मंगलवार, 5 जुलाई 2016

यूनिफॉर्म सिविल कोड

समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) पर मोदी सरकार की ताजा पहल से सियासी हलकों   और अल्पसंख्यकों में हडकंप मच गया है। उत्तर प्रदेश  समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से ठीक  पहले मोदी सरकार की इस पहल को ”सियासी तुरुप चाल” के रुप में देखा जा रहा है। तथापि, मोदी सरकार की यह पहल वास्तव में भाजपा के “हिंदू एजेंडे“ को लागू करने का ही हिस्सा है। मोदी सरकार शिक्षा का “भगवाकरण“ तो कर ही रही है, अब समान नागरिक संहिता को लागू करने के मामले में भी  सरकार संजीदा नजर आ रही है। जम्मू-कश्मीर  को विशेष  दर्जा  देने वाली संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 370 को निरस्त करना, शिक्षा का भगवाकरण करना और पूरे देश  में समान नागरिक संहिता लागू करना भाजपा के “हिंदू“ एजेंडे का प्रमुख हिस्सा है। जम्मू-कश्मीर  में भाजपा अनुच्छेद 370 की जबरदस्त पैरवीकार पीडीपी के साथ सत्ता का सुख भोग रही है, इसलिए फिलहाल यह यह मांग ठंडे बस्ते  में डाल दी गई है। जम्मू-कश्मीर  के चुनाव को देखते हुए लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद समान नागरिक संहिता का मुद्दा जानबूझकर नहीं उठाया गया क्योंकि तब इससे भाजपा को विधानसभा चुनावों में नुकसान हो सकता था। इसी कारण न तो महाराष्ट्र  और न ही बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान समान नागरिक संहिता का मुद्दा प्रमुख रुप से उठाया गया। मगर अब उत्तर प्रदेश  में अगले साल के  शुरु में होने वाले विधानसभा चुनाव के दृष्टिगत  मतदाताओं का धु्रवीकरण कराने के लिए समान नागरिक संहिता का मुददा उछाला गया है। सरकार के इस स्पष्टीकरण  में कोई दम नहीं है कि समान नागरिक संहिता पर व्यापक चर्चा  की मंशा  से लॉ पैनल से रिपोर्ट मांगी गई है। 18 जुलाई से संसद का मॉनसून सत्र  शुरु हो रहा है और सरकार यह बात बखूबी जानती है कि सत्र से कुछ समय पहले समान नागरिक संहिता का मुददा उठाए जाने से संसद में खासा हंगामा हो सकता है। यह जानते हुए भी इस मुद्दे को आगे लाने से साफ है कि मोदी सरकार “एक तीर से दो निशाने“ साध रही है। मुद्दा उछलने से मोदी सरकार को समान नागरिक संहिता पर जनमानस का फीडबैक  मिल सकता है और उत्तर प्रदेश  विधानसभा  चुनाव में मतदाताओं का धु्रवीकरण भी हो सकता है।  समान नागरिक संहिता का मामला बेदह संवेदनशील है और इस मामले के प्रति मुसलमानों और उनके वोट बटोरने वाले सियासी दलों को खासी आपति है। और अगर समान नागरिक संहिता का मुद्दा भगवा पार्टी द्वारा उठाया जाता है, तो मुस्लिम समुदाय और ज्यादा भडक जाता है। हुआ भी ऐसा ही। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने फौरन तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मोदी सरकार की इस पहल को सिरे से खारिज कर दिया है। कांग्रेस समेत विपक्षी दल भी इस मामले पर लाल-पीले हो रहे हैं। देश  में इस समय अल्पसंख्यकों के लिए  शादी-विवाह, तलाक, विरासत और उत्तराधिकार के मामले में पर्सनल लॉ लागू होता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में तीन बार तलाक कहने से पत्नी से वैवाहिक संबंध विच्छेद करने की व्यवस्था का खुद प्रगतिषील मुसलमान विरोध करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 44 में  स्पष्ट  व्यवस्था है कि देश  में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। इसके बावजूद भी देश  में समान नागरिक संहिता लागू नहीं की जा सकी। मुसलमानों के कडे विरोध के कारण समान नागरिक संहिता को टाल दिया गया। यह मामला सुप्रीम कोर्ट  भी गया। भाजपा के एक नेता ने समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के लिए याचिका दायर की थी। 2015 में कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए समान नागरिक संहिता लागू करना या ना करना केन्द्र सरकार के विवेक पर छोड दिया था। भाजपा का शुरू से  स्टैंड रहा  है कि संविधान में स्पष्ट  व्यवस्था का पालन किया जाना चाहिए। इस मामले में भाजपा सही है मगर समान नागरिक संहिता लागू करने का यह सही समय नही है। मौजूदा असहिष्णु  माहौल और समकालीन उत्तेजनापूर्ण अंतरराष्ट्रीय  घटनाओं के मद्देनजर  समान नागरिक संहिता को लागू करना देश  हित में नहीं है। संवेदनशील  मुद्दों को सियासी हितों के लिए नहीं भुनाया जाना चाहिए।