मंगलवार, 31 मई 2016

राष्ट्रीय अस्मिता से जुडी है खादी

                       

नरेन्द्र मोदी सरकार के दो साल पूरा होने के साथ ही देष में खादी एवं ग्रामोद्योग के उत्पादों की बिक्री में खासा इजाफा होना स्वदेशी  अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है। खादीं की ब्रिकी में वृद्धि का पूरा श्रेय  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री खादी के सबसे बडे ब्रांड एम्बेेस्डर हैं। वे खुड खादी वस्त्र पहनते  हैं और औरों को भी खादी पहनने को कहते हैं।  केन्द्र में सत्तारूढ होते ही प्रधानमंत्री ने देशवासियों से “ खादी पहनने और इसे प्रोत्साहित करने“ (वीयर खादी, प्रोमोट खादी) का आहवान किया था। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते भी नरेन्द्र मोदी ने 2012 में  राष्ट्रपिता  महात्मा गांधी की जयंती पर “ खादी पहनो“ का आहवान किया था। इसी के फलस्वरुप गुजरात में खादी का खासा चलन बढा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी “मन की बात“ में कई बार जनमानस से खादी पहने और इसे प्रोत्साहित करने का आहवान कर चुके हैं। सितंबर, 2015 में “मन की बात“ में लोगों से खादी पहनने का आहवान करते ही दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित प्रतिष्ठित  खादी एवं ग्रामोद्योग भवन में मात्र दस दिन के भीतर खादी वस्त्रों की बिक्री में 88 फीसदी का इजाफा हुआ था। और खादी खरीदने वालों में लगभग 70 फीसदी युवा थे। आंकडों के मुताबिक पहली बार खादी कपडों की ब्रिकी में 29 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है। सुखद स्थिति यह है कि देश  में लगातार सूखे के कारण जहां बडी-बडी कंपनियों (इंडिया इनकॉपोर्रेट) की ब्रिकी में गिरावट आई है, वहीं खादी एवं ग्रामोद्योग के उत्पादों की ब्रिकी बढी है। बडी कंपनियां विज्ञापनों पर भारी-भरकम राशि  खर्च करती है और उनका उत्पादन पूंजी उन्मुख (केपिटल इंटेसिव) होता है।  बडी कंपनियां डीलर नेटवर्क  के जरिए अपने उत्पाद बेचती हैं। इससे उनकी लागत में खासी वृद्धि होती है और उत्पाद महंगे। बडी कंपनियों की ब्रिकी लागत ही  70 फीसदी से ज्यादा होती है।  खादी एवं ग्रामोद्योग के उत्पाद इसकी तुलना में कहीं ज्यादा सस्ते होते हैं।  ये उत्पाद देश  के लगभग सात लाख परिवारों द्वारा तैयार किए जाते हैं। इन उत्पादों का एक छोटा सा भाग ही खादी एवं ग्रामोद्योग के बिक्रय केन्द्रों के माध्यम से बेचा जाता है। ज्यादातर छोटे एवं घरेलू उपभोग के उत्पाद सीधे दुकानों  अथवा हाट बाजार लगा कर बेचे जाते है। खादी ग्रामोद्योग के तहत पापड, हीना, शहद से लेकर तेल-साबुन और फूड से लेकर हैडलूम-हैंडिक्रॉफट उत्पाद तैयार किए जाते हैं। 2015-16 के दौरान खादी-ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री 14 फीसदी वृद्धि के साथ 37,935 करोड रु को पार कर गई थी जबकि इस दौरान योग गुरु रामदेव संचालित पंतजलि उत्पादों को छोडकर करीब-करीब सभी एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कन्ज्युमर गुडस) की ब्रिकी में गिरावट दर्ज  हुई। इन आंकडों से स्पष्ट  है कि  केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद और प्रधानमंत्री द्वारा खादी वस्त्रों को प्रोत्साहित करने के नतीजतन ग्रामोद्योग के उत्पादों की लोकप्रियता बढी है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह बात रामबाण साबित हो सकती है। देश  की 70 फीसदी आबादी देहातों में बसती है और अगर गांवों में रोजगार का सृजन होता है, तो लोगों की आय बढती हे। इससे उनकी क्रय शक्ति (परचेंजिंग पॉवर) में इजाफा होता है और मांग उठती है। यही आर्थिक विकास का मूल मंत्र है। देश  के लिए एक और अच्छी खबर यह है कि सूखे और प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद मोदी सरकार के दो साल में देहातों में आर्थिक गतिविधियां बढी हैं। इस मार्च माह में ग्रामीण मांग (रूरल डिमांड) का स्टैंटर्ड चार्टर इंडेक्स 16 माह के शिखर पर था। देश  की सबसे अग्रणी ट्रेक्टर बनाने वाली कंपनी मंहिद्रा एंड मंहिद्रा की फाइनेषशियल सर्विस की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि लंबे समय तक मंदी रहने के बाद पिछली तिमाही में पहली बार उसका कारोबार उठा हैे। इसका अर्थ है कि देहातों में मांग उठी है। जाहिर है ऐसा आय बढने के कारंण हुआ है। पिछले दो सालों में केन्द्र और राज्यों की सरकारों ने ग्रामीण क्षत्रों में रेल-सडक निर्माण और अन्य इंफरास्ट्रक्चरल कार्यों में खासा निवेश  किया है और बिचौलियों का नेटवर्क ध्वस्त हुआ है। बहरहाल, खादी एवं ग्रामोद्योग के उत्पादों की ब्रिकी बढना अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत है। इससे साफ है कि खादी युवाओं में भी लोकप्रिय है। भारत में खादी वस्त्र अथवा उत्पाद मात्र नहीं है। यह हमारी स्वदेशी  सोच और राष्ट्रीय  अस्मिता से जुडी है। इसी खादी की बदौलत हमने फिरंगी  शासन से मुक्ति पाई थी और यही खादी अब देश  को मल्टी नेषनल कंपनियों के भ्रमजाल से आजादी दिलाएगी।