गुरुवार, 28 जुलाई 2016

षर्मिला का अधूरा व्रत



सोलह साल तक अनशन पर रहना कोई आसान काम नहीं है। मणिपुर की 44 साल की  इरोम शर्मिला ने “लगभग“ असंभव“ को संभव कर दिखाया है। पर इतने लंबे समय से जिस प्रकल्प के लिए शर्मिला भूखी-प्यासी और अपनों से दूर रही, उसे पूरा न होते देख थक-हार कर अब मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता ने अनशन तोडने का ऐलान किया है। मंगलवार को इंफाल में इरोमा की पेशी  थी। इस दौरान उन्होंने पत्रकारोॅ से कहा, “ अब मैं थक चुकी हूं,। सोलह साल से “अफ्सपा- सशस्त्र सेना स्पेशल पावर्स  एक्ट- के खिलाफ अकेले लड रही हूं, किसी सत्ता , राजनीतिक शक्ति और समर्थन के बगैर। अब शादी कर घर बसाना चाहती हैं और चुनाव भी लडना चाहती हूं“। मणिपुर में पंजाब, उत्तर प्रदेश  के साथ 2017 के  शुरु में विधानसभा चुनाव होने हैं।  9 अगस्त को इरोम अपना उपवास तोड देंगी। ”आयरन लेडी” नाम से विख्यात इरोमा ने 2000 में अनशन  शुरु किया था। नवंबर, 2000 को इंफाल के निकट मलोमा बस स्टैंड में बस का इंतजार कर रहे दस लोगों को खडे-खडे गोलियों से भून दिया गया था। तब इस नरसंहार के लिए असम राइफल्स के जवानों को दोषी  ठहराया गया था। मृतकों में 62 साल  की  वृद्ध महिला और राष्ट्रीय  वीरता पुरुस्कार (नेशनल ब्रेवरी अवार्ड) विजेता 18 वर्षीय  सिनम चंद्रामणि भी शामिल थी। इस घटना ने इरोमा  को इतना उद्वलेति किया कि उन्होंने अफ्सपा हटाने के लिए तुरंत अनशन  शुरु कर दिया। सरकार कई साल से उन्हें नाक में टयूब डालकर जबरन खिला रही है, ताकि वह जिंदा रह सके। इसके बावजूद लगभग 3500 दिनों तक इरोम भूखी-प्यासी रही है। दुनिया की सबसे लंबी भूख हडताल का रिकार्ड  भी उनके नाम है। 2014 में एमएसएन ने इरोमा को अंतरराष्ट्रीय  महिला दिवस पर ”विमेन आइकॉन आफ इंडिया” चुना था। एमनेस्टी इंटनेशनल  शर्मिला को विवेकी कैदी ( प्रिजन ऑफ कांसियस) घोषित कर चुकी है।   मणिपुर की राजधानी इंफाल का जवाहर लाल नेहरु अस्पताल का एक वार्ड उनकी जेल है, जहां कई साल से सरकार ने उन्हें रखा है। दरअसल, बार-बार आत्महत्या की कोशिश करने के लिए उन्हें गिरफ्तार और रिहा किया जाता रहा है। यह सिला कई सालों से चल रहा है। 16 साल तक अनशन करने के बावजूद इरोमा द्वारा  शुरु किया गया संघर्ष  अभी अधूरा है और देश  की अवाम के लिए कई सवाल छोड गया है। शर्मिला ने मणिपुर में अफ्सपा के खिलाफ जो लडाई लडी है, वही मांग कश्मीर  और पूर्वोतर के अन्य राज्य भी कर रहे हैं। हिंसा और अलगाववाद से पीडित मणिपुर समेत पूर्वोतर के सात राज्यों में  अमन-चैन बनाए रखने के लिए केन्द्र ने लगभग छह दशक से सषस्त्र सेना स्पेशल पावर्स  एक्ट (अफ्सपा) लगा रखा है। 1958 में पारित इस एक्ट के तहत सेना को इन राज्यों में किसी को भी गिरफ्तार करने, तलाशी लेने और कहीं भी रेड करने के विशेष  अधिकार दिए गए हैं। आतंकी घटनाएं बढने पर 1983 में अफ्सपा को पंजाब और चंडीगढ में लागू किया गया था मगर अमन-चैन लौटते ही 1997 मे इसे राज्य से उठा लिया गया था। 1990 से जम्मू-कष्मीर में भी अफ्सपा लागू है और अब  इस राज्य के अधिकतर सियासी नेता और अवाम इसे हटाने की मांग कर रहे हैं। पूर्वोतर और जम्मू-कश्मीर  में अफ्सपा लागू रहने और सेना की तैनाती के बावजूद निर्दोष  लोगों के मारे जाने की वारदातें कम नहीं हुई है। अनुमान है पूर्वोतर राज्यों में अब तक आतंकी हिंसा में 50,000 से ज्यादा निर्दोष  लोग मारे जा चुके हैं। मणिपुर में ही पांच हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। इस स्थिति के मद्देनजर  पूर्वोतर में अफ्सपा ज्यादा प्रभावी नजर नहीं आ रहा है। इसके विपरीत अफ्सपा से जनमानस राष्ट्रीय  मुख्यधारा से दूर होता जा रहा है। शर्मिला का संघर्ष  जाया  नहीं जाएगा। देर-सबेर पंजाब की तरह मणिपुर समेत पूर्वोतर में भी अफ्सपा के लिफ्ट होने की उम्मीद की जा सकती है।