भारत को अगर योजनाबद्ध विकास का लाभ गरीब से गरीबतम को पहुंचाना है, तो देश को बढती आबादी पर रोक लगानी होगी। देश के समक्ष सबसे बडी चुनौती भी यही है कि बढती आबादी के विस्फोटक दुषपरिणामों से उन लोगों को कैसे जागरुक किया जाए, जो आम जनता को ज्यादा से ज्यादा बव्चे पैदा करने के लिए जब-तब उकसाते रहते हैं। आबादी को लेकर राष्ट्रीय स्वंय सेवक के नेताओं का स्टैंड जरा भी देश के हित में नहीं है। भला यह भी कोई बात हुई कि इंटरनेट के जमाने में परिवार नियोजन की बजाए लोगों को अधिकाधिक बच्चे पैदा करने के लिए कहा जाए। गत शनिवार को आगरा में दंपत्तियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वंय सेवक प्रमुख मोहन भागवत ने हिन्दुओं को ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने को कहा क्योंकि समाज के कुछ तबके परिवार नियोजन नहीं अपना रहे हैं। उनका इशारा मुसलमानों की तरफ था। मुस्लिम समुदाय में बच्चे पैदा करने की खुली छूट है और यह बात राष्ट्रीय स्वंय सेवक के नेताओं को जरा भी गवारा नहीं है। आरएसएस प्रमुख ने यह बात भी साफ कर दी कि वे मोदी सरकार के “संदेशवाहक“ नहीं है और लोगों को अगर शिकायतों का निवारण कराना है, तो संबंधित मंत्री के पास जाना होगा। बहरहाल, बढती जनसंख्या अमेरिका, जापान जैसे देशों को तो लाभान्वित कर सकती है जो समृद्ध और साधन सपन्न है मगर भारत जैसे विकासशील देश के लिए जनसख्या में बेलगाम वृद्धि उन्नति के पथ पर रोडा बन सकती है। जनसंख्या विस्फोट का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1950 में जहां भारत की आबादी 36 करोड थी, 2011 आते-आते यह बढकर 1.20 करोड को भी पार कर गई है। इस दौरान यद्यपि भारत का सकल घरेलू उत्पाद 2.7 लाख रु से बढकर 57 लाख करोड रु को भी पार कर गया है, मगर इस वृद्धि का प्रत्यक्ष लाभ समाज के निचले तबकों तक नहीं पहुंच पाया है। इसकी सबसे बडी वजह यह है कि निचले एवं कमजोर तबकों में परिवार नियोजन लोकप्रिय नहीं हो पाया है। परिवार का आकार इतना बढ जाता है कि सीमिति आय वालों के लिए गुजर-बसर करना भी दुर्भर् है। बच्चें वांछित लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा से महरुम रह जाते हैं। भारत में चार लाख से भी ज्यादा स्ट्रीट चिल्डर्न का न तो कोई वर्तमान है और न ही कोई भविष्य । सडकों पर रहते हैं और गली-मोहल्लों से कबाड इकठ्ठा कर गुजर-बसर करते हैं। इस दौरान गंदगी से साबका पडने पर बेमौत मारे जाते हैं। दुनिया में सबसे अधिक कुपोषित बच्चे भी भारत में ही हैं। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बाद भारत दुनिया में भूखों, नंगों का तीसरा बडा देश है। इसीलिए भारत की गणना निम्न आय वाले देश में की जाती है, जहां आबादी का बहुत बडा हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करता है। लगभग 20 करोड भूखमरी के शिकार हैं। 83 करोड लोग रोजाना बीस रुपए से भी नीचे गुजर-बसर करते हैं और उन्हें दो वक्त का भरपेट भोजन भी नसीब नहीं होता। हर रोज लगभग 7000 लोग भूखमरी के कारण मारे जाते हैं। इसके विपरीत भारत में 50,000 करोड रु मूल्य का 40 फीसदी भोजन जाया जाता है। 2.1 करोड टन गेंहू हर साल बर्बाद हो रही है। इस तरह के निराशाजनक आंकडों की कमी नहीं है। आबादी बढाने के पैरवीकारों को इन सब आंकडों से कोई सरोकार नहीं है जबकि इन सब का लब्बोलुआब यह है कि भारत की विशाल आबादी देश में समान विकास और संसाधनों के भरपृर दोहण आडे आ रही है। देश को समय रहते चेतना होगा, वरना अगले तीन दश कों में स्थिति और ज्यादा भयावह हो जाएगी। आरएसएस नेताओं की देशभक्ति और समर्पण की भावना काबिलेतारीफ है। पर सच यह है कि परिवार नियोजन देश की सबसे बडी जरुरत है।
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