शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

महंगा कर्ज और मुद्रा-स्फीति

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने पद छोडने से पहले अपनी अंतिम मौद्रिक नीति में ब्याज दरों को यथावत रखकर विदाई ली है।  नौ अगस्त को जारी नीति में रघुराम राजन ने रेपो रेट 6. 5 फीसदी पर बनाए रखा। इस साल अप्रैल में आरबीआई द्वारा रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती से यह छह साल के न्यूनतम स्तर पर आ गया था। इस दौरान मुद्रा-स्फीति में भी गिरावट दर्ज हुई थी। अधिकतर आर्थिक  एक्सपर्ट्स को रेट कट की उम्मीद भी नहीं थी। इसके दो कारण थे। पहला यह कि  गवर्नर रघुराम राजन सितंबर में अपना पदभार छोड रहे हैं, इसलिए उन्होंने रेट कट का जिम्मा अपने उतराधिकारी पर छोड दिया। वैसे भी मोदी सरकार ने ब्याज दरें निर्धारित करने का काम अब मौद्रिक नीति समिति (मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी) के सुपुर्द कर दिया है। आगे से ब्याज दरें निर्धारण का काम यही समिति किया करेगी और आरबीआई का इसमें कोई विशेष  भूमिका नहीं रहेगी। दूसरी प्रमुख वजह है कि अभी मानसून सीजन चल रहा है और इसके खत्म होने के बाद ही रेपो रेट में कट या वृद्धि की गुजांइश  बनती है। इस साल आम तौर पर बरसात में जमकर पानी बरस रहा है और देश  के कई क्षेत्र जलमग्न है। अच्छी मानसून से बंपर खरीफ फसल की उम्मीद की जा रही है। बरसात के बाद त्यौहारी सीजन में मांग बढने से बाजार को और ज्यादा नकदी की दरकार होगी। नव गठित छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति  अक्टूबर में रेट कट पर विचार कर सकती है। इस समिति के सदस्य अभी नियुक्त किए जाने है और तब तक इनकी नियुक्ति भी हो जाएगी और आरबीआई का नया गवर्नर भी पद ग्रहण कर लेगा। ब्याज दर निर्धारण का काम सरकार द्वारा नियुक्त  मौद्रिक नीति समिति  के सुपुर्द किए जाने से मौद्रिक नीति बनाने में राजनीतिक दखल की गुंजाइश  बढी है। आरबीआई का गवर्नर अमूमन अर्थशास्त्री अथवा वित्त विशेषज्ञ होता है, इसलिए अब तक मौद्रिक नीति में राजनीतिक दखलादांजी की गुजाइंश  काफी कम रही है। संप्रग सरकार के समय आरबीआई के गवर्नर रहे डी सुब्बाराव ने अपनी पुस्तक में इस बात का उल्लेख किया है कि कैसे कांग्रेस नीत संप्रग सरकार उन पर ब्याज दरों के लिए दबाव डालती रही है। अमेरिका, चीन और यूरोप की तुलना में भारत में ब्याज दरें अभी भी काफी ऊंची है और इससे विदेषी निवशकों को भारत में अच्छा रिटर्न मिल रहा है। अमेरिका और यूरोप में मंदी का दौर चल रहा है, इसलिए इन देशों  में कर्ज  काफी सस्ता है। यूरोप और फेडरल रिजर्व (अमेरिकी सेंट्रल बैंक) अगर ब्याज दरें बढाता है, तो इसका असर भारत पर भी पडेगा। मोदी सरकार ने  आरबीआई को अगले पांच सालों में रिटेल मुद्रा-स्फीति को चार फीसदी के आसपास लाने का लक्ष्य दे रखा है। रिटेल मुद्रा स्फीति अभी भी कंफर्ट जोन से ऊपर है। इस स्थिति में रेपो रेट में कटौती से मुद्रा स्फीति में उछाल आने का खतरा बना हुआ है। दुखद स्थिति यह है कि ब्याज दरें कम किए जाने का फायदा जनमानस तक पहुंच ही नहीं रहा है। पिछले साल जनवरी से अब तक रघुराम राजन रेपो रेट में डेढ फीसदी की कटौतौ कर चुके हैं मगर देश  के सरकारी और निजी बैंक हैं कि कटौती का अधिकांश  फायदा खुद हजम कर गए है। कुछ बैकों ने अपने ग्राहकों को  मिल-मिलाकर बमुश्किल  आधा फीसदी की राहत दी है। रघुराम राजन की यही सबसे बडी विफलता रही है। वे बेलगाम बैंकों पर नकेल नहीं डाल पाए। न तो बैंकों के एनपीए (नॉन परर्फोंमिंग असेट्स) में कोई गिरावट आई है और न ही कर्जदारों को पर्याप्त राहत मिली है। मौद्रिक नीति का फायदा सिर्फ  बैंको और साहूकारों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। गरीब कर्जदार को एक-एक रुपए की राहत भी मायने रखती है।