स्वंत्रतता दिवस पर पाकिस्तान को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आक्रामक रुख से इस्लामाबाद के होश फाख्ता हो गए हैं। अब तक पाकिस्तान भारत को काफी हल्के में ले रहा था और कश्मीर में आतंक फैलाकर भारत के नाकों दम करने के बावजूद चैन की नींद सो रहा था। यहां तक कि कश्मीर घाटी में हिजबुल के आतंकी बुरहान वानी को “शहीद“ बताकर अपना असली खौफनाक चेहरा उजागर किया है। इन घटनाओं ने यह बात साफ कर दी है कि पाकिस्तान भारत के साथ दोस्ती चाहता ही नहीं है। सार्क बैठक के लिए गृहमंत्री की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान आतंकी संगठनों का भारत विरोधी प्रदर्शन और राजनाथ सिंह की ठंडी अगवानी से भी साफ है कि दोनों देशों के बीच अब कहने-सुनने के लिए कुछ भी बचा नहीं है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह संसद में कह चुके हैं कि “पाकिस्तान है कि मानता ही नहीं है“। 1971 में बांग्लादेश की आजादी के लिए भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद पहली बार दो पडोसियों के रिश्ते बेहद खराब है। इन हालात में भारत के पास पाकिस्तान को आइने दिखाने के सिवा और कोई चारा बचा ही नहीं था । पाकिस्तान यह बात पूरी तरह से भूल चुका है कि “ जो लोग खुद शीशे के महल में रहते हैं, वे दूसरे के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते“। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के अलावा पाकिस्तान बलूचिस्तान में सालों से दमन चक्र चलाए हुए हैं मगर दुनिया को ऐसे दिखाता है जैसे इन क्षेत्रों में पूरी तरह से अमन-चैन है। वस्तु स्थिति यह है कि बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कष्मीर में सेना का जबरदस्त दमन चक्र जारी है और अवाम इससे मुक्ति चाहता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के अवाम की आवाज बुलंद करके इन क्षेत्रों के लोगों का दिल जीता है। प्रधानमंत्री के इस आक्रमण का तुरंत असर भी हुआ है। पाकिस्तान ने भारत को कश्मीर पर वार्ता का न्योता दिया और भारत ने भी साफ-साफ षब्दों में कह दिया कि वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और इस्लामाबाद प्रायोजित आतंक पर बातचीत के लिए तैयार है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह संसद में भी यह बात स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत अब पाकिस्तान के साथ सिर्फ उसके अधिकृत कष्मीर पर ही बातचीत करेगा। बहरहाल, पाकिस्तान को उसकी ही भाषा में जबाव देने से प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान नीति को एक नया मोड दिया है। भारत अब तक पडोसी देश के प्रति “सहअस्तित्व“ (लीव एंड लैट लीव) की नीति अपनाए हुए था मगर पाकिस्तान भारत के अस्तित्व को मानने को तैयार ही नहीं है, और वह भारत को अस्थिर करने की हर मुमकिन कोशिश करता रहता है। पाकिस्तान बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में अपनी सेना के दमन चक्र को छिपाने के लिए कश्मीर में भाडे के टटुओं को भेजकर खून-खराबा करा रहा है और पूरी दुनिया को दिखाना चाहता है कि भारत के हिस्से वाले कश्मीर में भी सेना का दमन चक्र जारी है। तथापि एक कटु सत्य यह भी है कि आजादी की आवाज को कहीं भी अधिक देर तक दमन से दबाया नहीं जा सकता। एक-न-एक दिन यह विस्फोट बनकर बाहर आ ही जाता है। पाकिस्तान में बलोच लोग आजादी के लिए न केवल पाकिस्तान से, अलबता ईरान से भी लोहा ले रहे है और स्वतंत्र बलोचिस्तान के लिए गोरिल्ला युद्ध छेडे हुए हैं। बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत, ईरान का सिस्तान और बलूचिस्तान और अफगानिस्तान का बलूचिस्तान शामिल है। बलूचिस्तान के राष्ट्रवादी फाइटर 1948 1958-59, 1962-63 औरा ं1973-77 मे पाकिस्तान के खिलाफ जबरदस्त संघर्ष छेड चुके हैं। 2003 से यह संघर्ष और भी तेज हुआ है। इसी तरह ं गिलगित-बल्तिस्तान समेत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोग भी सम्पूृर्ण आजादी चाहते हैं। पाकिस्तान को अब पता चलेगा कि दूसरों के मामलों में दखल देने के परिणाम कितने खतरनाक हो सकते हैं।
गुरुवार, 18 अगस्त 2016
आक्रामक पाक नीति
