्रत्यक्ष कोई सरोकार नहीं है। वह निचले स्तर के भ्रश्टाचार से आजिज आ चुका है। वैसे प्रधानमंत्री ने सहारनपुर की रैली में खुद अपना दो साल का रिपोर्ट कार्ड पढा है। मोदी के अनुसार पूर्व की सरकारों ने रसोई गैस जैसी बुनियादी जरुरत को भी अमीरों की सुविधा बना रखा था। झोपड-पट्टी में रहने वाले गरीब को रसोई गैस सपने जैसी लगती थी। उनकी सरकार ने पहली बार गरीब को रसोई गैस की सुविधा दी है। किसानों को फसल बीमा योजना और सॉयल टेस्टिंग कार्ड दिया गया है और गन्ना उत्पादकों का सारा बकाया चुकता कर दिया गया है। मगर प्रधानमंत्री ने भी माना कि निश्चित सिंचाई की सुविधा अभी भी किसानों से कोसों दूर है। किसानों को अगर सिंचाई सुविधा मिल जाती है, तो वे खेतों में सोना उगा सकते हैं। यानी किसान की सबसे बडी जरुरत अभी भी पूरी की जानी बाकी है। प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि आजादी के 75 साल पूरे होने (2022) तक किसानों और गरीब परिवार की आय दोगुनी हो जाएगी। प्रधानमंत्री ने केन्द्र और राज्यों के संबंधों का भी उल्लेख किया है। अभी तक 65 फीसदी वित्तीय संसाधन केन्द्र के पास होते थे और 35 फीसदी राज्यों के पास। मोदी सरकार ने इसे बदल दिया है। अब 35 फीसदी केन्द्र के पास हैं, 65 फीसदी राज्यों के पास। मोदी कहते हैं वे प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि प्रधान सेवक है। मोदी की इस तरह की विनम्रता से ही लोग-बाग उनके कायल हैं। मगर कहते हैं लच्छेदार बातों से पेट नहीं भरता। भरपूर पेट भरने के लिए रोजगार चाहिए और महंगाई पर नियंत्रण। बहरहाल, आम आदमी अभी भी मोदी सरकार से “अच्छे दिन“ की उम्मीद कर रहा है। और उसके अच्छे दिन तभी आएंगे जब खाने-पीने की चीजें सस्ती हों; गरीब और मध्यम वर्ग को पक्का रोजगार, स्थायी आमदन और बुढापे में पेंशन मिले। आंकडों में भले ही मुद्रा-स्फीति कम हुई है मगर दाल, फल-सब्जी, दूध, आटा जैसी पेट भरने के लिए जरुरी चीजों के दाम कम होने की बजाए बढते ही जा रहे हैं। कर्ज भी महंगा है, इसलिए मैन्युफेक्चर्गि सेक्टर उठ नहीं पा रहा है और संतोशजनक रोजगार सृजन भी नहीं हो पा रहा है। आम आदमी बस एक ही सवाल करता है“ मोदी जी अच्छे दिन कब आएंगे“ ?
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