संसद में वीरवार को समाजवादी पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) के आक्रोश ने फिर केन्द्र-राज्यों के तल्ख संबंधों को उजागर किया है। उत्तर प्रदेश में सत्तारुढ समाजवादी पार्टी और बिहार में भारतीय जनता पार्टी से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल के साथ सता में आई जनता दल (यूनाइटेड) का आरोप है कि भाजपा नीत केन्द्र सरकार उन्हें पर्याप्त बजट नही दे रही है। बिहार के सांसद अली अनवर अंसारी का कहना था कि राज्य के 14 जिले भीषण बाढ से प्रभावित हैं, 2300 गांव पूरी तरह से डूब चुके हैं और पाच लाख हेक्टेेयर क्षेत्र में फसल नश्ट हो चुकी है। मगर इसके बावजूद प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू नहीं की गई है। समाजवादी पार्टी का भी यही आरोप है। कांग्रेस का आरोप है कि केद्र सरकार गैर-भाजपा शासित राज्यों से भेदभाव कर रही है। यह पहला अवसर नहीं है। संप्रग सरकार के समय भाजपा यही आरोप लगाया करती थी कि कांग्रेस नीत संप्रग सरकार भाजपा शासित राज्यों से भेदभाव कर रही है। वित्तीय मदद के अलावा केन्द्र पर संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग के भी आरोप लगते रहे हैं। और इस संवैधानिक व्यवस्था का दुरुययोग करने में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही एक-दूसरे से आगे रही हैं। भाजपा जब विपक्ष में थी, वह कांग्रेस को अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग करने के लिए जी भर कर कोसा करती थी। 1992 में अयोध्या में कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद केन्द्र में सतारूढ नरसिंह राव सरकार ने उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में प्रचंड जनादेश से आई भाजपा सरकारों को डिसमिस करके विधानसभाएं भंग कर दी थी। तब कांग्रेस सरकार का यह कदम उतना ही असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक था, जितना मोदी सरकार का उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार को हटाने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाना। उत्तर प्रदेश और बिहार अथवा अन्य गैर भाजपा शासित राज्यों के गिले-शिकवों के अलावा दिल्ली में मुख्यमंत्री-उप राज्यपाल टकराव ने भी कई प्रश्न खडे किए हैं। भारत में लिखित संविधान है और इसमें केन्द्र और राज्यों के अधिकारों को लेकर सुस्पष्ट व्याख्या की गई है। भारत को “ यूनियन ऑफ स्टेटस“ करार देते हुए संविधान में संघीय ढांचे ( फेडेरल सिसटम) की परिकल्पना की गई है। राज्यों को संसद में पर्याप्त नुमाइंदगी देने के लिए राज्य सभा का गठन किया गया है। निष्पक्ष न्यायपालिका संवैधानिक वॉच डॉग का काम करती है। संवैधानिक तौर पर गठित वित्त आयोग केन्द्र और राज्यों में वित्तीय संसाधनों का बंटवारा करता है। केन्द्र सरकार वित आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए बाध्य है। इन सब व्यवस्थाओं के बावजूद फिर संघीय ढांचे को कमजोर करने के प्रयास क्यों? दरअसल, विधि वेताओं का मत है कि संविधान में गैर संघीय विशेषताएं (फीचर्स) संघीय विशेषताओं पर भारी पडती है। संविधान में ताकतवर केद्र का सृजन किया गया है, और यह व्यवस्था इतनी ताकतवर है कि इसमें राज्यों को सिवा शोर मचाने के सिवा कोई अधिकार नहीं है। संविधान में तीन अनुसूचिया- केन्द्र, स्टेट और समवर्ती- तो हैं और इनमें अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या भी है मगर राज्यों के लिए अलग से कोई संविधान नही है। अमेरिका में हर स्टेट का अपना अलग संविधान है। तथापि भारत अमेरिका जैसा नहीं बन सकता। भारत में भाषा , संप्रदाय और सांस्कृतिक विविधता हैं और इन सब को एकसूत्र में बांध रखने के लिए मजबूत केन्द्र की दरकार थी। कश्मीर और पूर्वोतर राज्यों की घटनाएं भी इसी अनिवार्यता को उजागर करती हैं। मगर केन्द्र सरकार का यह संवैधानिक दायित्व है कि राज्यों को उनका माकूल हक मिले और इसमें “कौन अपना है, कौन पराया“, इस भावना से भेदभाव नहीं किया जाए। कमजोर संघीय ढांचा देश की अखंडता पर प्रहार कर सकता है।
मंगलवार, 16 अगस्त 2016
केंद्र -राज्य तल्ख संबंध क्यों?
