गुरुवार, 26 मई 2016

नीट पर “बदनीयत“

 मोदी सरकार ने कॉमन मेडिकल प्रवेश  परीक्षा (मेडिकल एंट्रेस टेस्ट- नीट) को एक साल टालने के लिए अध्यादेश  जारी करके कोई बडा काम नहीं किया है। मंगलवार को  राष्ट्रपति  द्वारा स्वीकृति दिए जाने के बाद इस आशय का अध्यादेश  जारी कर दिया गया। राष्ट्रपति  के पास किसी भी अध्यादेश  को स्वीकृत करने के अलावा कोई चारा  नहीं होता है। संवैधानिक व्यवस्था है कि राष्ट्रपति को  सरकार (मंत्रिमंडल) के हर अच्छे-बुरे , सही-गलत फैसले पर अपनी मुहर लगानी ही पडती है। राष्ट्रपति ज्यादा-से-ज्यादा सरकार से सिर्फ  एक बार  स्पष्टीकरण  मांग सकते है। सरकार का जो भी स्पष्टीकरण  हो, इसके बाद  राष्ट्रपति को अध्यादेश  पर आंख मूंद कर हस्ताक्षर करने पडते हैं। केन्द्रीय स्वास्थय मंत्री जेपी नड्डा ने सोमवार को राष्ट्रपति से मिलकर सरकार का पक्ष रखा और उन कारणों को गिनाया, जिनके चलते सरकार को एक साल के लिए  कॉमन मेडिकल प्रवेश  परीक्षा को टालना पड रहा है। राष्ट्रपति संतुष्ट  न भी हों, उन्हें  इसके बाद अध्यादेश  को स्वीकृति देनी ही पडती है। यही भारत का संविधान है। अध्यादेश  के लागू होते ही सरकारी मेडिकल कॉलेजों को अलग से मेडिकल एंट्रेस टेस्ट लेने की छूट होगी। मगर प्राइवेट कॉलेजों पर यह छूट लागू नहीं होगी। उन्हें नीट के तहत ही दाखिला देना पडेगा। यह छूट केवल एक साल के लिए है। अगले साल से देश  भर में मेडिकल कॉलिजों के दाखिले  कॉमन मेडिकल प्रवेश  परीक्षा के आधार पर ही दिए जाएंगें। सवाल यह है कि एक साल का विलंब भी क्यों  और वह भी केवल सरकारी मेडिकल कालिजों के लिए? अगर प्राइवेट कॉलेज कॉमन मेडिकल प्रवेश  परीक्षा के तहत दाखिला दे सकते हैं तो सरकारी मेडिकल कॉलेज क्यों नही। और यह क्या बात हुई कि एक ही राज्य में सरकारी मेडिकल कॉलेजों का दाखिला राज्य की प्रवेश  परीक्षा से हो और प्राइवेट कालिजों का दाखिला नीट से। जाहिर है सरकार दोहरे मानदंड अपना रही है। इस छूट के बावजूद दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मेडिकल दाखिले  कॉमन मेडिकल प्रवेश  परीक्षा के आधार पर देने का ऐलान किया है। अगर दिल्ली सरकार ऐसा कर सकती है, तो बाकी राज्य क्यों नहीं कर सकते? देश  की शीर्ष  अदालत ने इस साल से ही पूरे देश  में मेडिकल कालिजों में दाखिले के लिए  कॉमन मेडिकल प्रवेश  परीक्षा-नीट को  अनिवार्य  कर दिया था। बहरहाल, इस पूरे मामले में अदालत की कभी “हां“ तो कभी “ना“ ने न केवल छात्रों को , अलबता राज्यों की सरकारों को भी पशोपेश  में डाल रखा है। वेसे, पूरे देश  में  कॉमन मेडिकल प्रवेश  परीक्षा का आइडिया केन्द्र सरकार का है। मेडिकल कांउसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने मूलतः कॉमन मेडिकल प्रवेश  परीक्षा 2012 से शुरु करने का ऐलान किया था मगर सीबीएसई  तब इसके लिए तैयार नहीं थी। इसके अलावा आंध्र प्रदेश , कर्नाटक, तमिल नाडु, गुजरात और पश्चिम  बंगाल ने इस बिला पर नीट का विरोध किया कि उनके  और एमसीआई के  पाठयक्रम में जमीन आसमान का अंतर है। इसके बाद नीट को एक साल के लिए टाल दिया गया। 5 मई 2013 को पहली बार पूरे देश  में कॉमन मेडिकल एंट्रेस टेस्ट (नीट) लिया गया। मगर कुछ लोग नीट के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय चले गए और 18 जुलाई  2013 को न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी। न्यायालय ने यह व्यवस्था भी दी कि एमसीआई को मेडिकल कॉलेजों की प्रवेश  प्रकिया में दखल देना का कोई अधिकार नहीं है। इस फैसले के बाद  2013 की नीट परीक्षा के परिणाम अधर में लटक गए। सीबीएसई ने मेरिट लिस्ट बनाई, इसके हिसाब से दाखिले भी हुए मगर मामला अदालत के विचाराधीन था, इसलिए छात्रों के भविष्य  पर अनिश्चितता  की तलवार लटकती रही। अब कही जाकर 11अप्रैल, 2016 को सर्वोच्च न्यायालय की पांच-सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने मेडिकल एंट्रेस टेस्ट-नीट को अनिवार्य कर दिया है। बहरहाल, नीट को लेकर अनिश्चितता  की स्थिति ने छात्रों के करियर  से खासा खिलवाड किया है। अब यह  अनिश्चितता   हमेशा  के लिए खत्म हो जानी चाहिए।