भारत-चीन संबंधों में कटुता
न्यूक्लियर सप्लायर गु्रप (एनएसजी) में भारत की एंट्री का चीन द्वारा मुखर विरोध किए जाने के बाद से दोनों मुल्को के बीच कटुता बढी है। मगर इतनी भी नहीं कि पाकिस्स्तान की तरह बातचीत का सिलसिला बंद हो जाए। चीन सफल कूटनीतिज्ञ है और इस समय साउथ चाइना समुद्र विवाद में उसे भारत के साथ की जरुरत है। नई दिल्ली द्वारा चीन की सरकारी समाचार एजेंसी सिन्हुआ के तीन पत्रकारों का वीजा बढाने से चीन खफा है और ड्रेगन ने भारत को इस कार्रवाई के गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी है। मगर यह सब हवाई बातें है। चीन के प्रमुख समाचार पत्र का आरोप है कि भारत न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप पर बीजिंग के स्टैंड से चिढा हुआ है और उसने अपनी खीज मिटाने का नजला पत्रकारों पर गिराया है। चीन में मीडिया पर सरकार का कडा नियंत्रण है और वहां के समाचार पत्र वही लिखते हैं , जो सरकार द्वारा उनसे लिखने के लिए कहा जाता है। भारत ने चीन की सरकारी एजेंसी सिन्हुआ के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख और मुंबई स्थित दो संवाददाताओं को देश निकाला दिया है । इन तीनों पर खुफिया एजेंसियां कडी नजर रखे हुए थीं। भारत सरकार का कहना है तीनों पत्रकार पत्रकारिता के अलावा भी “बहुत कुछ कर रहे थे“। तीनों का वीजा जनवरी में समाप्त हो गया था और अब से उन्हें एक-एक माह के लिए बढाया जा रहा था। सरकार ने जुलाई के बाद तीनों का वीजा बढाने से इंकार कर दिया है। इस स्थिति में तीनों को जुलाई के बाद स्वदेश लौटना होगा। चीन का तर्क है कि भारत गौण मुद्दे को खामख्वाह “राई का पहाड“ बना रहा है। न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में भारत की एंट्री का चीनी विरोध सिद्धातों पर आधारित है। चीन समेत न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनपीटी) का हर सदस्य परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर कर चुका है मगर भारत ने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए है। इसी बिला पर चीन एनएसजी में भारत की एंट्री का विरोध कर रहा है। चीन के इस दावे में दम भी है। भारत के साथ-साथ पाकिस्तान ने भी एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं और भारत की देखादेखी उसने भी एनपीटी मे एंट्री के लिए आवेदन कर रखा है। भारत का एनपीटी में विरोध चीन की भले ही कूटनीतिज्ञ चाल हो, मगर इस मामले में नई दिल्ली का पक्ष कमजोर लगता है। भारत की ताजा कार्रवाई के प्रतिक्रिया स्वरुप चीन भी कुछ भारतीय पत्रकारों को स्वदेश भेज सकता है। इससे ज्यादा इस मामले में और कुछ होने से रहा। भारत इस समय चौतरफा दुश्मनों घिरा है। भारत की सीमाएं सात देशों के साथ लगती है और इनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार से भारत में जबरदस्त घुसपैठ हो रही है। पाकिस्तान से इस समय संबंध बेहद खराब हैं। जम्मू-कश्मीर में हालिया हिजबुल के आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने पर पाकिस्तान कश्मीर को हथियाने के “मुंगेरी लाल के सपने“ देख रहा है और हाफिज सईद जैसे खूंखार आतंकी भारत के साथ जंग लडने की बातें कर रहे है़ं। पाकिस्तान में सेना और सेना में आईएसआई का खासा दखल है। हाफिज सईद आईएसआई का कारिंदा है और अगर वह जंग की बातें करता है, तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। बहरहाल, सुखद स्थिति यह है कि 1980 के बाद भारत और चीन के बीच संबंध मधुर हुए हैं और पुरानी कडवाहट भुलाकर दोनों देश आगे बढे हैं। 2008 के बाद चीन, भारत का सबसे बडा व्यापारिक पार्टनर है और दोनों देशों में सैन्य और सामरिक सहयोग भी बढा है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद चीन के राश्ट्रपति शी जिनपिंग भारत का दौरा कर चुके हैं और मोदी चीन का। चीन के समाचार पत्रों ने भी इस बात का उल्लेख किया है। चीनी मीडिया का आकलन भी यही है कि पहले की अपेक्षा द्धिपक्षीय संबंध सुधरे हैं और छोटी-मोटी घटनाएं इन संबंधों को बिगाड नहीं सकते।
