सरकारी नौकरियों में अन्य पिछडा वर्ग के खाली पडे पदों की पूरी भर्ती नहीं होने से चिंतित मोदी सरकार ओबीसी के मलाईदार तबकों को भी आरक्षण देने की तैयारी में है। ताजा सूचना मुताबिक सरकार आय की अधिकतम सीमा में ढील देकर इसे 6 लाख से बढाकर सालाना 8 लाख का प्रस्ताव है। और अगर अन्य पिछडा वर्ग आयोग का वश चले तो आय की अधिकतम सीमा सालाना 15 लाख की जा सकती है । रोचक पहलू यह है कि अन्य पिछडा तबकों को सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण के बावजूद पिछले दो दशक में बमुश्किल 10-12 फीसदी पदों की भर्ती हो रही है। अन्य पिछडा आयोग का कहना है कि आय की अधिकतम सीमा भर्ती में आडे आ रही है। इसके यह अर्थ भी निकलते हैं कि अन्य पिछडा वर्ग के निचले तबकों को आरक्षण का पूरा लाभ नहीं मिल रहा है और मलाईदार तबके ही आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि आरक्षण का लाभ आरक्षित तबकों के अगडों को ही मिल रहा है। पिछडे आज भी आरक्षण के लाभ से वंचित है। सरकारी नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थाओं में सामाजिक और आर्थिक रुप से पिछडों का उत्थान आरक्षण का मूल मकसद रहा है। इसी मकसद से संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित एवं जन जातियों के लिए सरकारी नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण की व्यवस्था की थी। देश में आजादी के बाद अनुसूचित एवं जन जातियों के अलावा अन्य पिछडा वर्ग और अल्पसंख्यकों को भी सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण दिया जा रहा है। मगर जमीनी सच्चाई यह है कि आजादी के सात दशक के बावजूद दलित, अनुसूचित एवं अन्य पिछडों के कमजोर तबकों को अपेक्षाकृत आरक्षण का पूरा लाभ मिल नहीं पाया है। आजादी के समय समकालीन भारत का सामाजिक ताना-बाना मौजूदा समय से काफी भिन्न था। तब दलितों और कबालियों में मलाईदार तबकों का वजूद न के बराबर था। इसीलिए संविधान निर्माताओं ने तब मलाईदार (क्रीमी लेअर्स) का कोई उल्लेख नहीं किया था। मगर आजादी के बाद पिछले सात दशक में सियासी दलों ने आरक्षण को ”वोट की राजनीति ”में बदलकर इस संवैधानिक व्यवस्था का जमकर दुरुपयोग किया है। नतीजतन, मौजूदा समय में समाज का हर वर्ग आरक्षण मांग रहा है। हरियाणा में जाट इस बिला पर आरक्षण मांग रहे हैं कि यह समुदाय शैक्षणिक रुप से काफी पिछडा हुआ है। जाट ही नहीं अगडों में आर्थिक रुप से कमजोर तबके भी आरक्षण की मांग कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी जब विपक्ष में हुआ करती थी, तब आरक्षित वर्गोंं के मलाईदार तबकों को आरक्षण सुविधा से बाहर रखने की पक्षधर थी और आरक्षण के लिए सामाजिक की बजाए आर्थिक पिछडेपन को आधार बनाने की जबरदस्त पैरवीकार हुआ करती थी। अस्सी के दशक में केन्द्र में भाजपा के समर्थन से सत्तारूढ विश्व प्रताप सिंह की जनता सरकार की मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने पर पार्टी (भाजपा) ने सरकार ही गिरा दी थी। तब भाजपा की मांग थी कि आरक्षण आर्थिक आधार पर दिया जाना चाहिए। बहरहाल, सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थां में आरक्षण की मौजूदा मीति ने योग्य और प्रतिभावान पात्र युवकों को रोजगार से वंचित कर रखा है। केन्द्र और राज्य सरकारें अनुसूचित, जन जातियों एवं अन्य पिछडा वर्ग को आरक्षित पदों के लिए रोस्टर पद्धति अपनाती है और पात्र लोग नहीं मिलने के बावजूद इन पदों को अनारिक्षत नहीं किया जाता। फलस्वरुप, कई पद ऐसे हैं जो लंबे समय से खाली पडे हैं जबकि देश में बेरोजगारो की कतार लगी हुई है। यहां कहां का इंसाफ है?
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