मंगलवार, 10 मई 2016

लोकतंत्र फिर जीता

उत्तराखंड में विश्वास  मत से एक रोज पहले नौ दल-बदलू विधायकों पर न्यायपालिका का ताजा फैसला लोकतंत्र की बहुत बडी जीत है। सोमवार को प्रातः उच्च न्यायालय  और अपरान्ह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नौ दल-बदलुओं को विश्वास मत के लिए अयोग्य ठहराए जाने से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश  रावत को राहत मिली सो मिली, इन फैसलों से दल-बदल पर अंकुश  लगने की उम्मीद की जा सकती है। नैनीताल स्थित उच्च न्यायालय ने सोमवार को व्यवस्था दी कि नौ दल-बदलू विधायक मंगलवार को होने वाले विश्वास मत में हिस्सा नहीं ले सकते। इस फैसले के आते ही दल-बदलू विधायक फौरन सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गए मगर वहां से भी उन्हें कोई राहत नहीं  मिली। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए नौ दल-बदलू विधायकों को विश्वास मत में भाग लेने की अनुमति नहीं दी। अगली सुनवाई 12 मई को होगी मगर तब तक विश्वास मत का फैसला आ चुका होगा। कांग्रेस से बगावत कर भाजपा के साथ मिले नौ दल-बदलू विधायकों को  विधानसभा अध्यक्ष ने  अयोग्य करार कर दिया था। दल-बदलू विधायक विधानसभा अध्यक्ष के इस फैसले के खिलाफ अदालत गए थे। सर्वोच्च न्यायालय ने कांग्रेस पार्टी की हरीश  रावत सरकार को दस मई (मंगलवार) को विधानसभा में विश्वास मत लेने को कहा है। इससे पहले उच्च न्यायालय भी ऐसी ही व्यवस्था दे चुका है। राज्य में इस समय  राष्ट्रपति शासन  लगा हुआ है और विधानसभा निलंबित है। मगर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश  पर दस मई को उत्तराखंड में दो घंटे के लिए प्रातः 11बजे से दोपहर 1बजे तक राष्ट्रपति  शासन उठा लिया जाएगा और विधानसभा जीवंत हो जाएगी।  विश्वास मत के बाद न्यायपालिका तय करेगी कि राज्य में राष्ट्रपति  शासन  लागू रहेगा या चुनी हुई सरकार फिर से पदस्थ होगी। ताजा स्थिति में 70 सदस्यीय सदन में नौ दल-बदलुओं के अयोग्य करार दिए जाने के बाद हरीश  रावत को  बहुमत साबित करने के लिए 31 विधायकों के समर्थन की जरुरत पडेगी। विभिन्न दलों की स्थिति के  दृष्टिगत  एक-एक विधायक मायने रखता है। कांग्रेस के 27 सदस्य हैं और  भाजपा क 28 विधायक हैं।  बसपा के 2 और उत्तराखंड क्रांति दल का 1 विधायक है। 3 निर्दलीय हैं और इनकी भूुमिका अहम रहेगी। नौ दल-बदलू विधायकों  के अयोग्य करार दिए जाने से भाजपा का सारा गणित बिगड गया है।  दल-बदलू विधायक  अब न घर के रहे, ना घाट के“।  ंदल-बदल ने देश  की समकालीन राजनीति को बुरी तरह से प्रदूषित  कर रखा है। दुखद बात यह है कि राजनीतिक दल दल-बदल कानून का सम्मान करने की बजाए इसका अपमान करने में सबसे आगे रहते हैं। उत्तराखंड  प्रकरण इस बात की ताजा मिसाल है। पूरा देश  जानता है कि पार्टी छोडकर जाने वाले विधायकों को दल-बदल कानून के तहत अयोग्य ठहराया जा सकता है। मगर भाजपा है कि दल-बदलुओं की मदद से जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को  गिराने अथवा अपदस्थ करने पर आमादा है। 1985 में बने दल-बदल निरोधी कानून में एक पेंच से सियासी दल अपने ही बनाए कानून को तोड रहे हैं। इसके तहत अगर पार्टी के दो- तिहाई विधायक या सांसद पार्टी छोड कर किसी दूसरे दल में  शामिल हो जाते हैं, तो इसे दल-बदल नहीं अलबता विलय (मर्जर) माना जाएगा।  2003 से पहले दो-तिहाई की जगह एक-तिहाई का प्रावधान था। उत्तराखंड में कांग्रेस के 36 विधायक थे। मौजूदा व्यवस्था के लिहाज से कम-से-कम 24 विधायक ही पार्टी को तोड सकते थे। अरुणाचल प्रदेश  में कांग्रेस के दो-तिहाई विधायक बगावत कर गए थे, इसीलिए वे दल-बदल निरोधी कानून से बच गए। बहरहाल, उत्तराखंड प्रकरण से राजनीतिक दलों को सबल लेना चाहिए कि सियासी नेता भले ही दल-बदल कानून का मखौल उडाते रहें मगर देश  की न्यायपालिका कानून का अपमान नहीं होने देगी। दल-बदल कानून की प्रासंगिकता पर भी प्रश्न  चिंह लग जाता है। दल-बदल निरोधी  कानून और मंत्रिमंडल के आकार की सीमा तय करने वाले 2003 संवैधानिक संशोधन एक्ट की कोई प्रासंगिकता नही रह गई है। विधायक बडे मजे से दल-बदल कर रहे हैं और कई राज्यों में मंत्रिमंडल का आकार सीमा से कहीं ज्यादा है। इस पर अकुंश  लगाए जाने की अविलंब जरुरत है।