एक माह से भी अधिक समय से हिंसा और अलगाववाद की आग में जल रहे कश्मीर के जख्मों पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय वाली मलहम-पट्टी की जरुरत है। सोमवार को जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात के दौरान कहा था कि अगर सरकार को कश्मीर के लोगों का दिल जीतना है, तो वही करना होगा, जो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को कहा कि वे कश्मीर को लेकर उसी रास्ते पर चल रहे हैं जो वाजपेयी ने अपनाया था। निसंदेह, कश्मीर की अवाम शांति और विकास चाहती है। कश्मीर घाटी में लंबे समय से जारी हिंसा ने स्थानीय लोगों का रोजगार छीन लिया है। अलगाववादी और पाकिस्तान के पिठ्ठुओं को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि हिंसा और आतंक ने कश्मीर के लोगों का निवाला ही छीन लिया है और अवाम ऐसे लोगों का कभी भी समर्थन नही करती है। अलगाववादी युवकों को गुमराह करके कश्मीर में हिंसा फैलाकर अपनी दुकानदारी चला रहे हैं। प्रधानमंत्री ने इस बात पर गहरा दुख जताया है कि कश्मीर में जिन बालकों के हाथ में लेपटॉप, किताब और बल्ला, मन में सपने होने चाहिए, उनके हाथ में पत्थर थमा दिए गए हैं। ऐसा करने वाले अवाम के सबसे बडे दुश्मन है। देश के हर नागरिक की तरह कश्मीर के लोगों को भी वैसी ही आजादी मिली हुई है मगर कुछ लोग इस आजादी का गलत फायदा उठा रहे हैं। इसी आजादी का नाजायज फायदा उठाते हुए कुछ लोग घाटी में बेधडक भारत -विरोधी गतिविधियों में सलिंप्त रहते है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पूरी दुनिया में “ शांति का दूत“ माना जाता है। उन्होंने कश्मीर में अमन-चैन बनाए रखने के लिए हर संभव कोशिश की। पाकिस्तान को भी मनाया और कश्मीरियों से सीधा संवाद स्थापित किया। 1977 में अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार जब जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री बने थे, तब पाकिस्तान को वाजपेयी के जनसंघ (भाजपा की पूर्वज) की हिंदुवादी छवि को लेकर खासी आशांका थी। मगर तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तमाम आशांकाओं को निर्मूल साबित करते हुए पाकिस्तान के साथ बेहतर द्धिपक्षीय संबंध बनाए थे। प्रधानमंत्री बनने पर कश्मीरियों के साथ वार्ता का दौर शुरु करके घाटी में अमन-चैन स्थापित करने के भरपूर प्रयास किए थे। कश्मीर प्रशासनिक अथवा कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, अलबत्ता राजनीतिक समस्या है और इसका हल भी राजनीतिक प्रयासों से ही निकल सकता है। कश्मीर समस्या का राजनीतिक हल निकालने में जितना विलंब होगा, घाटी का उतना ही ज्यादा नुकसान होगा। हिजबुल आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद से कश्मीर में अलगाववादी अवाम को गुमराह करके सुरक्षा बलों पर भारी पडते दिख रहे हैं। यह स्थिति देश की अखंडता के लिए ठीक नहीं है। इस स्थिति को भांपते हुए ही मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने वाजपेयी के समय वाले “हीलिंग टच“ की मांग की है। इससे यह अर्थ भी निकाले जा सकते है कि कश्मीर को लेकर मोदी सरकार की नीति विफल सबित हुई है। इसी कारण प्रधानमंत्री को स्पष्टीकरण भी देना पडा है कि कश्मीर को लेकर सरकार वाजपेयी के रास्ते पर चल रही है। पिछले सप्ताह गृहमंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर गए थे और कुछ लोगों से सीधा संवाद भी किया था। भाजपा मे महामंत्री राम माधव भी लोगों से सीधा संवाद स्थापित करने के प्रयास कर रहे हैं। निसंदेह, इस तरह के राजनीतिक प्रयासों की दरकार है। कश्मीर घाटी में अलगाववादी भीड में घुसकर स्थिति का फायदा उठाते हुए हिसा फैला रहे है। ऐसे लोगों को अवाम से अलग-थलग करने की जरुरत है। जब तक अलगाववादियों और पाकिस्तानी पिठ्ठुओं को अवाम से अलग-थलग नहीं किया जाता, कोई भी नीति कारगर साबित नहीं हो सकती।
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