बुधवार, 13 जुलाई 2016

आरएसएस और मुस्लिम

देश  में कटटर दक्षिणपंथी विचारधारा और हिंदुत्व की संरक्षक राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) और मुस्लिम समुदाय के बीच संवाद के प्रयास  शुरु होना काबिलेगौर घटना है। और इससे भी बडी सुखद घटना यह है कि  सुन्नी उलेमा काउंसिल के सदस्यों ने  खुद पहल करके  राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत से मिलने का समय मांगा । इन दिनों उत्तर प्रदेश  के कानपुर में संघ के प्रांतीय प्रचारकों की सालाना बैठक चल रही है। इसी  बैठक के सिलसिले में मोहन भागवत भी कानपुर में है। सुन्नी उलेमा काउंसिल के सदस्य ने भागवत से कानपुर में मिलने का समय मांगा था। मगर उन्हें भागवत से मिलने का समय नहीं दिया गया। इसलिए, काउंसिल के सदस्यों ने आरएसएस प्रमुख को चिठ्ठी लिखकर कुछ सवाल पूछे हैं और एक अहम सवाल यह है कि “ संघ मुसलमानों से कैसा राष्ट्रप्रेम  चाहता है? संभवतय, आरएसएस प्रमुख इस अप्रत्याशित मुलाकात और सवालों के लिए तैयार नहीं थे, इसीलिए मुस्लिम नेताओं को मिलने का समय नहीं दिया गया? उलेमा काउसिल ने और भी कई सवाल उठाए है और सब का लब्बोलुआब यही है कि संघ को देश  के मुस्लिम समुदाय के संदर्भ  में अपना दृष्टिकोण  और हिन्दुत्व की परिभाषा  सुस्पष्ट  करनी चाहिए। सुन्नी उलेमा काउंसिल की इस पहल का मकसद कुछ भी हो मगर एक बात साफ है कि अगर संघ में देश  के मुसलमानों को स्पेस दी जाती है, तो वे इस पर विचार कर सकते हैं। और इस मार्ग  में सबसे बडा रोडा संघ और उसके परिवार का कट्टरवादी  दृष्टिकोण  और विचारधारा है। भारत की सवा सौ करोड की आबादी में 18 फीसदी के करीब मुसलमान है और इनमें अधिकतर शिया और सुन्नी  हैं। माना जाता है कि ईरान के बाद  शिया मुसलमानों  की सबसे बडी आबादी भारत में है। लेकिन सुन्नी मुसलमानों की आबादी भी कम नहीं है। बहरहाल, मुस्लिम समुदाय का राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ की प्रांतीय बैठक के दौरान आरएसएस प्रमुख से मुलाकात करने की पहल से माना जा सकता है कि देश  का मुस्लिम उतरोत्तर संघ और भगवा संगठनों के प्रति जो भ्रातियां पाले हुए है, उन्हें दूर करने के लिए  वह तैयार है। अब गेंद संघ के पाले में है। संघ को भी मुस्लिम नेताओं से संवाद करने की पहल करनी चाहिए। मुसलमान भारत के अभिन्न अंग है और इसी तथ्य के मद्देनजर  संविधान निर्माताओं ने देश  के लिए धर्म सापेक्ष (पाकिस्तान) की बजाय धर्म निरपेक्ष का मार्ग चुना था। आरएसएस को भले ही इस संवैधानिक व्यवस्था पर ऐतराज हो मगर संघ इस सच्चाई से भी भलि-भांति परिचित है कि भारत पाकिस्तान की तरह धर्म सापेक्ष नहीं बन सकता । और इसी सच्चाई के दृष्टिगत  2002 में तत्कालीन संघ प्रमुख केएस सुदर्शन  की पहल पर “मुस्लिम राष्ट्रीय  मंच“ का गठ्न भी किया गया था। मुस्लिम समुदाय में आरएसएस के प्रति फैलाई गई भ्रांतियों को दूर करना और दोनों समुदाय के बीच की दूरी को पाटना इस मंच का प्रमुख मकसद था। मगर गोदरा कांड और गुजरात दंगों से मंच के प्रयास पर पानी फिर गया। अब यह मंच योगा के माध्यम से मुस्लिम समुदाय तक पहुंचने की कोशिश  कर रहा है। 2015 में मंच ने “योगा और इस्लाम“ नाम से एक पुस्तक भी निकाली थी। इस मंच की पहल पर ही योगा से  सूर्य नमस्कार पर नरम रुख अपनाया गया था। बहरहाल,  संघ को भी अब बाबा आदम के जमाने की मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए। धर्म  निरपेक्ष देश  मे हर सामाजिक संगठन को  धर्म की जगह राष्ट्रीयता  पर फोक्स करना चाहिए। भारत हिंदु, मुसलमान, ईसाई सभी का मुल्क है और यहां धर्म की जगह  देश  के प्रति निष्ठा सर्वोपरि  होनी चाहिए। संघ को भी इस मामले में अपनी प्राथमिकता को बदलना होगी । भारत, भारतीयों का  देश  है और इसमें हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी बराबर हैं। अगर हम दंगे-फसाद और असहिष्णुता   को छोडकर   मिलकर देश  को आगे बढाएं, तो भारत 2050 तक दुनिया का सबसे ताकतवर बन जाएगा। तब तक पूरी दुनिया में हिन्दुओं और भारतीय मुस्लमानों की आबादी में भी सबसे विशाल  होगी।