मंगलवार, 18 सितंबर 2018

स्वच्छता का जनांदोलन

देश  का प्रधानमंत्री झाडू लगाए और अपने हाथों से कचरा उठाए, तो यह अदभुत कार्य  अवाम के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके सहयोगी पिछले चार सालों से लगातार सडकों पर झाडू लगाकर और कचरा उठाकर  स्वच्छता अभियान को संजीदगी से आगे बढा रहे हैं। इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। देश  के नब्बे फीसदी से ज्यादा हिस्से में अब साफ-सफाई होने लगी है। शहरों और कस्बों को स्वच्छ बनने की होड लगी हुई है। मोदी सरकार के “स्वच्छ भारत“ अभियान के फलस्वरुप गांव-गांव, शहर-शहर  शौचालय बनाए जा रहे हैं। खुले में  शौच  करने पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है और लोग-बाग सार्वजनिक जगहों को स्वच्छ रखने के लिए आगे आ रहे हैं।  स्वच्छता को प्रोत्साहित करना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सबसे बडी उपलब्धि है। उन्होंने न केवल देश  को  साफ-सुथरा बनाया  है, अलबत्ता योगा को प्रोत्साहित करके लोगों के तन-मन को भी “स्वच्छ और सशक्त बनाया है। मगर वैश्विक  मानकों के हिसाब से भारत “स्वच्छता“ में अभी भी काफी पीछे है। आजादी के सात दशक बाद भी बृहद भारत की स्वच्छ तस्वीर नजर नहीं आती है। सच कहा जाए तो स्वच्छता हमारी आदत में  शुमार ही नहीं है। खुले में  शौच  करना, सडकों पर थूकना, सडकों-गलियों में कचरा फेंकना और घर को बेतरतीब तरीके से रखना हमारी आदत है। पान और तंबाकू सेवन करने वाले धडल्ले से यहां-वहां थूक कर गंदगी फैलाने से बाज  नहीं आते हैं। सडकें, गली-नुक्क्ड और सार्वजनिक शौचालय पान-तबांकू पीक में रंगे होते हैं।  यह जानते हुए भी कि  थूक और नाक से निकलने वाले द्रव्य में सबसे हानिकारक संक्रमक  कीटाणु  होते हैं, इन्हें  बीच सडक फर निकाल फेंक देना हमारी पुरानी आदत है। सार्वजनिक स्थलों पर थूक कर हम पूरे वातावरण को प्रदूषित करते हैं। देश  के अधिकतर सार्वजनिक  शौचालय आज भी इतने गंदे और बदबूदार होते हैं कि इनमें जाने से भी घिन्न आती है। बचपन से बच्चों को इन चीजों के बारे सिखाया जाना चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है।  यहां तक कि भोजन से पहले अच्छी तरह से हाथ धोना, हर रोज स्नान करना, दांतों की नियमित  ब्रशिंग  करना जैसी छोटी-छोटी आदतों को भी अक्सर टाल दिया जाता है क्योंकि ये सब हमारी आदतों में  शुमार नहीं है। हमारी इन्हीं आदतों की वजह से पश्चिम  में हमें “गंवार और असभ्य“ माना जाता है। हिमाचल प्रदेश  के पालमपुर में इंडो-जर्मन धौलाधार प्रोजेक्ट का एक कडवा अनुभव मुझे आज भी कचोटता है। इस  प्रोजेक्ट में कार्यरत जर्मनी  एक्सपर्ट्स  के लिए कार्यालय में अलग से  शौचालय बनाया गया था और हमें इसके प्रयोग की अनुमति तक नहीं थी। इसमें बाकायदा ताला लगा होता और इसकी चाबी जर्मनस के पास ही रहती थी। मुझे यह बात बहुत अखरती और मैने साहस करके जर्मनी टीम के मुखिया से पूछ ही लिया। जवाब था“ इंडियन अपने शौचालय को बहुत गंदा रखते हैं, उन्हें इसके इस्तेमाल का जरा भी सलीका नहीं है“। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने देशवासियों को स्वच्छता का पाठ पढाया था। महात्मा गांधी स्वच्छता को स्वतंत्रता से भी ज्यादा महत्वपूर्ण  मानते थे।  स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने  लोगों  को स्वच्छता का पाठ पढाया था। बापू और उनके संगी-साथी खुद अपना  शौचालय साफ करते, झाडू लगाकर अपने आसपास की जगह को साफ-सुथरा रखते। देश  में लंबे समय तक सत्तारूढ रही कांग्रेस स्वंय को महात्मा गांधी का वारिस मानती है मगर अपने कार्यकाल में पार्टी ने महात्मा गांधी को केवल मात्र वोट के लिए भुनाया और “मजबूरी का नाम महात्मा गांधी“ जुमले को ही चरितार्थ किया। जो काम कांग्रेस सरकार को बहुत पहले सपन्न कर लेना चाहिए था, उसे सात दशक बाद अब मोदी सरकार पूरा कर रही है। हमारे आसपास की हगह, घर-बार, गांव-गांव,गली-मोहल्ला स्वच्छ है तो हम स्वस्थ हैं और अगर लोग-बाग मानसिक और  शारीरिक रुप से स्वस्थ हैं तो देश  भी स्वस्थ और समृद्ध है।