देश की राजधानी दिल्ली में जनता द्वारा चुनी गई सरकार की कोई अहमियत नहीं है? दिल्ली उच्च न्यायालय ने वीरवार को दिल्ली में सतारुढ आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा दायर याचिका पर व्यवस्था दी है कि दिल्ली अभी भी केन्द्र शासित क्षेत्र है। यहां उप-राज्यपाल ही असली बॉस है और बगैर उनकी अनुमति के जनता द्वारा चुनी गई सरकार न तो किसी की नियुक्ति कर सकती है और न ही किसी पैनल को स्थापित कर सकती है। उच्च न्यायालय के फैसले के बाद केजरीवाल द्वारा नियुक्त दो पैनल तुरंत बर्खास्त हो गए हैं। उच्च न्यायालय के ताजा फैसले से साफ है कि दिल्ली में असली सरकार केन्द्र ही चला रहा है। दिल्ली पुलिस पहले से केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है और दिल्ली सरकार का उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। यही कारण है कि दिल्ली पुलिस धडाधड आम आदमी पार्टी के विधायकों के खिलाफ मामले दर्ज कर उन्हें जेल में ठूंस रही है। अब तक आम आदमी पार्टी के 12 विधायकों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें एक विधायक को पंजाब में धार्मिक बेअदबी के लिए गिरफ्तार किया गया है। यह सब इसलिए हो रहा है कि दिल्ली में पुलिस पर दिल्ली सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की दिल्ली को लेकर तमाम महत्वाकांक्षाएं धराशायी हो गई हैं हालांकि आप ने मामला सर्वोच्च न्यायालय में ले जाने की बात कही है। न्यायपालिका भावनाओं में नहीं बहती और संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार की फैसले सुनाती है। और संविधान में स्पष्ट है कि कोई क्षेत्र अगर केन्द्र शासित है, तो वहां केंद्र का ही शासन चलेगा। दिल्ली देश की राजधानी है, इसलिए इसे केन्द्र शासित रखा गया है। केन्द्र का मानना है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने से तरह-तरह की प्रशासनिक समस्याएं खडी हो सकती हैं। तथापि, केन्द्र शासित प्रदेशं में अधिकार विहीन विधानसभा और मंत्रिमंडल के गठन का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। लोकतंत्र में सांसदों और विधायकों की जनता के प्रति जबावदेही होती है, राज्यपाल अथवा उपराज्यपाल की नहीं है। पूरी दुनिया यह बात जाानती है कि भारत में राज्यपाल अथवा उपराज्यपाल मात्र केन्द्र के एजेंट बतौर काम करते हैं। अरुणाचल प्रदेश और उत्ताराखंड की हालिया घटनाओं ने भी यही साबित किया है। दिल्ली की मौजूदा स्थिति जनादेश का सरासर अपमान है।ं दिल्ली की जनता के प्रचंड जनादेश की कोई प्रासंगिकता नही रह जाती है। भाजपा के लिए यह स्थिति और भी सुखद है कि दिल्ली की जनता द्वारा नकारे जाने के बावजूद दिल्ली में वही राज कर रही है। दिल्ली की तरह हिमाचल प्रदेश भी लंबे समय तक बतौर केन्द्र शासित उपराज्यपाल के अधीन सर्व-अधिकार विहीन चुनी हुई सरकार का दर्द झेल चुका है। हिमाचल प्रदेश के निर्माता डाक्टर यशवंत सिंह परमार ने इसी दर्द के कारण पूर्ण राज्य के लिए लंबी लडाई लडी और अतंत़ 1971 में हिमाचल पूर्ण राज्य बना। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी सरकार के पास भी दो ही विकल्प है। पहला विकल्प है कि पार्टी मौजूदा व्यवस्था के विरोध में इस्तीफा देकर पूर्ण राजत्व के लिए फिर से जनादेश ले मगर यह पलायन का रास्ता होगा और इससे जनता को खामख्वाह का खमियाजा भुगतना पडेगा। इसके अलावा इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जनादेश मिलने पर केन्द्र दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दे ही देगा। दूसरा विकल्प है कि मौजूदा प्रचंड बहुमत और जनता के समर्थन से विधानसभा के भीतर और बाहर पूर्ण राज्य के लिए संघर्ष छेडा जाए। यह विकल्प पहले से कहीं बेहतर है। जनशक्ति के आगे तानाशाह और सैन्य शासकों को भी झुकने पर विवश होना पडता है। तुर्की इसी बात की मिसाल है। इस देश की जनता ने रात को सडकों पर आकर राष्ट्रपति तईब इरदुगान के खिलाफ सैन्य तख्ता पलट को भी विफल कर दिया ।
सोमवार, 8 अगस्त 2016
असली बॉस कौन?
