गुरुवार, 11 अगस्त 2016

रियो जाओ, सेल्फी लो,,,,

जानी-मानी लेखिका  शोभा डे ने ओलंपिक में भारतीय खिलाडियों के प्रदर्शन को लेकर तल्ख टिप्पणी करके सोशल मीडिया पर मुसीबत मोल ले ली है। बेबाक और तीखे लेखन के लिए विख्यात शोभा डे का कथन है कि रियो में  भारतीय टीम का लक्ष्य है “ रियो जाओ, सेल्फी लो और खाली हाथ वापस आओ“। यह पैसे की बर्बादी नहीं तो और क्या है?  शोभा डे की इस टिप्पणी पर खिलाडियों के अलावा खेल प्रेमियों
और बालीवुड के कलाकारों ने उन्हें इसके लिए  उन्हें फटकार लगाई है। बीजिंग ओलंपिक के स्वर्ण  पदक विजेता अभिनव बिन्द्रा ने शोभा की टिप्पणी को बचकाना करार दिया है। बालीवुड कलाकार और आप नेता गुल पनाग ने भी इस टिप्पणी को “अशोभनीय “ बताया है। मगर शोभा डे अपने कथन पर कायम है। उनका स्पष्टीकरण है कि इन सब के लिए सरकार की उदासीनता (ऑफिशियल अपाथी) जिम्मेदार है। तथापि शोभा डे ने जो विचार व्यक्त किए है, उनसे देश  के अधिकांष लोग सहमत होंगे। वैसे भी भारत में हर नागरिक को अपने विचार व्यक्त करने की पूरी आजादी है और अगर शोभा डे को लगता है कि ओलंपिक में भारतीय टीम का खाली हाथ लौटाना देश के पैसे की बर्बादी है तो उन्हें अपने विचार व्यक्त करने की पूरी छूट है। इस पर कुछ लोगों को लाल-पीला होने का कोई औचित्य नहीं बनता है। क्या यह असहिष्णुता नहीं है? आप नेता गुल पनाग और उन जैसे कला के पुजारी स्वतंत्र और मुक्त  विचारों की काट कर क्या साबित करना चाहते हैं? पिछले लगभग 100 साल से भारत ओलंपिक में हिस्सा ले रहा है मगर वह इतने सालों में उतने भी स्वर्ण पदक नहीं जीत पाया है, जितमे अमेरिका के तैराक माइकल फैल्पस ने अपनी बाली उमर में जीते (22 स्वर्ण) हैं। 1920 से आज तक भारत बमुश्किल  नौ स्वर्ण पदक जीत पाया है। इनमें भी 7 हाकी में जीते है। 1928 से 1956 तक ओलंपिक हाकी में भारत की बादशाहत रही है और इस दौरान उसने लगातार छह स्वर्ण पदक जीते हैं। मगर 1958 के बाद पाकिस्तान के अस्तित्व में आने से भारत की हाकी की बादशाहत भी खत्म हो गई। इसके बाद भारत केवल दो बार 1964 और 1980 में हाकी का स्वर्ण पदक जीत पाया है। 1980 के बाद आज तक पिाछले 36  वर्षों में भारत स्वर्ण पदक तो दूर प्लेऑफ में भी नहीं पहुंच पाया था। इस बार  पहली बार भारत अर्जेटीना को हराकर प्लेऑफ में पहुंचा है। 2016 के ओलंपिक में भी अब तक  जिमानास्ट दीपा करमाकर को छोडकर भारत का  प्रदर्शन  निराशाजनक रहा है। बीजिंग ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिन्द्रा भी पदक से चूक गए हैं। इस बार के ओलंपिक में भारत अब तक सबसे ज्यादा 124 प्रतिर्स्पधाओं में भाग ले रहा है। 2012 में लंदन ओलपिंक में भारत ने 83 प्रतिर्स्पधाओं में भाग लिया था। रियो ओलंपिक में 29 खेलों की 412 प्रतिर्स्पधाएं हो रही है । इनमें पुरुष  वर्ग की 157 एवं महिलाओं की 255  प्रतिर्स्पधाएं हैँ  मगर भारत आधी से भी कम 124 में ही भाग ले रहा है। सवा करोड की आबादी वाला देश  अगर मेडल जीतने वाले दस- पंद्रह खिलाडी भी तैयार नहीं कर पाए, तो ओलंपिक में हिस्सा लेने का क्या मतलब? लेखिका शोभा डे ने भारतीय टीम के ओलंपिक प्रदर्शन को लेकर जो कुछ भी कहा या लिखा है, उसमें कुछ भी गलत नहीं है हालांकि उनके शब्दबाण काफी धारदार हैं और खिलाडियों और खेल प्रमियों को चुभे हैं। मगर एक सच्चाई यह भी है कि स्वस्थ लेखन किसी आलोचना अथवा भावनाओं का मोहताज नहीं होता। समाज को आइना दिखाना लेखन का गंतव्य होता है। भारत में खेल प्रशासन की स्थिति प्रतिर्स्पधा के माफिक तक नहीं है। सियासी नेता  खेल संगठनों पर कुंडली मारकर बैठे हुए हैं और अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। खिलाडियों के चयन में क्षेत्रवाद और पक्षपात का बोलबाला है। भारत में खेल प्रतिभाओं को खोजने  और उन्हें तराशने की अविलंब जरुरत है।