शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

शैतानी आयतें


कुरान में शैतान को अल्लाह और मोहम्मद से ज्यादा चालाक बताया गया है क्योंकि  शैतान कहीं अधिक कुटिल होता है। मगर  शैतान इंसानियत को लहू-लुहान करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता । वह किसी भी हाल  में अल्लाह और पैगम्बर नहीं बन सकता ।  यही बात  शैतानी पाकिस्तानी पर सटीक बैठती है। भारत के आंतरिक मामले में दखल देना तो  पाकिस्तान की फितरत बन गई है। पडोस में अमन-चैन से रहने की बजाय शैतानी पाकिस्तान, खुद भी आतंक की आग में झुलस रहा है और भारत को भी इसकी लपटों से जलाने की हर संभव कोशिश  कर रहा है।  भारत पडोसी धर्म निभाने की लाख कोशिश  कर ले, पाकिस्तानी अपनी  शैतानी फितरतों से बाज आने से रहा। आतंकी हिंसा में झुलस रही कश्मीर  घाटी में “आग में पेट्रोल“ डालने की मंशा  से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने शु क्रवार को केबिनेट की विषेश बैठक बुलाई  और 19 जुलाई को "ब्लैक डे " मनाने का इ ऐलान कर डाला। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने बुरहान वानी की मौत पर अफसोस जाहिर करते हुए कहा था कि “उन्हें इस समाचार से गहरा सदमा पहुंचा है“। नवाज शरीफ के इस वक्तव्य से साफ है कि पाकिस्तान  कश्मीर  में आतंक का नंगा नाच करा रहा है और आतंक फैलाने वाले उसके ही “भाडे के ट्ट्टू हैं। बुरहान वानी भी पाकिस्तान के इशारे पर काम कर रहा था। वह हिजबुल का कमांडर  था और इस आतंकी संगठन को पाकिस्तान की सेना और उसकी ”खुफिया” एजेंसी आईएसआई का खुला समर्थन है। पाकिस्तान ने कश्मीर  का मुद्दा फिर सयुंक्त राष्ट्र  संघ में  उठाया और इस पर भारत ने उसे खरी-खोटी भी सुनाई। सयुंक्त राष्ट्र  भारत के स्थाई प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्यीन ने पाकिस्तान को “ आतंक का मोहल्ला“ बताते हुए कहा कि आतंक इस देश  की स्टेट पॉलिसी है और आतंक फैलाना इसका धर्म। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय  मंच पर बार-बार कश्मीर  में जनमत संग्रह कराने की मागं करता है। भारत और पाकिस्तान के बीच अब तक जितनी भी संधियां या समझोते हुए है, सभी में कश्मीर  समस्या को आपस में बातचीत करके सुलझाने पर सहमति  हो रखी है। मगर पाकिस्तान संधि के फौरन बाद  पलट जाता है। निसंदेह, कश्मीर  के हालात सामान्य नहीं है और घाटी की अमन पसंद अवाम पर अलगाववादी और पाकिस्तानी पिठ्ठू ंहिंसक माहौल थोप रहे हैं। पर्यटन मेहनतकश  कश्मीरियों  की रोजी-रोटी का प्रमुख साधन है मगर हिंसा के माहौल में अवाम की कमाई का एकमात्र जरिया भी जाता रहा है। इन दिनों घाटी में प्रर्यटन सीजन चल रहा था मगर अलगाववादियों ने हिंसा का तांडव फैलाकर, इसे बर्बाद कर दिया। और जो तत्व लोगों की रोजी-रोटी ही छीन ले, वे अवाम के सबसे बडे दुश्मन ।  पाकिस्तान कश्मीर में  अपनी बेजा हरकतों से बाज नहीं आएगा और न ही इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय  मंचों पर उठाने से पीछे हटेगा। इस जमीनी सच्चाई का ख्याल करते हुए ही भारत को अपनी रणनीति तय करनी होगी। जम्मू-कश्मीर  से आतंकियों का जड से सफाया करना भारत की पहली प्राथमिकता है और सरकार इस दिशा  में काम भी कर रही है मगर सियासी हित इसमें आडे आ रहे हैं। जम्मू-कश्मीर  में आतंक को जड से मिटाने के लिए अवाम का भरपूर सहयोग जरुरी है। जब तक आतंकियों को स्थानीय लोगों का समर्थन रहेगा, सुरक्षा बलों को बडी सफलता नहीं  मिल पाएगी। बुरहान नवी के मामले ने फिर यह बात साफ कर दी है। कश्मीर  को केन्द्र से उदार वित्तीय मदद मिलती रही है मगर यह पांच फीसदी भी पात्र आदमी  तक नहीं पहुंचती है। भरष्ट  नौकरशाही और बिचौलिए बीच में ही इसे हजम कर जाते हैं। इसलिए, सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि केन्द्र से भेजी गई सौ फीसदी मदद पात्र तक पहुंचे। राज्य में बडे पैमाने पर रोजगार का सृजन करने की जरुरत है ताकि युवाओं को बुरहान वानी बनने से रोका जा सके। सरकार अगर कश्मीर  की अवाम का दिल जीत लेने में कामयाब हो जाती है तो  पाकिस्तान को भाव दिखाने की गुजांइश  ही नहीं रहेगी। शैतान का उसकी आयतों से ही खात्मा किया जा सकता है।