चंडीगढ के लिए अलग से प्रशासक नियुक्त करने की मोदी सरकार की कवायद षुरु होने से पहले ही ध्वस्त हो गई। बुधवार को सरकार ने पंजाब के लिए 18 महीने बाद राजस्थान के वरिष्ठ भाजपाई नेता वीपी सिंह बदनौर को राज्यपाल बनाने के अलावा केरल के भाजपा नेता एवं पूर्व नौकरशाह केजे अल्फॉन्स को चंडीगढ का अलग से प्रशासक नियुक्त किया था। मगर देर रात इस नियुक्ति को निरस्त करना पडा। पंजाब के सभी राजनीतिक दलों ने इस नियुक्ति का मुखर विरोध किया। पिछले 32 साल से पंजाब के राज्यपाल को ही चंडीगढ प्रषासक की जिम्मेदारी दी जाती रही है। चंडीगढ और नहरी पानी शिरोमणि अकाली दल को ही नहीं पंजाब के सभी सियासी दलों के लिए जी-जान से भी ज्यादा प्रिय है और दोनों मुद्दों के लिए अकाली हर समय लंबी लडाई लडने पर आमादा रहते हैं। शिरोमणि अकाली दल न केवल भाजपा नीत राजग का अहम हिस्सा है, अलबत्ता पंजाब में पिछले दस साल से भाजपा के साथ सरकार भी चला रहा है। बुधवार दोपहर चंडीगढ के लिए अलग से प्रशासक नियुक्ति की खबर आते ही पंजाब भाजपा को जैसे सांप सुंघ गया। पार्टी न तो नियुक्ति का विरोध कर पाई और न ही समर्थन जबकि कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दल इसके विरोध में उतर आए थे । पंजाब के राजनीतिक दलों को लग रहा था कि केन्द्र चंडीगढ में अलग से प्रशासक नियुक्त करके इस केन्द्र शासित क्षेत्र से पंजाब का दावा कमजोर कर रहा है। और इस तरह की किसी भी पहल में सच्चाई भी है। चंडीगढ पंजाब और हरियाणा के बीच राजनीतिक रस्साकस्सी का शिकार है। चंडीगढ पर न तो पंजाब और न ही हरियाणा अपना दावा छोडने को तैयार हैं। यह मामला पिछले पचास सालों से लटका पडा है और इस दौरान पंजाब मोहाली और हरियाणा पंचकूला को वैकल्पिक राजधानी के रुप में विकसित कर चुका है। चंडीगढ की तुलना में पंचकूला और मोहाली काफी ज्यादा फैल चुके हैं। पचास साल में चंडीगढ ने अपना अलग अस्तित्व विकसित किया है। और अगर चंडीगढ के लोगों की राय ली जाए तो वे न पंजाब में जाने चाहेंगे और न ही हरियाणा में। लोग-बाग केद्र शासित क्षेत्र के पक्ष में राय देंगे। बहरहाल, जमीनी सच्चाई अपनी जगह है और सियासी हित सब पर भारी पडते हैं। विधानसभा चुनाव की बेला पर चंडीगढ के लिए अलग से प्रशासक की नियुक्ति पंजाब में शिअद-भाजपा गठबंधन के लिए भारी पड सकती थी। यह सब जानते हुए भी मोदी सरकार ने चंडीगढ के लिए अलग से प्रशासक बनाने का खतरा क्यों मोल लिया? इस कवायद से भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि समय आने पर वह चंडीगढ और पंजाब में अपना अलग रास्ता अख्तियार कर सकती है। चंडीगढ में भाजपा का दबदबा है और भाजपा की किरण खेर संसद में इस केन्द्र शासित क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती है। इतने साल बाद पंजाब को विश्वाश में लिए बगैर चंडीगढ के लिए अलग से प्रशासक नियुक्त करके मोदी सरकार ने वास्तव में गठबंधन धर्म तोडा है। अल्फॉन्स प्रकरण ने विपक्ष के इन आरोपों को भी पुष्ट किया है कि राज्यपाल की नियुक्ति के समय केन्द्र गैर-भाजपा शासित राज्यों को सूचित करने का शिष्टाचार तक नहीं निभाता है है। पंजाब में राज्यपाल को नियुक्त करते-करते मोदी सरकार को 18 माह का लंबा समय लग गया। इससे यह संदेश जाता है कि मोदी सरकार को या तो राज्यपाल की नियुक्ति करने का समय नहीं था अथवा उसे ऐसा व्यक्ति नहीं मिल रहा था, जो सरकार की नजर में पंजाब के लिए योग्य हो। और बदनौर को खोजने में डेढ साल लग गया। इन्हीं सब कारणों से मोदी सरकार की कार्यशैली को उनके सहयोगी दल भी संदेह की नजर से देखते हैं। शिवसेना काफी पहले से मोदी सरकार की कार्यशैली की आलोचक रही है। अल्फॉन्स प्रकरण ने शिअद को भी उसी श्रेणी में लाकर खडा कर दिया है।
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