सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्वोतर राज्य अरुणाचल प्रदेश में “भाजपा द्वारा प्रायोजित“ दल-बद्लुओं की सरकार को अवैध करार देकर मोदी सरकार को तगडा झटका दिया है। न्यायालय ने अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन को भी असंवैधानिक बताया है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से न केवल लोकतंत्र मजबूत हुआ है, अलबत्ता केन्द्र में सत्ताधारी दल को इस बात के लिए चेताया है कि न्यायपालिका संवैधानिक पावर्स का बेजा इस्तेमाल नहीं होने देगी। उत्तराखंड के बाद फिर अरुणाचल प्रदेश के मामले में मोदी सरकार की खासी किरकिरी हुई है और दोनों ही राज्यों के राज्यपालों की जगहंसाई हुई है। देश को कथित कांग्रेस मुक्त करने के चक्र में भाजपा खुद असंवैधानिक कुचक्र में उलझ कर रह गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा द्वारा पिछले साल दिसंबर के बाद लिए गए सभी फैसले निरस्त कर दिए हैं और राज्य में 15 दिसंबर से पहले की स्थिति बहाल करने के आदेश दिए हैं। यानी अरुणाचल्ल प्रदेश में अब दल-बदलुओं की जगह नाबाम टुकी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पदस्थ हो जाएगी। कंग्रेस के लिए यह बहुत बडी राहत है। अरुणाचल प्रदेश में पिछले साल उस समय राजनीति संकट खडा हो गया था, जब कांग्रेस के 47 मेंसे 21 विधायकों ने मुख्यमंत्री नाबाम टुकी को हटाने की मांग की थी। कांग्रेस हाई कमान ने जब इस मांग को मानने से इंकार कर दिया, बागी विधायकों ने पार्टी छोड दी और कालिखो पुल को अपना नेता चुन लिया। इसके बाद काफी राजनीतिक उठा-पटक हुई। राज्यपाल राजखोवा ने विधानसभा सत्र को जनवरी माह में बुलाने की अपनी ही अधिसूचना को निरस्त कर दिया और सत्र पहले बुला लिया। संविधान में राज्यपाल को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है। विधानसभा का सत्र केवल मंत्रिमंडल की सिफारिश पर बुलाया जा सकता है। बागियों ने भाजपा के साथ मिलकर कम्युनिटी हॉल में विधान सभा सत्र आयोजित कर विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित किया गया। बाद में गुवाहटी उच्च न्यायालय ने बागियों की इस कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। उच्च न्यायालय ने सत्र बुलाने की राज्यपाल की कार्रवाई को भी असंवैधानिक बताया था। मगर समकालीन विषुद्ध राजनीतिक “राज्यपालों“ को न्यायपालिका की फटकार से भी कोई फर्क नहीं पडता है। केन्द्र ने राजनीतिक अस्थिरता का हवाला देकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। राज्यपाल राजखोवा ने 15 मिनट के भीतर अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में इस बात का संज्ञान भी लिया था और संबंधित फाइल तलब की थी। सर्वोच्च न्यायालय राज्य में सराकर बनाने की प्रकिया पर रोक हटाए जाने के बाद 19 फरवरी को राज्यपाल राजखोवा ने दल-बदलुओ के नेता कालिखो पुल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई और 11 सदस्यीय भाजपा ने सरकार का साथ दिया। जाहिर है अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार को अपदस्थ करने में भाजपा की प्रमुख भूमिका रही है। वैसे कांग्रेस भी इस मामले में दूध की धुली नही है। 2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 60 मेंसे 42 सीटें जीतीं थी और बाद में पीपीए के पांच विधायकों को दल-बदल करवाकर दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया था। इसके बावजूद भी सरकार गिर गई। अरुणाचल प्रदेश में दल-बदल का खेल काफी पहले से जारी है। 2003 में कांग्रेस के वरिष्ठ गेगांग अपांग ने 34 विधायकों को साथ लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री मुकुट मिथि का तख्ता पलट दिया था। अपांग अब भाजपा में है। निसंदेह, अरुणाचल प्रदेश पर न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक और अभूतपूर्व है। उतराखंड के बाद न्यायपालिका का यह दूसरा ऐतिहासिक फैसला है और दल-बदलुओं को बडी नसीहत। तथापि कांग्रेस के लिए अरुणाचल में राह आसान नहीं है। सरकार बहुमत के बल पर बनती -गिरती है। मुख्यंमत्री टुकी के पास फिलहाल बहुमत नहीं है। उन्हें बहुमत जुटाना होगा। दल-बदलू विधायकों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। पद के भूखे दल-बदलू आराम से नहीं बेठेगें और राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बनी रहेगी। मध्यावधि विधानसभा चुनाव ही एकमात्र विकल्प नजर आ रहां है।
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