भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर का कार्यकाल तीन साल ही क्यों? जबकि अब तक हर गवर्नर का औसतन कार्यकाल पांच साल का रहा है आरबीआई के गवर्नर रघुराम राजन ने यह सवाल उठाया है। उनका कहना है कि आरबीआई के गवर्नर का कार्यकाल कम-से-कम चार साल तो होना ही चाहिए। राजन की इस बात में काफी वजन है मगर चार साल ही क्यों, आरबीआई का कार्यकाल पांच साल क्यों नहीं। केन्द्र में सरकार के साथ ही आरबीआई गवर्नर की नियुक्ति होनी चाहिए। यह व्यवस्था कहीं ज्यादा व्यावहारिक नजर आती है। तीन साल का कार्यकाल वाकई ही मौद्रिक नीति को संजीदगी से लागू करने के लिए नाकाफी है। वैश्विक स्तर पर भी लंबे कार्यकाल का चलन है। अमेरिका में फेडेरल रिजर्व के अध्यक्ष का कार्यकाल चार साल का है। रघुराम राजन भी अमेरिकी सेंट्रल बैंक चेयर के कार्यकाल का हवाला दे रहे थे। भारतीय संसदीय प्रणाली की तरह भारतीय रिजर्व बैंक भी इग्लैंड के सेट्रंल बैंक ऑफ की तर्ज पर स्थापित किया गया है। बैंक ऑफ इग्लैंड के गवर्नर का कार्यकाल भी 1694 से लेकर 1913 तक तीन साल का हुआ करता था। मगर सर मोंटागू कोलिट नॉर्मन अपवाद रहे हैं। वे 1920 से 1944 तक चौबीस साल बैंक ऑफ इग्लैंड के गर्वनर रह चुके हैं। अमेरिकी फेडरेल रिजर्व की स्थापना 1913 में हुई थी और अब तक इसके 15 अध्यक्ष नामित हो चुके हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना 1935 में हुई थी। अब तक इसके 23 गवर्नर रह चुके हैं। जाहिर है अमेरिकी फेडरेल रिजर्व में आरबीआई की अपेक्षा अधिक स्थायित्व है। अर्थव्यवस्था को नियंत्रित रखना आरबीआई की प्रमुख जिम्मेदारी है और यह काम आसान नहीं है। इस बात के मद्देनजर रघुराम राजन की इस बात में दम है कि आरबीआई गवर्नर का कार्यकाल चार साल का होना चाहिए। मगर एक साल का कार्यकाल बढ जाने से कोई ज्यादा फर्क नही पडने वाला है। अंमूमन, आरबीआई के गर्वनर को एक्स्टेंशन देकर पांच साल और इससे ज्यादा का कार्यकाल दिया जाता है। अब तक यही परंपरा रही है। 1991 में उदारीकरण लागू होने के बाद आरबीआई के 25 साल के इतिहास में रघुराम राजन पहले ऐसे गवर्नर हैं, जिन्हें एक्स्टेशन नहीं दी गई है। राजन से पहले एस वैकेंटरमन (1990 . 1992) को भी एक्सटेंशन नहीं दी गई थी। इसकी वजह तत्कालीन हर्षद मेहता प्रतिभूति घोटाला था मगर राजन के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं है। वैकेंटरमन के पहले आरएन मल्होत्रा का पांच साल कार्यकाल रहा और वैकेंटरमन के उतराधिकारी सी रंगाराजन ने भी पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। अर्थशास्त्री बिमल जालन 1997 से 2003 तक छह साल आरबीआई के गवर्नर रहे और उसके बाद वाईवी रेड्डी को भी पांच साल का कार्यकाल दिया गया। राजन से पहले डी सुब्बाराव का कार्यकाल भी पांच साल का था। इन तथ्यों से स्पष्ट है राजन राजनीतिक प्रतिशोध के शिकार हुए हैं। रघुराम राजन का कार्यकाल इस सितंबर को खत्म हो रहा है। उन्हें संप्रग सरकार ने नियुक्त किया था, इसलिए भाजपाई उनके पीछे पडे हुए थे। राजन विख्यात अर्थशास्त्री है और उनकी आरबीआई के गवर्नर पद पर नियुक्ति से देश को फायदा हुआ है। राजन के चले जाने से न तो आरबीआई को कोई फर्क पडेगा और न ही मोदी सरकार को, मगर एक अस्वस्थ परंपरा जरुर कायम हुई है। देश के लिए यह बात बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि समकालीन सियासतदान प्रतिभा की अपेक्षा राजनीतिक प्रतिबद्धता और चाटुकारिता को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। सत्ता में आते ही हर सियासी दल अपने आदमियों को “एडजस्ट“ करने की फिराक में रहता है। इस क्रम में प्रतिभा का गला घोंट दिया जाता हे। केन्द्र में सत्तारूढ मौजूदा भाजपा अब वही कर रही है जिन बातों के लिए वह कांग्रेस को कोसा करती थी। अहम पदों पर सियासी नियुक्तियां राजनीतिक हितों को तो पूरा कर सकती है मगर राष्ट्रहित नहीं। राष्ट्रहित को सबसे ऊपर रखने की कसमें खाने वाले भाजपाई अब कहां हैं?
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