कांग्रेस की कार्यशैली भी विचित्र है। जिस शीला दीक्षित को तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहने के बावजूद 2015 में डंप कर दिया गया था और विधानसभा चुनाव में प्रचार के काबिल भी नहीं समझा गया था, उन्हीं को पार्टी अब सिर-आंखों पर बिठा रही है। काग्रेस ने 78 वर्षीय शीला दीक्षित को देश के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी का मुख्यमंत्री उम्मीदवार नामित किया है। शीला उत्तर प्रदेश की बहू है और पंजाब की बेटी। पंजाब में जन्मी शीला दीक्षित उत्तर प्रदेश के अग्रणी ब्राहृाण परिवार में ब्याही गई हैं। उनके ससुर पदम विभूषण उमा शंकर दीक्षित केद्र में मंत्री और कर्नाटक एव पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रह चुके हैं। शीला दीक्षित उमा शंकर के आईएएस बेटे विनोद दीक्षित की पत्नी है। शीला का बेटा संदीप दीक्षित दिल्ली से सांसद है। कांग्रेस को उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश के अग्रणी ब्राहृाण परिवार की बहू सताइस साल से सत्ता से बेदखल हुई पार्टी को बहुमत दिला सकती है। उत्तर प्रदेश में लगभग दस फीसदी ब्राहृाण मतदाता हैं । बहुजन समाज पार्टी के दलित और जमजवादी पार्टी के पिछडा-अल्पसंख्यक गणित में बंटे राज्य में दस फीसदी वोट खासे मायने रखते हैं। 2007 के विधानसभा चुनाव में सुश्री मायावती की बसपा ने टिकट वितरण में ब्राहृाणों को खासी तव्वजो दी थी और इसका पार्टी को फल भी मिला था। बसपा को पहली बार विधानसभा में पूर्ण बहुमत मिला था। तब विधानसभा चुनाव के बाद कराए गए सर्वेक्षण से पता चला था कि हालांकि पूए राज्य में मात्र 17 फीसदी बाहृाणों ने ही बसपा को वोट डाले थे मगर जिन हलको में बसपा ने ब्राहृाण उम्मीदवार उतारे थे, वहां बडी संख्या में ब्राहृाण मतदाताओं ने बसपा उम्मीदवारों के पक्ष में वोट डाले थे और अधिकतर जीते भी थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में ब्राहृाण मतदाताओं ने कांग्रेस का साथ दिया और तब पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 80 मेंसे 21 सीटें जीतीं थी और सहयोगी दल राष्ट्रीय लोक दल को पांच सीटें मिली थीं। 2004 के लोकसभा चुनाव में काग्रेस उत्तर प्रदेश में मात्र 9 सीटें जीत पाईं थी। 1984 के बाद कांग्रेस का यह श्रेष्ठ प्रदर्शन था। वैसे उत्तर प्रदेश में ब्राहृाण भाजपा का साथ देते रहे है। अटल बिहारी वाजपेयी के समय में अधिकतर ब्राहृाण भाजपा के साथ थे। तदुपरांत उनका भाजपा से मोह भंग हो गया। भाजपा में ब्राहृाण नेता मुरली मनोहर जोशी और कलराज मिश्र की अपेक्षा ठाकुर नेता राजनाथ सिंह को कहीं ज्यादा अहमियत दी गई है। राज्य के ब्राहृाणों को ठाकुरों की दबंगी फूटी आंख भी नहीं सुहाती है। बहरहाल, चुनाव गणित यही साबित करता है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करनी है तो वोट केचिंग समीकरण बैठाने ही पडेंगें। इसी सियासी विवशता के कारण कांग्रेस ने युवा प्रियंका गांधी वाड्रा की बजाए 78 वर्षीय शीला दीक्षित को ज्यादा बेहतर माना है। पार्टी ने ठाकुर मतदाताओं को लुभाने के लिए संजय सिंह को चुनाव प्रचार अभियान का प्रमुख बनाया है और अल्पसंख्यकों के वोट में सेंध लगाने के लिए राज बब्बर को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किया है। एक जमाना था जब कांग्रेस का दलित वोटों पर एकाधिकार हुआ करता था मगर बहुजन समाज पार्टी के उभरने से कांग्रेस का यह वोट भी जाता रहा । अल्पसंख्यक और पिछडे आज भी मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के साथ हैं। भाजपा द्वारा मतदाताओं का धु्रवीकरण कराए जाने की स्थिति में अल्पसंख्यक पूरी तरह से समाजवादी पार्टी के साथ खडे हो जाते हैं। इस स्थिति में अल्पसंख्यकों को लगता है कि काग्रेस की बनिस्बत सपा सत्ता के ज्यादा करीब है। कांग्रेस ने चुनावी गणित का जमा-नफा करके समीकरण बैठा तो लिए हैं मगर इससे उत्तर प्रदेश में पार्टी का बंटाधार नहीं हो पाएगा। 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पार्टी के स्थानीय वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर “पैराशूटी“ किरण बेदी को मुख्यमंत्री का प्रत्याशी बनाया था। मगर यह प्रयोग सफल नहीं हुआ। उतर प्रदेश कांग्रेस लगभग मरणासन्न की स्थिति में है। पार्टी में जान फूकने के लिए लोक लुभावने करिश्माई नेता की दरकार है। शीला दीक्षित इस फ्रेम में फिट हो पाएंगी, कांग्रेस के लिए अब भी यही बडी चुनौती है।
रविवार, 17 जुलाई 2016
शीला दीक्षित की लोकप्रियता