Posted on 8:07 pm by mnfaindia.blogspot.com/
स्वंत्रतता दिवस पर पाकिस्तान को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आक्रामक रुख से इस्लामाबाद के होश फाख्ता हो गए हैं। अब तक पाकिस्तान भारत को काफी हल्के में ले रहा था और कश्मीर में आतंक फैलाकर भारत के नाकों दम करने के बावजूद चैन की नींद सो रहा था। यहां तक कि कश्मीर घाटी में हिजबुल के आतंकी बुरहान वानी को “शहीद“ बताकर अपना असली खौफनाक चेहरा उजागर किया है। इन घटनाओं ने यह बात साफ कर दी है कि पाकिस्तान भारत के साथ दोस्ती चाहता ही नहीं है। सार्क बैठक के लिए गृहमंत्री की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान आतंकी संगठनों का भारत विरोधी प्रदर्शन और राजनाथ सिंह की ठंडी अगवानी से भी साफ है कि दोनों देशों के बीच अब कहने-सुनने के लिए कुछ भी बचा नहीं है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह संसद में कह चुके हैं कि “पाकिस्तान है कि मानता ही नहीं है“। 1971 में बांग्लादेश की आजादी के लिए भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद पहली बार दो पडोसियों के रिश्ते बेहद खराब है। इन हालात में भारत के पास पाकिस्तान को आइने दिखाने के सिवा और कोई चारा बचा ही नहीं था । पाकिस्तान यह बात पूरी तरह से भूल चुका है कि “ जो लोग खुद शीशे के महल में रहते हैं, वे दूसरे के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते“। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के अलावा पाकिस्तान बलूचिस्तान में सालों से दमन चक्र चलाए हुए हैं मगर दुनिया को ऐसे दिखाता है जैसे इन क्षेत्रों में पूरी तरह से अमन-चैन है। वस्तु स्थिति यह है कि बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कष्मीर में सेना का जबरदस्त दमन चक्र जारी है और अवाम इससे मुक्ति चाहता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के अवाम की आवाज बुलंद करके इन क्षेत्रों के लोगों का दिल जीता है। प्रधानमंत्री के इस आक्रमण का तुरंत असर भी हुआ है। पाकिस्तान ने भारत को कश्मीर पर वार्ता का न्योता दिया और भारत ने भी साफ-साफ षब्दों में कह दिया कि वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और इस्लामाबाद प्रायोजित आतंक पर बातचीत के लिए तैयार है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह संसद में भी यह बात स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत अब पाकिस्तान के साथ सिर्फ उसके अधिकृत कष्मीर पर ही बातचीत करेगा। बहरहाल, पाकिस्तान को उसकी ही भाषा में जबाव देने से प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान नीति को एक नया मोड दिया है। भारत अब तक पडोसी देश के प्रति “सहअस्तित्व“ (लीव एंड लैट लीव) की नीति अपनाए हुए था मगर पाकिस्तान भारत के अस्तित्व को मानने को तैयार ही नहीं है, और वह भारत को अस्थिर करने की हर मुमकिन कोशिश करता रहता है। पाकिस्तान बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में अपनी सेना के दमन चक्र को छिपाने के लिए कश्मीर में भाडे के टटुओं को भेजकर खून-खराबा करा रहा है और पूरी दुनिया को दिखाना चाहता है कि भारत के हिस्से वाले कश्मीर में भी सेना का दमन चक्र जारी है। तथापि एक कटु सत्य यह भी है कि आजादी की आवाज को कहीं भी अधिक देर तक दमन से दबाया नहीं जा सकता। एक-न-एक दिन यह विस्फोट बनकर बाहर आ ही जाता है। पाकिस्तान में बलोच लोग आजादी के लिए न केवल पाकिस्तान से, अलबता ईरान से भी लोहा ले रहे है और स्वतंत्र बलोचिस्तान के लिए गोरिल्ला युद्ध छेडे हुए हैं। बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत, ईरान का सिस्तान और बलूचिस्तान और अफगानिस्तान का बलूचिस्तान शामिल है। बलूचिस्तान के राष्ट्रवादी फाइटर 1948 1958-59, 1962-63 औरा ं1973-77 मे पाकिस्तान के खिलाफ जबरदस्त संघर्ष छेड चुके हैं। 2003 से यह संघर्ष और भी तेज हुआ है। इसी तरह ं गिलगित-बल्तिस्तान समेत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोग भी सम्पूृर्ण आजादी चाहते हैं। पाकिस्तान को अब पता चलेगा कि दूसरों के मामलों में दखल देने के परिणाम कितने खतरनाक हो सकते हैं।