न्यूक्लियर सप्लायर गु्रप (एनएसजी) में भारत की एंट्री का चीन द्वारा मुखर विरोध किए जाने के बाद से दोनों मुल्को के बीच कटुता बढी है। मगर इतनी भी नहीं कि पाकिस्स्तान की तरह बातचीत का सिलसिला बंद हो जाए। चीन सफल कूटनीतिज्ञ है और इस समय साउथ चाइना समुद्र विवाद में उसे भारत के साथ की जरुरत है। नई दिल्ली द्वारा चीन की सरकारी समाचार एजेंसी सिन्हुआ के तीन पत्रकारों का वीजा बढाने से चीन खफा है और ड्रेगन ने भारत को इस कार्रवाई के गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी है। मगर यह सब हवाई बातें है। चीन के प्रमुख समाचार पत्र का आरोप है कि भारत न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप पर बीजिंग के स्टैंड से चिढा हुआ है और उसने अपनी खीज मिटाने का नजला पत्रकारों पर गिराया है। चीन में मीडिया पर सरकार का कडा नियंत्रण है और वहां के समाचार पत्र वही लिखते हैं , जो सरकार द्वारा उनसे लिखने के लिए कहा जाता है। भारत ने चीन की सरकारी एजेंसी सिन्हुआ के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख और मुंबई स्थित दो संवाददाताओं को देश निकाला दिया है । इन तीनों पर खुफिया एजेंसियां कडी नजर रखे हुए थीं। भारत सरकार का कहना है तीनों पत्रकार पत्रकारिता के अलावा भी “बहुत कुछ कर रहे थे“। तीनों का वीजा जनवरी में समाप्त हो गया था और अब से उन्हें एक-एक माह के लिए बढाया जा रहा था। सरकार ने जुलाई के बाद तीनों का वीजा बढाने से इंकार कर दिया है। इस स्थिति में तीनों को जुलाई के बाद स्वदेश लौटना होगा। चीन का तर्क है कि भारत गौण मुद्दे को खामख्वाह “राई का पहाड“ बना रहा है। न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में भारत की एंट्री का चीनी विरोध सिद्धातों पर आधारित है। चीन समेत न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनपीटी) का हर सदस्य परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर कर चुका है मगर भारत ने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए है। इसी बिला पर चीन एनएसजी में भारत की एंट्री का विरोध कर रहा है। चीन के इस दावे में दम भी है। भारत के साथ-साथ पाकिस्तान ने भी एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं और भारत की देखादेखी उसने भी एनपीटी मे एंट्री के लिए आवेदन कर रखा है। भारत का एनपीटी में विरोध चीन की भले ही कूटनीतिज्ञ चाल हो, मगर इस मामले में नई दिल्ली का पक्ष कमजोर लगता है। भारत की ताजा कार्रवाई के प्रतिक्रिया स्वरुप चीन भी कुछ भारतीय पत्रकारों को स्वदेश भेज सकता है। इससे ज्यादा इस मामले में और कुछ होने से रहा। भारत इस समय चौतरफा दुश्मनों घिरा है। भारत की सीमाएं सात देशों के साथ लगती है और इनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार से भारत में जबरदस्त घुसपैठ हो रही है। पाकिस्तान से इस समय संबंध बेहद खराब हैं। जम्मू-कश्मीर में हालिया हिजबुल के आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने पर पाकिस्तान कश्मीर को हथियाने के “मुंगेरी लाल के सपने“ देख रहा है और हाफिज सईद जैसे खूंखार आतंकी भारत के साथ जंग लडने की बातें कर रहे है़ं। पाकिस्तान में सेना और सेना में आईएसआई का खासा दखल है। हाफिज सईद आईएसआई का कारिंदा है और अगर वह जंग की बातें करता है, तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। बहरहाल, सुखद स्थिति यह है कि 1980 के बाद भारत और चीन के बीच संबंध मधुर हुए हैं और पुरानी कडवाहट भुलाकर दोनों देश आगे बढे हैं। 2008 के बाद चीन, भारत का सबसे बडा व्यापारिक पार्टनर है और दोनों देशों में सैन्य और सामरिक सहयोग भी बढा है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद चीन के राश्ट्रपति शी जिनपिंग भारत का दौरा कर चुके हैं और मोदी चीन का। चीन के समाचार पत्रों ने भी इस बात का उल्लेख किया है। चीनी मीडिया का आकलन भी यही है कि पहले की अपेक्षा द्धिपक्षीय संबंध सुधरे हैं और छोटी-मोटी घटनाएं इन संबंधों को बिगाड नहीं सकते।