Posted on 11:52 am by mnfaindia.blogspot.com/
कांग्रेस की कार्यशैली भी विचित्र है। जिस शीला दीक्षित को तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहने के बावजूद 2015 में डंप कर दिया गया था और विधानसभा चुनाव में प्रचार के काबिल भी नहीं समझा गया था, उन्हीं को पार्टी अब सिर-आंखों पर बिठा रही है। काग्रेस ने 78 वर्षीय शीला दीक्षित को देश के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी का मुख्यमंत्री उम्मीदवार नामित किया है। शीला उत्तर प्रदेश की बहू है और पंजाब की बेटी। पंजाब में जन्मी शीला दीक्षित उत्तर प्रदेश के अग्रणी ब्राहृाण परिवार में ब्याही गई हैं। उनके ससुर पदम विभूषण उमा शंकर दीक्षित केद्र में मंत्री और कर्नाटक एव पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रह चुके हैं। शीला दीक्षित उमा शंकर के आईएएस बेटे विनोद दीक्षित की पत्नी है। शीला का बेटा संदीप दीक्षित दिल्ली से सांसद है। कांग्रेस को उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश के अग्रणी ब्राहृाण परिवार की बहू सताइस साल से सत्ता से बेदखल हुई पार्टी को बहुमत दिला सकती है। उत्तर प्रदेश में लगभग दस फीसदी ब्राहृाण मतदाता हैं । बहुजन समाज पार्टी के दलित और जमजवादी पार्टी के पिछडा-अल्पसंख्यक गणित में बंटे राज्य में दस फीसदी वोट खासे मायने रखते हैं। 2007 के विधानसभा चुनाव में सुश्री मायावती की बसपा ने टिकट वितरण में ब्राहृाणों को खासी तव्वजो दी थी और इसका पार्टी को फल भी मिला था। बसपा को पहली बार विधानसभा में पूर्ण बहुमत मिला था। तब विधानसभा चुनाव के बाद कराए गए सर्वेक्षण से पता चला था कि हालांकि पूए राज्य में मात्र 17 फीसदी बाहृाणों ने ही बसपा को वोट डाले थे मगर जिन हलको में बसपा ने ब्राहृाण उम्मीदवार उतारे थे, वहां बडी संख्या में ब्राहृाण मतदाताओं ने बसपा उम्मीदवारों के पक्ष में वोट डाले थे और अधिकतर जीते भी थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में ब्राहृाण मतदाताओं ने कांग्रेस का साथ दिया और तब पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 80 मेंसे 21 सीटें जीतीं थी और सहयोगी दल राष्ट्रीय लोक दल को पांच सीटें मिली थीं। 2004 के लोकसभा चुनाव में काग्रेस उत्तर प्रदेश में मात्र 9 सीटें जीत पाईं थी। 1984 के बाद कांग्रेस का यह श्रेष्ठ प्रदर्शन था। वैसे उत्तर प्रदेश में ब्राहृाण भाजपा का साथ देते रहे है। अटल बिहारी वाजपेयी के समय में अधिकतर ब्राहृाण भाजपा के साथ थे। तदुपरांत उनका भाजपा से मोह भंग हो गया। भाजपा में ब्राहृाण नेता मुरली मनोहर जोशी और कलराज मिश्र की अपेक्षा ठाकुर नेता राजनाथ सिंह को कहीं ज्यादा अहमियत दी गई है। राज्य के ब्राहृाणों को ठाकुरों की दबंगी फूटी आंख भी नहीं सुहाती है। बहरहाल, चुनाव गणित यही साबित करता है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करनी है तो वोट केचिंग समीकरण बैठाने ही पडेंगें। इसी सियासी विवशता के कारण कांग्रेस ने युवा प्रियंका गांधी वाड्रा की बजाए 78 वर्षीय शीला दीक्षित को ज्यादा बेहतर माना है। पार्टी ने ठाकुर मतदाताओं को लुभाने के लिए संजय सिंह को चुनाव प्रचार अभियान का प्रमुख बनाया है और अल्पसंख्यकों के वोट में सेंध लगाने के लिए राज बब्बर को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किया है। एक जमाना था जब कांग्रेस का दलित वोटों पर एकाधिकार हुआ करता था मगर बहुजन समाज पार्टी के उभरने से कांग्रेस का यह वोट भी जाता रहा । अल्पसंख्यक और पिछडे आज भी मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के साथ हैं। भाजपा द्वारा मतदाताओं का धु्रवीकरण कराए जाने की स्थिति में अल्पसंख्यक पूरी तरह से समाजवादी पार्टी के साथ खडे हो जाते हैं। इस स्थिति में अल्पसंख्यकों को लगता है कि काग्रेस की बनिस्बत सपा सत्ता के ज्यादा करीब है। कांग्रेस ने चुनावी गणित का जमा-नफा करके समीकरण बैठा तो लिए हैं मगर इससे उत्तर प्रदेश में पार्टी का बंटाधार नहीं हो पाएगा। 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पार्टी के स्थानीय वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर “पैराशूटी“ किरण बेदी को मुख्यमंत्री का प्रत्याशी बनाया था। मगर यह प्रयोग सफल नहीं हुआ। उतर प्रदेश कांग्रेस लगभग मरणासन्न की स्थिति में है। पार्टी में जान फूकने के लिए लोक लुभावने करिश्माई नेता की दरकार है। शीला दीक्षित इस फ्रेम में फिट हो पाएंगी, कांग्रेस के लिए अब भी यही बडी चुनौती है।