Posted on 8:15 pm by mnfaindia.blogspot.com/
संसद में वीरवार को समाजवादी पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) के आक्रोश ने फिर केन्द्र-राज्यों के तल्ख संबंधों को उजागर किया है। उत्तर प्रदेश में सत्तारुढ समाजवादी पार्टी और बिहार में भारतीय जनता पार्टी से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल के साथ सता में आई जनता दल (यूनाइटेड) का आरोप है कि भाजपा नीत केन्द्र सरकार उन्हें पर्याप्त बजट नही दे रही है। बिहार के सांसद अली अनवर अंसारी का कहना था कि राज्य के 14 जिले भीषण बाढ से प्रभावित हैं, 2300 गांव पूरी तरह से डूब चुके हैं और पाच लाख हेक्टेेयर क्षेत्र में फसल नश्ट हो चुकी है। मगर इसके बावजूद प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू नहीं की गई है। समाजवादी पार्टी का भी यही आरोप है। कांग्रेस का आरोप है कि केद्र सरकार गैर-भाजपा शासित राज्यों से भेदभाव कर रही है। यह पहला अवसर नहीं है। संप्रग सरकार के समय भाजपा यही आरोप लगाया करती थी कि कांग्रेस नीत संप्रग सरकार भाजपा शासित राज्यों से भेदभाव कर रही है। वित्तीय मदद के अलावा केन्द्र पर संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग के भी आरोप लगते रहे हैं। और इस संवैधानिक व्यवस्था का दुरुययोग करने में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही एक-दूसरे से आगे रही हैं। भाजपा जब विपक्ष में थी, वह कांग्रेस को अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग करने के लिए जी भर कर कोसा करती थी। 1992 में अयोध्या में कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद केन्द्र में सतारूढ नरसिंह राव सरकार ने उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में प्रचंड जनादेश से आई भाजपा सरकारों को डिसमिस करके विधानसभाएं भंग कर दी थी। तब कांग्रेस सरकार का यह कदम उतना ही असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक था, जितना मोदी सरकार का उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार को हटाने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाना। उत्तर प्रदेश और बिहार अथवा अन्य गैर भाजपा शासित राज्यों के गिले-शिकवों के अलावा दिल्ली में मुख्यमंत्री-उप राज्यपाल टकराव ने भी कई प्रश्न खडे किए हैं। भारत में लिखित संविधान है और इसमें केन्द्र और राज्यों के अधिकारों को लेकर सुस्पष्ट व्याख्या की गई है। भारत को “ यूनियन ऑफ स्टेटस“ करार देते हुए संविधान में संघीय ढांचे ( फेडेरल सिसटम) की परिकल्पना की गई है। राज्यों को संसद में पर्याप्त नुमाइंदगी देने के लिए राज्य सभा का गठन किया गया है। निष्पक्ष न्यायपालिका संवैधानिक वॉच डॉग का काम करती है। संवैधानिक तौर पर गठित वित्त आयोग केन्द्र और राज्यों में वित्तीय संसाधनों का बंटवारा करता है। केन्द्र सरकार वित आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए बाध्य है। इन सब व्यवस्थाओं के बावजूद फिर संघीय ढांचे को कमजोर करने के प्रयास क्यों? दरअसल, विधि वेताओं का मत है कि संविधान में गैर संघीय विशेषताएं (फीचर्स) संघीय विशेषताओं पर भारी पडती है। संविधान में ताकतवर केद्र का सृजन किया गया है, और यह व्यवस्था इतनी ताकतवर है कि इसमें राज्यों को सिवा शोर मचाने के सिवा कोई अधिकार नहीं है। संविधान में तीन अनुसूचिया- केन्द्र, स्टेट और समवर्ती- तो हैं और इनमें अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या भी है मगर राज्यों के लिए अलग से कोई संविधान नही है। अमेरिका में हर स्टेट का अपना अलग संविधान है। तथापि भारत अमेरिका जैसा नहीं बन सकता। भारत में भाषा , संप्रदाय और सांस्कृतिक विविधता हैं और इन सब को एकसूत्र में बांध रखने के लिए मजबूत केन्द्र की दरकार थी। कश्मीर और पूर्वोतर राज्यों की घटनाएं भी इसी अनिवार्यता को उजागर करती हैं। मगर केन्द्र सरकार का यह संवैधानिक दायित्व है कि राज्यों को उनका माकूल हक मिले और इसमें “कौन अपना है, कौन पराया“, इस भावना से भेदभाव नहीं किया जाए। कमजोर संघीय ढांचा देश की अखंडता पर प्रहार कर सकता है।






