बुधवार, 25 मई 2016

चाबहार पोर्टः पाक को झटका


भारत का किसी भी क्षेत्रीय ताकत से सामरिक ( स्ट्रेटेजिक) सहयोग पाकिस्तान को हर सूरत में प्रभावित करता है। भारतीय उपमहाद्धीप में पडोसी पाकिस्तान  भारत का सबसे बडा प्रतिद्धंद्धी है और दोनों ही एक-दूसरे पर भारी पडने की हर चंद कोशिश  करते रहते  हैं।  ईरान और अफगानिस्तान के साथ चाबहार पोर्ट पर सहयोग भारत के लिए सामरिक दृष्टि  से जितना अहम है, पाकिस्तान और चीन के लिए उतना ही बडा झटका। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को ईरान यात्रा के दौरान चाबहार पोर्ट  करार को अंतिम रुप दिया। अफगानिस्तान के  राष्ट्रपति  अशरफ गनी भी इस अवसर पर मौजूद थे। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध के कारण यह डील सालों से रुकी पडी थी। भारत नब्बे के दशक में चाबहार पोर्ट का आंशिक निर्माण कर चुका है। मगर बाद में किन्ही कारणों से इस पोर्ट  का निर्माण आगे नहीं बढ पाया।  दक्षिणपूर्व ईरान के चाबहार शहर में यह बंदरगाह ओमान की खाडी में स्थित है और इसके निर्माण से भारत को मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप से  व्यापार करने का सुगम रास्ता मिल जाएगा। अभी तक भारत को मध्य एशिया और खाडी देशों  में व्यापार के लिए पाकिस्तान होकर जाना पडता था। पाकिस्तान वक्त-बेवक्त सौ तरह के अडंगे अडाया करता है । इस पोर्ट  के बनने से भारत को अफगानिस्तान से व्यापार करने का भी सीधा रास्ता मिल जाएगा। जाहिर है इस पोर्ट केे खुलने के बाद पाकिस्तान अलग-थलग पड जाएगा और भारत और अफगानिस्तान के बीच व्यापारिक रिश्ते  और मजबूत होंगे। भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच बढता आर्थिक और सामरिक सहयोग पाकिस्तान के लिए बढा खतरा है। चीन भले ही न माने, भारत की तरह ईरान और अफगानिस्तान भी यही मानते हैं कि क्षेत्र में जो आतंक को फैलाने में  पाकिस्तान की आईएसआई का बहुत बडा हाथ है।  इस स्थिति में अंतरराष्ट्रीय  मंचों पर आतंक से जुडे मुद्दों को उठाने के लिए भारत को ईरान का सहयोग मिल सकता है। अभी तक भारत जब कभी भी ऐसे मुद्दे उठाता रहा है, पाकिस्तान अरब जगत के माध्यम से उसे मात देता रहा है। पाकिस्तान मुस्लिम जगत में खुद को बडी इस्लामिक ताकत के रुप में पेश  कर रहा है। परमाणु ताकत बनने के बाद वह इस  मकसद में कुछ हद तक सफल भी हुआ है। अमेरिकी प्रतिबंध उठने के बाद से ईरान नई ताकत के रुप में उभरा है। इस दृष्टि  से ईरान पाकिस्तान का प्रतिद्धंद्धी है। ईरान आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक तौर पर भी  बडी ताकत माना जाता है। ईरान और भारत के दोस्ताना संबंध  पाकिस्तान को खासी चुभन दे सकते हैं। बहरहाल, चीन की पाकिस्तान के ग्वादर में पोर्ट बनाने में जैसी भूमिका रही है, वैसी ही भूमिका भारत की चाबहार पोर्ट में है। भारत अब तक इस पोर्ट के निर्माण पर  10 करोड डालर का निवेश  कर चुका है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने 50 करोड डालर और निवेश  करने का वायदा किया है। ग्वादर पोर्ट के बनने से पाकिस्तान इस बात पर इतरा रहा था कि उसने भारत से सामरिक  बढत ले ली है मगर चाहबार पोर्ट के पूरा होने से उसकी इन उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। बहरहाल, ईरान के साथ भारत के दोस्ताना संबंध दोनों देशों  को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकते हैं। दोनों देश  सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक तौर  पर  समृद्ध और विविध हैं और इस लिहाज से एक-दूसरे के करीब भी हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संबोधन में इस बात का उल्लेख भी किया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों  के बीच दोस्ताना संबंध उतने ही पुराने हैं जितना पुराना इतिहास। चाहबार करार से भारत और ईरान के बीच सहयोग का नया अध्याय लिखा गया है। इससे न केवल भारत और ईरान को, बल्कि समूचे मध्य एषिया को सामरिक फायदा होगा। इस करार की सफलता पर प्रधानमंत्री ने मिर्जा  गालिब का यह शे र पढा,“ नूनत गरबे नफ्से-खुद तमाम अस्त। जे-काशी  पा-बे काशान  नीम गाम अस्त“। यानी अगर हम मन मे ठान लें , तो काशी  और काशम के बीच की दूरी केवल आधा कदम रह जाएगी। भारत और ईरान के बीच ताजा संबधों पर यह शेर  सटीक बैठता है।