शुक्रवार, 13 मई 2016

सूखे पर “सूखी“ चिंता


देश  में व्याप्त सूखे से कैसे निपटा जाए, अगर यह बात भी न्यायपालिका को ही बतानी पडे तो सरकार किस काम? बुधवार को सर्वोच्च  न्यायालय ने सूखे की स्थिति पर केन्द्र और राज्यों की सरकारों के “शुतुरमुर्ग जैसे रवैए“ पर कडी फटकार लगाई। न्यायालय ने साफ शब्दों  में कहा कि केन्द्र और राज्यों की सरकारे अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से बच नहीं सकती। देश  के शीर्ष  स्वत्रंतता सेनानी बाल गंगाधर तिलक को उद्धृत करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा “ समस्या संसाधनों अथवा क्षमता की कमी की नहीं है, बल्कि  इच्छा शक्ति  की कमी की है“। यानी देश  की शीर्ष   अदालत ने भी माना है कि सूखे पर केन्द्र और राज्यों में इच्छा शक्ति  की कमी है। और सच भी यही है कि समकालीन सियासतदानों में आम आदमी से जुडे ज्वलंत मुद्दों को निपटाने के लिए इच्छा शक्ति  की कमी है।  इसी कारण अधिकतर समस्याओं का संजीदगी से हल नहीं ढूंढा जाता। राज्य सूखे की स्थिति को लेकर कितने गंभीर हैं, इसका पता इसी बात से चलता  है कि बिहार, गुजरात और हरियाणा अभी तक यह तय नहीं कर पाएं है कि इन राज्यों में सूखा पडा भी है या नहीं। इसके लिए भी न्यायालय को केंद्रीय कृषि  सचिव को इन राज्यों के मुख्य सचिवों से बैठक करने के निर्देश  देने पड हैं।  इसी वजह सूखे पर सर्वोच्च न्यायालय को कहना पडा कि यदि केन्द्र और राज्यों की सरकारें सूखे से उत्पन्न संकट पर कारगर कदम उठाए में नाकाम रहती हैं, तो न्यायालय उचित निर्देश  जारी करने के लिए बाध्य हो सकता है। न्यायालय ने केन्द्र को सूखे पर तीन माह के भीतर राष्ट्रीय  आपदा राहत कोष  स्थापित करने एवं स्पेशल टास्क फोर्स तथा राष्ट्रीय  योजना बनाने के निर्देश  दिए हैं। यह स्थिति और भी दुखद है कि बार-बार सूखे पडने के बावजूद आज तक इससे निपटने के लिए कोई  राष्ट्रीय  योजना नहीं बन पाई है। सूखे को लेकर केन्द्र और राज्यों की उदासीन रवैए से यही  निष्कर्ष  निकलता है जैसे सूखा पीडित राज्यों में “प्रशासन और सरकार“ पर भी सूखे की मार पडी है। वैसे देश  की समकालीन सरकार का प्राकृतिक आपदा के समय तहस-नहस अथवा नाकाम हो जाना नई बात नहीं है। जून 2013 में उत्तराखंड में आई प्रलंयकारी बाढ के समय तत्कालीन बहुगुणा सरकार पीडितों की समय पर मदद करने अथवा राहत पहुंचाने में बुरी तरह विफल रही थी। तब सेना को ही आगे आना पडा था। सेना ने बाढ में फंसे   110,000 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला था। सितंबर, 2014 में कश्मीर  घाटी में आई बाढ में राज्य का प्रशासनिक अमला भी डूब गया था और कई दिनों तक सरकार कहीं नजर नहीं आई थी। महाराष्ट्र  के लातूर जिले में इन दिनों भीषण सूखा पडा है और लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं मगर भरष्ट  नौकरशाही पानी को अमीरों को बेच रही है। सियासी नेता चुपचाप तमाशा  देख रहे हैं। संसद के बजट सत्र के दौरान भी बमुश्किल  कुछ देर के लिए एक-आध बार सूखे पर चर्चा  हुई। संसद में सूखे से कही ज्यादा उत्तराखंड, श्रीनगर स्थित एनआईटी और अगस्तावेस्टलैंड मामले छाए रहे।  उत्तर प्रदेश  से भाजपा सांसद भैरो प्रसाद मिश्रा कई बार लोकसभा में सूखे पर चर्चा  की मांग करते रहे मगर उनकी आवाज अन्य ममालों में दबकर रह गई। देश  के दस राज्यों में जबरदस्त सूखा पडा है। एक तिहाई क्षेत्र में लगभग अकाल जैसी स्थिति है। न पीने को पानी है और न ही रोजगार। खाने के लाले पडे हैं मगर जनता के नुमाइदों को वातानुकूलित संसद में सूखे पर एकमत से आपातकालीन उपाय करने के लिए प्रस्ताव पारित करने की फुर्सत तक नहीं मिली। हर बार की तरह इस बार भी न्यायपालिका को ही पहल करनी पडी। सूखे से देश  को 6.50 लाख करोड रुपए के नुकसान होने का अनुमान है। अभी बरसात आने तक तीन सप्ताह लग सकते हैं, इसलिए नुकसन बढ सकता है। सूखा पीडित मराठवाडा में बरसात में भी बहुत ज्यादा पानी नहीं बरसता है। पिछले कई सालों से यह क्षेत्र भीषण सूखे से पीडित हैं। यही हाल तेलंगाना, ओडीशा  और आंध्र प्रदेश  का है। देश  के चंद लोग सरकारी बैंकों का 170 अरब डॅालर अथवा लगभग 11225 अरब रुपए हडप कर गए है। इस विशाल रकम से पूरे देश  को हरा-भरा किया जा सकता है। आखिर, देश  का आम आदमी कब तक यू ही शोषित  होता रहेगा। हर चीज की हद होती है। पानी सर से गुजर रहा है। हर काम के लिए न्यायपालिका पर आश्रित रहने से विधायिका और कार्यपालिका की रही-सही विश्वसनीयता  भी जाती रहेगी।