सोमवार, 4 जुलाई 2016

बाबुओं में असंतोष क्यों!



मोदौ सरकार द्वारा अपने कर्मचारियों को सातवे वेत्तन आयोग की सिफारिशों  के अनुरुप  23 फीसदी वेतन वृद्धि दिए जाने के बावजूद  “बाबु“ खुश  नहीं है। सरकार ने  गत बुधवार को आयोग की सिफारिशें  मानते हुए इसे पहली जनवरी 2016 से लागू करने का फैसला लिया। आयोग ने अपनी सिफारिशों में सभी वर्ग के केन्द्रीय कर्मचारियों को कम-से-कम  23.5 फीसदी वेतन वृद्धि  थी। ताजा फैसले से  47 लाख कर्मचारियों और  53 लाख पेंशनभोगियों को फायदा होगा। अब केन्द्रीय कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन 18, 000 रु  और अधिकतम  2,50,000 रु मासिक हो जाएगा। अभी न्यूनतम वेतन 7,000 और अधिकतम 90,000 है। पेंशनभोगियों को 24 फीसदी वृद्धि दी गई है। गै्रच्युटी की सीमा दस लाख से बढाकर बीस लाख कर दी गई है। इस  वृद्धि  के अलावा यह भी प्रावधान किया गया है कि डीए के पचास फीसदी बढते ही  ग्रैच्युटी में भी 25 फीसदी की बढोतरी होगी। कुल मिलाकर बेसिक में अढाई गुना और समर्ग  (टोटल) सैलरी में  23.5 फीसदी  वृद्धि हुई है मगर कर्मचारी इससे भी संतुष्ट  नहीं है। केन्द्रीय कर्मचारियों ने वेतन वृद्धि को इस बिला पर ठुकरा दिया है कि  70 साल में यह सबसे कम वृद्धि है जबकि सात दशक के दौरान कर्मचारियों के वेतन में 327 गुना वृद्धि हो चुकी है। नए वेतनमान अगस्त माह से लागू हो सकते हैं। कर्मचारियों का एक जनवरी,  2016 से अब तक के  एरियर का भुगतान भी इसी साल कर दिया जाएगा। केन्द्र सरकार को हर साल 85, 000 करोड रु का अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पडेगा। सरकार को एरियर बतौर 94,775 करोड रु देने पडेंगे। यानी सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों  को लागू करने के लिए केन्द्र सरकार को इस वित्तीय वर्ष   में 1,79,775 करोड रु जुटाने पडेंगे। इसमेंसे अगर एरियर नगद भुगतान नहीं किया जाता है तो भी सरकार को इस साल कर्मचारियों को एक लाख करोड रु से ज्यादा का नगद भुगतान करना पडेगा। केन्द्रीय कर्मचारियो के अलावा विभिन्न राज्यों को भी अपने कर्मचारियों को केन्द्र की तर्ज  पर वेतन वृद्धि देनी होगी। देश  के कई राज्य केन्द्र के वेतनमान को लागू करते हैं। छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के कारण देश  के 21 राज्यों की वित्तीय स्थिति काफी डांवडोल हो गई थी और 2000 के बाद कडे वित्तीय अनुशासन का जो लाभ मिला था, वह चुटकियों में मलियामेट हो गया था। छठे वेतन आयोग से पहले राज्यों के कुल बजट का 30 से 45 फीसदी बजट कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर खर्च हो रहा था। इसके बाद यह बढकर 60 फीसदी तक पहुंच गया और अब सात्तवें वेतन आयोग को लागू करने पर यह और बढ जाएगा। पंजाब और हिमाचल की वित्तीय स्थिति तो और भी दयनीय हो  सकती है। इन दोनों राज्यों की माली हालत इतनी खराब है कि और ज्यादा वेतन वृद्धि देने पर वेतन-पेंशन देने के भी लाले पड सकते हैं। बहरहाल, केन्द्र सरकार के कर्मचारियों को मिलने वाले लगभग एक लाख करोड रु से बाजार में उपभोग वस्तुओं (कंज्यूमर गुडस) की मांग बढेगी। अनुमान है कि लगभग 45000 करोड रु सीधे बाजार में आएंगे जबकि करीब तीस हजार करोड रु की बचत होगी। इस विशाल राशि  मेंसे सरकार को बतौर टैक्स लगभग 14, 000 करोड रु वापस मिल जाएंगे। मध्यम वर्ग  में  कार, टीवी, फ्रिज जैसी   कंज्यूमर डयूरेबल चीजों को लेने की क्रेज होती है। बाजार में इतनी बडी राशि  के आने से टीवी और फ्रिज जैसे कंज्यूमर डयूरेबल गुडस की मांग बढ सकती है। इससे  कंज्यूमर डयूरेबल इंडस्ट्री में 15 फीसदी की ग्रोथ हो सकती है। ऑटोमोबाइल में बीस फीसदी ग्रोथ  हो सकती है। सबसे ज्यादा फायदा मंदी से पीडित रियल्टी सेक्टर को हो सकता है। बाजार में नगदी आने से इस सेक्टर की सुस्ती कम हो सकती है। बाजार मे और ज्यादा पैसा आने से महंगाई भी बढ सकती है और अनुमान है मुद्रा-स्फीति में डेढ से दो फीसदी का उछाल आ सकता है। आम आदमी को इसके लिए तैयार रहना चाहिए।