सुरक्षा बलों द्वारा जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकी संगठन हिजबुल के पोस्टर बॉय बाइस वर्षीय खूंखार आतंकी बुरहान वानी को मार गिराने के बाद पूरी घाटी हिंसा और विरोध प्रदर्शन में सुलग रही है। कश्मीर के ताजा हालात इस सच्चाई को उजागर करते हैं कि घाटी मे हवा राष्ट्रीय मुख्यधारा के पक्ष में नहीं है। सुरक्षा बलों ने किसी निर्दोष को नहीं, बल्कि खूंखार आतंकी को मार गिराया है। पिछले कई माह से वानी सोशल मीडिया पर धडल्ले से सैन्य पोशाक में अपनी और अन्य आतंकियों की फोटो पोस्ट करता और बडी शान से अपनी और अपने गिरोह की आतंकी हरकतों की डींगें हांकता। इसी वजह उसे आतंकी संगठ्न हिजबुल का पोस्टर बॉय भी कहा गया। सेना के हाथों मारे जाने पर मीडिया में उसकी जो फोटो प्रकाशित हुई है, उससे ऐसा लग रहा था जैसे कोई आतंकी नहीं, अलबत्ता सैनिक मारा गया हो। इस तरह की कुछ बातें हैं, जो कश्मीर में हालात को और ज्यादा बिगाड रहे हैं। आतंकी को मारना कोई अपराध नहीं है। मगर बुरहान वानी की मौत पर पूरी कश्मीर घाटी ऐसे उबल रही है जैसे कोई आतंकी नहीं, देशभक्त मारा गया हो। और जमीनी सच्चाई भी यही है। घाटी में अलगाववादी और पाकिस्तानी पिठ्ठू बुरहानी और उस जैसे आतकी की मौत को “ शहादत“ के रुप में पेश कर रहे हैं और अवाम भी कमोवेश यही मान रहा है। बुरहानी न तो कोई देशभक्त था और न ही बडा नेता। आतंक का चोला पहनकर और खून-खराबा करके कोई देशभक्त या फाइटर नहीं बन जाता। दुखद स्थिति यह है कि कश्मीर घाटी में पाकिस्तान के पिठ्ठू अवाम को गुमराह करने में सफल रहे हैं और राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय राजनीतिक दल अलगाववादियों को अलग-थलग करने में पूरी तरह से विफल । कश्मीर के अधिकतर युवा सेना में भर्ती होने की बजाए आतंकी संगठनों की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं। अलगाववादी और आतंकी संगठन युवाओं को आसानी से गुमराह कर लेते हैं क्योंकि स्थानीय और राष्ट्रवादी नेता खुद पद और पैसे के पीछे भागते हैं। और यही वजह है कि सियासी नेताओं पर स्थानीय लोगों का जरा भी भरोसा नहीं रह गया है और वे पूरी तरह से नकार दिए गए हैं। जब कभी भी कश्मीर घाटी में हिंसा भडकती है, अलगाववादी और पाकिस्तानी समर्थक स्थिति का खूब फायदा उठाते हैं। यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है। घाटी की अवाम में सुरक्षा बलों के प्रति इतनी घृणा है कि लोग-बाग सेनिकों और पुलिसकर्मियों को देखते ही पत्थर फेंकते हैं। पत्थरबाजी के लिए राज्य सरकार ने कई लोगों को जेल में भी ठूंसा और मुकदमे चलाए मगर यह सिलसिला थमा नहीं। वानी के मौत से पहले ईद पर राज्य सरकार ने 634 पत्थरबाजों के खिलाफ 103 मुकदमे वापस ले लिए थे। अब वही लोग फिर से सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी कर रहे हैं। कश्मीर की अवाम घाटी में सेना की तैनाती के सख्त खिलाफ रही है। सेना की उपस्थिति को कश्मीरी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में बेवजह का दखल मानते हैं। लंबे समय से घाटी में सेना तैनात है। उस पर सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियन (एएफएसपीए) के तहत सुरक्षा बलों को किसी के घर में तलाषी लेने अथवा किसी को गिरफ्तार करने के अधिकार मिलने से इनका बेजा इस्तेमाल होना स्वभाविक है। नतीजतन, सुरक्षा बलों पर जब-तब यौन उत्पीडन अथवा हत्या के आरोप लगते रहे हैं। कश्मीर घाटी के ताजा हालात से एक बात तो साफ है कि अवाम मेनस्ट्रीम से दूर होती जा रही है और स्थानीय नेता और सरकार पूरी तरह से विफल हो चुकी हैॅ। केन्द्र से भारी वित्तीय मदद के बावजूद अवाम का राष्ट्रीय मुख्य धारा से पूरी तरह से नहीं जुड पाई है। यह स्थिति देश की अखंडता के लिए ठीक नहीं है। अब समय आ गया है कि कष्मीर को लेकर केन्द्र और सभी राजनीतिक दलों को मिल-बैठ कर कारगर नीति बनानी चाहिए।
मंगलवार, 12 जुलाई 2016
Burning Kashmir Underscores Utter Failure Of Indian Govt Policy
Posted on 8:06 pm by mnfaindia.blogspot.com/






