प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अफ्रीकी दौरा कई मायनों में अर्थपूर्ण है। पहली बार संभवतय दाल खरीद किसी प्रधानमंत्री की विदेशी यात्रा का प्रमुख ऐजेंडा रहा है। भारत में दाल की आसमान छूती कीमतों के कारण प्रधानमंत्री का चिंतित होना स्वभाविक है। इसीलिए प्रधानमंत्री पांच दिन की यात्रा के दौरान सबसे पहले मोजाम्बिक पहुंचे और लंबे समय के लिए अफ्रीकी दाल खरीदने का समझौता किया। 34 बाद मोदी अफ्रीकी देश मोजाम्बिका के दौरे पर जाने वाले पहले प्रधानमंत्री है। वीरवार को भारत और मोजाम्बिक के बीच तीन समझौते हुए और दाल खरीद इनमेंसे प्रमुख है। पिछले महीने केन्द्र सरकार ने मोजाम्बिक से एक लाख टन दालें खरीदने का मार्ग प्रशस्त किया था। सरकार ने 2020-2021 तक मोजाम्बिक से दो लाख टन दालें खरीदने का लक्ष्य रखा है। इसी मकसद से भारत मोजाम्बिक को दालों का उत्पादन बढाने में तकनीकी मदद भी करेगा। वीरवार को इस आशय का करार भी हुआ। भारत मोजाम्बिक को तूर (पीजन पीइज) की दाल उगाने में भी मदद करेगा। मोजाम्बिक की यात्रा के बाद शुक्रवार को प्रधानमंत्री दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। दस साल बाद भारतीय प्रधानमंत्री दक्षिण अफ्रीका की यात्रा करेंगे। इन दस साल में दोनों देशॉ में काफी कुछ बदल गया है। दस साल पहले दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स में नहीं था और तब भारत की तरह यह देश भी रंगभेद से उभर कर तेजी से आगे बढ रहा था। इसी वजह 2010 में नाइजीरिया की बजाए दक्षिण अफ्रीका को ब्रिक्स में शामिल कर लिया गया। नाइजीरिया दक्षिण अफ्रीका से कहीं बढा है और अफ्रीकी महाद्धीप का बेहतर नुमाइंदगी कर सकता है मगर इस देश के घरेलू हालात ठीक नहीं है और उसका ग्रोथ रेट भी दक्षिण अफ्रीका से काफी कम है। यद्यपि भारत की तरह अब दक्षिण अफ्रीका भी ब्रिक्स का सदस्य है मगर उसकी अर्थव्यवस्था भी भारत की तरह सुस्त पडी है। दक्षिण अफ्रीका भारत के ज्यादा करीब है और भारत के साथ उसके ऐतिहासिक संबंध भी है। इंडियन नेशनल कांग्रेस (आईएनसी) और अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) में काफी कुछ समानता है। भारत में कांग्रेस की तरह अब दक्षिण अफ्रीका की एएनसी का जलवा भी लुप्तप्राय हो रहा है। एएनसी भी भरष्टाचार की मारी है। भारत की अपेक्षा दक्षिण अफ्रीका ज्यादा युवा है। इसकी 65.2 फीसदी आबादी 16 से 64 साल की आयु वालों की हैं। लगभग तीस फीसदी के करीब 15 साल अथवा इससे कम उमर के हैं। मात्र 4.6 फीसदी 65 साल से ज्यादा उमर के लोग हैं। इसकी तुलना में भारत में साठ साल से ज्यादा आयु वालों की आबादी 2006 से 2050 के बीच 270 फीसदी बढ जाएगी। भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच मधुर संबंधों के बावजूद कुछ अप्रिय ऐतिहासिक घटनाएं आडे आती हैं। महात्मा गांधी को स्वराज की प्रेरणा भी दक्षिण अफ्रीका से ही मिली थी। रंगभेद के चलते महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका में अपमानित किया गया था। दक्षिण अफ्रीका में लंबे समय तक रंगभेद रहा है। इसी रंगभेद का परिणाम है कि दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीम में आज भी स श्वेत खिलाडी कहीं ज्यादा नजर आते हैं। 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह और दक्षिण अफ्रीका के राश्ट्रपति ठाबो म्बेकि के बीच जो अहम समझौते हुए थे, उन मेंसे अधिकतर पर अमल ही न हो पाया । टाटा स्टील ने दक्षिण अफ्रीका के नियोटेल से अपना हाथ खींच लिया है। भारतीय एयरटेल का एमटीएन से करार सिरे नहीं चढा है। दक्षिण अफ्रीकी का पहला नेशनल बैंक भारत में आज तक पांव नहीं रख पाया है। दोनों देशों के संबंधों में आज वह गरमी नहीं है, जो पहले हुआ करती थी। इसकी प्रमुख वजह है दक्षिण अफ्रीका का चीन के प्रति लगाव। समकालीन पूरा अफ्रीका महाद्धीप चीन के ज्यादा निकट है। भारत ने अब तक अफ्रीका को ज्यादा तरजीह नहीं दी थी। प्रधानमंत्री की मौजूदा यात्रा से यह खाई कुछ हद तक पाटी जा सकती है।
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