बुधवार, 31 अगस्त 2016

सिन्धुदेष की पुकार

पाकिस्तान में सिंधी लोग भी बलूचिस्तान की तरह सालों से आजादी की मांग कर रहे हैं। सिंध के लोकप्रिय नेता जी एम सईद ने सबसे पहले आजाद सिंधुदेश  की आवाज उठाई थी। 1967 में जीएम सईद एवं पीर अली मोहम्म्द रश्दी  के नेतृत्व में आजाद सिंध की मांग रखी गई और तब से आज तक यह दिन-ब-दिन बलवित होती जा रही है। भारत के प्रधानमंत्री द्वारा आजाद  बलूचिस्तान का समर्थन किए जाने के बाद अब सिंधी लोग भी खुलकर आजादी के पक्ष में आगे आ रहे हैं। सोमवार को सिंध प्रांत के मीरपुर र्में लोगों ने स्वतंत्र सिंधुदेश  के पक्ष ने नारे लगाए। लंदन मे बलूचिस्तान मूल के लोगों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थन में नारे लगाए। बलूची नागरिकों ने लंदन स्थित चीनी दूतावास के समक्ष चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर के विरोध में भी प्रदर्शन  किया। अब तक  कश्मीर  में अलगाववाद और आतंक फैला कर पाकिस्तान इतरा रहा था। अब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर , बलूचिस्तान और सिंध में  नृशंष  मानवाधिकारों को लेकर बुरी तरह से घिर गया है। बलूचिस्तान और पीओके के अलावा सिंध में पाकिस्तान के  शासकों और सेना ने स्थानीय नेताओं की बुलंद आवाज को इतनी बुरी तरह से दबा रखा है कि सिंध प्रांत में आज तक सिंध के एक भी  राष्ट्रीय  नेता को सरकार में जगह तक नहीं मिल पाई है। इसकी प्रमुख वजह है कि पाकिस्तान सरकार ने सिंध के लोकप्रिय राष्ट्रीय  नेताओं और सियासी संगठनों को “आतंक फैलाने और देशद्रोह“ के लिए प्रतिबंधित कर रखा है। इसी वजह आज तक सिंध प्रांत में पाकिस्तान के हुकमरानों का गुणगान करने वाले राजनीतिक दल ही सत्तारूढ होते रहे हैं। सिंध के लोग पाकिस्तान सरकार द्वारा उर्दु को स्थानीय लोगों पर थोपने और मुजाहिरों ( भारत से पाकिस्तान गए मुसलमान) को सिंध प्रांत में बसाने की मुखर मुखालफत करते रहे हैं। सिंध प्रांत यूएनपीओ (अनरेप्रेजेंटेड नेशन्स एंड पीपल्स) का सदस्य है। वर्ल्ड सिधी इंस्टीट्युट यूएनपीओ में सिंध प्रांत की नुमाइंदगी करता है। यूएनपीओ ने सिंध प्रातं को ओकूपाइड एवं अनरेकॉनीइज्ड क्षेत्र घोषित कर रखा है।  1971 मे बाग्लादेश  के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद 1972 में सिंधी नेता जीएम सईद ने पहली बार स्वतंत्र सिंधुदेश  की सार्वजनिक मांग रखी और इसके लिए सिंध के लोगों से हर तरह की कुर्बानी देने का आहवान किया। सिंधियों को पाकिस्तान में पंजाबी-मुजाहिर उपनिवेशवादी सियासतदान के साथ रहना जरा भी गवारा नहीं है। बहरहाल, पाकिस्तान ने बांग्लादेश  के अलग हो जाने के ऐतिहासिक संघर्ष  से भी कोई सबक नहीं लिया है। कश्मीर  में अलगाववाद की चिंगारी को हवा देते-देते पाकिस्तान यह बात भूल गया है कि उसके अपने लोग भी आजादी की मांग कर रहे हैं और जनता की बुलंद आवाज को दमन से ज्यादा देर तक नहीं दबाया जा सकता। बांग्लादेश  के मामले में भी यही हुआ था। स्वतंत्र  बांग्लादेश   को भारत का समर्थन मिलते ही वह आजाद हो गया। 1971 की भारत-पाकिस्तान ऐतिहासिक जंग और ले, जनरल एएके नियाजी की अगुवाई में लगभग  एक लाख पाक सैनिकों के आत्मसमर्पण से शर्मसार हुए पाकिस्तानी नेता इस घटना से भी कोई सीख नहीं ले पाए हैं। सच यह है कि पाकिस्तान विभाजन के बाद से निरंतर भारत को जब-तब अस्थिर करने  की हरसंभव कोशिश  करता रहा है मगर हर बार उसे मुंह की खानी पडती है। अब तक भारत पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दे रहा था। भारत  शिमला समझौते, लाहौर डेक्लेरेशन  और आगरा  शिखर सम्मेलन की मूल भावना का अक्षरश  पालन करता रहा है मगर पाकिस्तान है कि अपनी बेजा हरकतों से बाज नहीं आता। बार-बार कश्मीर  समस्या का अंतरराष्ट्रीयकरण  करता रहता है। इस स्थिति में भारत के पास माकूल जवाब देने के सिवा कोई चारा नहीं बचता  है । और कहते हैं “पाजी और काजी“ को उनकी जुबान में ही जबाव देना बनता है।