Posted on 8:35 pm by mnfaindia.blogspot.com/
देश की राजधानी दिल्ली में जनता द्वारा चुनी गई सरकार की कोई अहमियत नहीं है? दिल्ली उच्च न्यायालय ने वीरवार को दिल्ली में सतारुढ आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा दायर याचिका पर व्यवस्था दी है कि दिल्ली अभी भी केन्द्र शासित क्षेत्र है। यहां उप-राज्यपाल ही असली बॉस है और बगैर उनकी अनुमति के जनता द्वारा चुनी गई सरकार न तो किसी की नियुक्ति कर सकती है और न ही किसी पैनल को स्थापित कर सकती है। उच्च न्यायालय के फैसले के बाद केजरीवाल द्वारा नियुक्त दो पैनल तुरंत बर्खास्त हो गए हैं। उच्च न्यायालय के ताजा फैसले से साफ है कि दिल्ली में असली सरकार केन्द्र ही चला रहा है। दिल्ली पुलिस पहले से केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है और दिल्ली सरकार का उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। यही कारण है कि दिल्ली पुलिस धडाधड आम आदमी पार्टी के विधायकों के खिलाफ मामले दर्ज कर उन्हें जेल में ठूंस रही है। अब तक आम आदमी पार्टी के 12 विधायकों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें एक विधायक को पंजाब में धार्मिक बेअदबी के लिए गिरफ्तार किया गया है। यह सब इसलिए हो रहा है कि दिल्ली में पुलिस पर दिल्ली सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की दिल्ली को लेकर तमाम महत्वाकांक्षाएं धराशायी हो गई हैं हालांकि आप ने मामला सर्वोच्च न्यायालय में ले जाने की बात कही है। न्यायपालिका भावनाओं में नहीं बहती और संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार की फैसले सुनाती है। और संविधान में स्पष्ट है कि कोई क्षेत्र अगर केन्द्र शासित है, तो वहां केंद्र का ही शासन चलेगा। दिल्ली देश की राजधानी है, इसलिए इसे केन्द्र शासित रखा गया है। केन्द्र का मानना है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने से तरह-तरह की प्रशासनिक समस्याएं खडी हो सकती हैं। तथापि, केन्द्र शासित प्रदेशं में अधिकार विहीन विधानसभा और मंत्रिमंडल के गठन का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। लोकतंत्र में सांसदों और विधायकों की जनता के प्रति जबावदेही होती है, राज्यपाल अथवा उपराज्यपाल की नहीं है। पूरी दुनिया यह बात जाानती है कि भारत में राज्यपाल अथवा उपराज्यपाल मात्र केन्द्र के एजेंट बतौर काम करते हैं। अरुणाचल प्रदेश और उत्ताराखंड की हालिया घटनाओं ने भी यही साबित किया है। दिल्ली की मौजूदा स्थिति जनादेश का सरासर अपमान है।ं दिल्ली की जनता के प्रचंड जनादेश की कोई प्रासंगिकता नही रह जाती है। भाजपा के लिए यह स्थिति और भी सुखद है कि दिल्ली की जनता द्वारा नकारे जाने के बावजूद दिल्ली में वही राज कर रही है। दिल्ली की तरह हिमाचल प्रदेश भी लंबे समय तक बतौर केन्द्र शासित उपराज्यपाल के अधीन सर्व-अधिकार विहीन चुनी हुई सरकार का दर्द झेल चुका है। हिमाचल प्रदेश के निर्माता डाक्टर यशवंत सिंह परमार ने इसी दर्द के कारण पूर्ण राज्य के लिए लंबी लडाई लडी और अतंत़ 1971 में हिमाचल पूर्ण राज्य बना। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी सरकार के पास भी दो ही विकल्प है। पहला विकल्प है कि पार्टी मौजूदा व्यवस्था के विरोध में इस्तीफा देकर पूर्ण राजत्व के लिए फिर से जनादेश ले मगर यह पलायन का रास्ता होगा और इससे जनता को खामख्वाह का खमियाजा भुगतना पडेगा। इसके अलावा इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जनादेश मिलने पर केन्द्र दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दे ही देगा। दूसरा विकल्प है कि मौजूदा प्रचंड बहुमत और जनता के समर्थन से विधानसभा के भीतर और बाहर पूर्ण राज्य के लिए संघर्ष छेडा जाए। यह विकल्प पहले से कहीं बेहतर है। जनशक्ति के आगे तानाशाह और सैन्य शासकों को भी झुकने पर विवश होना पडता है। तुर्की इसी बात की मिसाल है। इस देश की जनता ने रात को सडकों पर आकर राष्ट्रपति तईब इरदुगान के खिलाफ सैन्य तख्ता पलट को भी विफल कर दिया ।






