जानी-मानी लेखिका महाश्वेता देवी और ताल के जादूगर लच्छू महाराज के स्वर्गवास से एक साथ साहित्य और संगीत जगत में विशाल शून्य भर गया है। नब्बे वर्षीय महाश्वेता देवी ने कोलकत्ता और 72 साल के लच्छू महाराज ने वाराणसी में अंतिम सांस ली। अस्सी के दश क तक हिंदी भाषा के गिने-चुने लोग ही लेखिका महाश्वेता के नाम से परिचित थे। 1980 में बगाल के नक्क्सलबाडी आंदोलन की पृष्ठभूमि में लिखा गया उनका उपन्यास “हजार चौरासी की मां“ प्रकाशित हुआ था। इसी उपन्यास के लिए उन्हें “हजार चौरासी की मां“ से जाना जाता है। तब हिंदी के कुछ छात्रों और समकालीन तीसरी दुनिया ने उनका इंटरव्यू लिया और पत्रिका में छापा। यह हिंदी में महाश्वेता का पहला इंटरव्यू था। इसके बाद महाश्वेता हिंदी साहित्य में भी खासी लोकप्रिय हो गई। महाश्वेता देवी अविभाजित् बंगाल के ढाका में पैदा हुई थीं। उनके पिता मनीष घटक खुद मशहूर उपन्यासकार थे। 1926 में जन्मीं महाश्वेता 1940 तक बंगाल में वामपंथी आंदोलन से खासी प्रभावित हो चुकी थीं और वे दबे-कुचलों, आदिवासियों और शोषित वर्ग की आवाज बन गईं थी। उन्होंने शोषण की जटिल प्रकिया और समाज के सभी अंतर्विरोधों को बडी बारीकी से समझा और अपने लेखन में इसका बखूबी से वर्णन किया। महाश्वेता में शोषण व्यवस्था के खिलाफ प्रचंड आग भरी थी। वे अक्सर कहती भी थीं कि “ मेरे भीतर शोषितों और आदिवासियों के लिए लंबे अरसे से पीडा की जो ज्वाला धधक रही है, वह मेरी चिता के साथ ही शांत होगी। और ऐसा ही हुआ। अंतिम सांस तक वे शोषतों के लिए लडती रही। महाश्वेता की मूल विधा कविता थी पर 1956 में “ झांसी की रानी“ ने उन्हें उपन्यासकार बना दिया। इस रचना के बाद, उन्होंने एक इंटरव्यू में माना कि “ झांसी की रानी“ लिखने के बाद उन्हें समझ में आया कि कि “वे मूल रुप से कथाकार ही हैं“। उनकी रचनाए केवल कल्पनामात्र नहीं होती, बल्कि सच का आइना होंती। उन्होंने पुणे, इंदौर, सागर, जबलपुर काल्पी आदि शहरों और ललितपुर के जंगलों में भ्रमण करते-करते उन तमाम घटनाओं के साथ अपना उपन्यास “झांसी की रानी“ लिखा था, जो 1857 के संग्राम के दौरान हुई थी। उनकी कई रचनाओं पर फिल्में बनी। इतालवी फिल्म निदेशक इतालो स्पिनलो ने उनकी रचना “चोली के पीछे“ पर “गंगूर“ नाम से कई भाशाओं में फिल्म बनाई। “हजार चौरासी की मां“ पर 1998 में फिल्म बनी। उनके उपन्यास “रुदाली“ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। महाश्वेता को 1986 में पदमश्री, 1996 में ज्ञानपीठ और 2006 में पदम विभूशण से सम्मानित किया गया था। ऐसी महान रचनाकार के निधन से साहित्य जगत को गहरा आघात लगा है। वीरवार को ही देश के मशहूर तबला वादक लच्छू महाराज का भी स्वर्गवास हो गया। उनका असली नाम लक्ष्मी नारायण सिंह था और वे बनारस घराने से संबंधित थे। लच्छू महाराज स्वभाव से वाकई ही महाराज और बेहद स्वभिमानी थे। किसी के कहने कभी तबला नही बजाया। जब तबियत हुई तबले पर अंगुलियां थिरक गईं। ताउम्र खूब तालियां बटोरी मगर कोई पुरस्कार-वार नहीं मिला हालांकि उनका हूनर कमाल का था। एक बार सरकार ने पदमश्री से सम्मानित किया था मगर उन्होंने लेने से इंकार कर दिया। कहने को बनारस घराने से थे मगर चारों घराने की ताल तबियत से बजा लेते। फिल्म अभिनेता गोविंदा लच्छू महाराज के भानजे हैं। आठ साल की उमर में मुंबई में तबला उन्हें बजाते देख एक बार नामचीन तबला वादक नवाज अहमद उनसे इतने प्रभावित हुए थे कि उन्हें अपना बेटा बनाना चाहते थे। शरीर नश्वर है मगर रचना और कला अमर होती है। महाश्वेता और लच्छू महाराज भी अपनी रचनाओं और कला से युगों तक याद किए जाते रहेंगें।
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